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ये 5 बॉलीवुड फिल्में अपने समय से कुछ आगे ज़रूर थीं लेकिन इनको कोई भूला नहीं

Posted: अप्रैल 30, 2020

ऐसी बॉलीवुड फिल्में जो अपने समय से आगे हों या फिर झूठी मर्यादाओं का उल्लंघन करती हों, उन पर या तो सेंसर बोर्ड की कैंची चल जाती है या फिर वो बैन हो जाती हैं।

अक्सर समाज की सोच से इतर कुछ करने पर काफ़ी मुश्किलें सामने आ ही जाती हैं क्योंकि वह सोच समाज के बनाए दायरों में फिट नहीं बैठती तो उसे विरोध का सामना करना ही पड़ता है और पितृसत्तात्मक समाज में महिलाओं के प्रति समाज का दायरा ज़रा सा ही है। समाज का आईना कहे जाने वाले सिनेमा को भी कई बार ऐसी परिस्थितियों का सामना करना पड़ जाता है। ऐसी कई बॉलीवुड फिल्में जो अपने समय की सोच से आगे हों या फिर बनावटी मर्यादाओं का उल्लंघन करती हों, उनपर लोगों के विरोध के कारण सेंसर बोर्ड की कैंची चल जाती है या फिर वो बैन हो जाती हैं।

हम यहां ऐसी 5 बॉलीवुड फिल्मों का ज़िक्र करना चाहते हैं, जो महिलाओं के ईर्द-गिर्द बुनी गई हैं, लेकिन उन्हें कभी बड़े पर्दे पर आने का मौका नहीं मिला क्योंकि वो एक स्वतंत्र सोच के साथ बनाई गई फिल्में थीं। देश में ना सही लेकिन अंतरराष्ट्रीय मंच पर इन बॉलीवुड फिल्मों ने ख़ूब ख्याति अर्जित करते हुए अपनी जगह बना ही ली।

लिबास

साल 1988 में गुलज़ार साहब निर्देशित फिल्म आई थी लिबास। इस फिल्म में मुख्य अभिनय किया था शबाना आज़मी,  नसीरूद्दीन शाह और राज बब्बर ने। फिल्म की कहानी एक शहरी शादीशुदा जोड़े की है जिसमें पत्नी एक दूसरे व्यक्ति के लिए अपनी शादी से अलग होना चाहती है और अपने पति को छोड़ देती है।

क्योंकि समाज के हिसाब से शादी के बाहर किसी से रिश्ता होना ग़लत माना जाता है इसलिए इसके कंट्रोवर्शियल कंटेट  और डायरेक्टर और प्रोडूसर की अनबन की वजह से ये रिलीज़ नहीं हो पाई थी। इसके 22 साल बाद इसे गोवा में हुए इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल रिलीज किया गया। इस फिल्म ने कई इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में वाहवाही भी बटोरी।

31 साल के लंबे इंतज़ार के बाद आख़िरकार 2019 में इस फिल्म को ज़ी क्लासिक ने टीवी पर रिलीज़ करने की बात की गयी थी। ख़ैर तब और अब के समय में ज़मीन-आसमान का फर्क भी तो आ गया।

अनफ्रीडम/UNFREEDOM

अनफ्रीडम यानि फ्रीडम का विपरित। इस फिल्म में दो समानांतर कहानियां चल रही हैं एक न्यूयॉर्क में और दूसरी दिल्ली में। न्यूयॉर्क में मुस्लिम है जो एक लिबरल मुस्लिम स्कॉलर को मारने के इरादे से अपहरण करता है, जबकि नई दिल्ली में  एक लड़की दूसरी लड़की को किडनैप कर लेती हैं क्योंकि वो दोनों समलैंगिक हैं और एक-दूसरे से प्यार करती हैं।

धार्मिक कट्टरता और समलैंगिकता के मुद्दे को उठाती यह फिल्म झंझोर कर रख देती है। इस फिल्म को निर्देशक राज अमित कुमार ने बनाया था लेकिन विषय पर आपत्ति और कुछ बोल्ड सीन्स होने के कारण सेंसर बोर्ड ने हरी झंडी नहीं दिखाई। सेंसर बोर्ड ने फिल्म को बैन करते हुए ये कहा था कि समलैंगिक संबंध और धार्मिक कट्टरता दिखाए जाने के कारण दर्शकों के लिए यह विवादित हो सकती है।

2015 में इस फिल्म को अमेरिका में रिलीज़ किया गया था। अब यह फिल्म कुछ एक डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर भी मौजूद है। यह फिल्म अमेरिका में गोल्डन रील अवॉर्ड में नॉमिनेट भी हुई थी और केरल इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में भी दिखाई गई थी। फिल्म के कलाकारों में आदिल हुसैन, विक्टर बनर्जी, भानु उदय और प्रीति गुप्ता जैसे नाम शामिल हैं।

अब कहां देखें : अब यह बॉलीवुड फिल्म नेटफिल्क्स और यू-ट्यूब पर मौजूद है।

एस दुर्गा

एस दुर्गा फिल्म का विवाद था इसका नाम। पहले इस फिल्म का नाम था सेक्सी दुर्गा, अब ये नाम कहां किसी को पसंद आता क्योंकि इसमें दुर्गा के साथ लगा था सेक्सी। बस सबके अंदर का भक्त जाग उठा और विरोध की आवाज़ें चरम तक जा पहुंची। 2017 में इस बॉलीवुड फिल्म को विवाद के कारण इंटरनेशनल फिल्म स्क्रीनिंग से भी बाहर कर दिया गया था।

लेकिन इसका नाम बदलने के बाद हाईकोर्ट में इसे बिना कट के रिलीज़ करने का फ़ैसला हुआ। ‘यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते, रमन्ते तत्र देवता’ केवल किताबों तक ही सीमित है वस्तुस्थिति कुछ और है। यह फिल्म उसी को दर्शाती है कि कैसे हमारा समाज औरत को देवी के रूप में तो पूजता है लेकिन असलियत में औरत को इस कुटिल समाज में हर कदम पर सोच-सोच के चलना पड़ता है।

ख़ुद के लिए फ़ैसले लेने के लिए भी उसे दूसरे की हामी पर आश्रित रहना पड़ता है। इस दानव समाज में दुर्गा की no का मतलब No नहीं है। ये कहानी आपको अंत तक पकड़कर रखेगी। ये उस आतंक को महसूस करवाती है जो रोज़ हमारे समाज की स्त्रियों को झेलना पड़ता है। निर्देशक सनल कुमार शशिधरन की इस मलयाली फिल्म में राजश्री देशपांडे, सुजिश, बिलास नायर ने किरदार निभाए हैं। इस फिल्म ने भी कई इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में स्क्रीनिंग के बाद तारीफ़ हासिल की।

अब कहां देखें  : इसे विवादों के शांत होने के बाद मलयाली सिनेमा में रिलीज़ कर दिया गया था लेकिन अभी ये किसी डिजिटल फ्लेटफॉर्म पर नहीं है। हां आप गूगल पर सर्च कर सकते हैं क्या पता कोई लिंक मिल ही जाए। 2019 के आख़िर में ये घोषणा ज़रूर हुई थी कि फिल्म जल्द ही ऑनलाइन आ जाएगी। इंतज़ार बाकी है।

वॉटर

अकेडमी अवॉर्ड नामित दीपा मेहता की बॉलीवुड फिल्म वॉटर को भी बैन का सामना करना पड़ा। ये फिल्म उस वक्त की कहानी बताती है जब भारत में अंग्रेज़ी शासन था और विधवाओं को कई मुश्किल हालातों से जूझना पड़ता था। वाराणसी के आश्रम में 8 साल की उम्र से विधवा का जीवन काट रही औरत को जब एक गांधीवादी विचारधारा वाला व्यक्ति टकराता है तो कैसे उसके जीवन में परिवर्तन आता है इसी की एक प्यार भरी कहानी है वॉटर। लिज़ा रे और जॉन अब्राहम के निभाए किरदारों ने इस फिल्म को और बेहतर ही बनाया है।

इस फ़िल्म को अनुराग कश्यप ने लिखा था। सेंसर बोर्ड को ये सब्जेक्ट या तो समझ नहीं आया या फिर कई रूढ़िवादी सामाजिक संगठनों के विरोध की वजह से पसंद नहीं इसलिए यह फिल्म बैन करनी पड़ी। इस फिल्म को मिली अंतरराष्ट्रीय ख्याति की फेहरिस्त काफ़ी लंबी है।

अब कहां देखें  : फिलहाल यह फिल्म यू-ट्यूब पर देखी जा सकती है

पिंक मिरर

भारत जैसे देश में समलैंगिकता का मुद्दा हमेशा ही संवेदनशील रहा है। इसी पर आधारित साल 2003 में बनी फिल्म पिंक मिरर को बैन कर दिया गया। श्रीधर रंगायन द्वारा निर्देशित इस फिल्म की कहानी ट्रांसजेंडर्स की है जो भारत में आज भी अपने सम्मान की लड़ाई लड़ रहे हैं। सेंसर बोर्ड को फिल्म वलगर और अपमानजनक लगी जिसके लिए इसे बैन कर दिया गया। लेकिन यह फिल्म देश-विदेश के 70 से भी ज्यादा फिल्म फेस्टिवल में दिखाई गई और कई अवॉर्ड्स अपने नाम किए। क्रिटिक्स ने भी इस फिल्म को ट्रांसजेडर कम्यूनिटी के उम्दा वर्णन के लिए काफ़ी सराहा।

अब कहां देखें  : इस फिल्म को आप अमेजॉन के डिजिटल फ्लेटफॉर्म पर ख़रीद कर देख सकते हैं।

भारत में प्रतिबंधित बॉलीवुड फिल्में और भी कई हैं लेकिन इनमें से कई ऐसी हैं जो देखनी चाहिए क्योंकि वो कहीं ना कहीं समाज के असली रूप को सामने लाने का काम करती हैं। हमें अपने दिमाग को आज़ाद करने और सभी बाधाओं के अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को बहने देना होगा।

मौका मिले तो लॉक डाउन में इन बॉलीवुड फिल्मों में से कुछ देख लीजिएगा और बताइएगा कि आपको कैसी लगी। हां, हो सकता है ये फिल्में आपको थोड़ा परेशान कर दें लेकिन सच कड़वा ही तो होता है।

मूल चित्र : YouTube 

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