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मेरे साजन हैं उस पार : शब्दों में पिरोई हुई भावना

Posted: April 21, 2020

हम कई बार अपने मैं की बात किसी से कह नहीं पाते या फिर उसको लिखकर दे देते हैं या कुछ गए देते हैं। क्योंकि हर गीत एक कहानी कहता है ! 

‘मन की किताब से तुम, मेरा नाम ही मिटा देना
गुन तो न था कोई भी, अवगुन मेरे भुला देना
मुझे आज की विदा का, मरकर भी रहता इंतज़ार!’

कई बार जब कहीं कोई रेलगाड़ी, स्टीमर या हवाईजहाज़ छूट रहा होता है तो अक्सर उनमें सवार कई यात्रियों के बीच विदा के आदान प्रदान के साथ-साथ कुछ अटूट भावनात्मक रिश्ते भी आखिरी विदा ले रहे होते हैं !
किसी के भी जीवन में वह एक बेहद दुखद क्षण होता है!

लेकिन कहते हैं न कि परिस्थितियों के चलते इंसान कई बार असहाय हो जाता है और ऐसी विदाएं लेने के सिवा कोई अन्य उपाय नज़र नहीं आता!

ऐसी ही किसी परिस्थिति में जब अपने प्रिय से बिछड़ना ही एकमात्र नियति बन जाए और विदा की बेला हर बीतते क्षण के साथ नज़दीक आती दिख रही हो तो दिल अथाह पीड़ा से कराह उठता है !

और वह विदा भी कोई ऐसी वैसी न हो , बल्कि
विदा ऐसी हो कि जब दिल को पक्का विश्वास हो कि अब इस जीवन में तो क्या अपितु सदियों तक मिलना न हो सकेगा..
विदा ऐसी कि जब दो दिल टूट कर पहले भी कई बार बिखर चुके हों…
विदा ऐसी कि जिसे रोकना ईश्वर तक के बस में भी न हो…
विदा ऐसी कि जिसे देख कर धरती और अंबर के हृदय भी वेदना से फट पड़ें….. !

लेकिन आज मनिहारी घाट पर, कल्याणी (नूतन) और विकास घोष (अशोक कुमार) के बीच हो रही यह विदा कुछ ऐसी थी कि जिसे रोकना केवल और केवल कल्याणी के बस में ही था, जो खुद तय नहीं कर पा कही थी कि घोष बाबू से आखिरी बार मिलकर इस विदा को भोगना ही नियती बनने दे या फिर इस विदा को होने से रोक दे !

इन दो प्रेमियों की विदा की पीड़ा को व्यक्त करता 1963 में आई बिमल राय कृत हिंदी सिनेमा के इतिहास की एक खूबसूरत फिल्म बंदिनी का सबसे मार्मिक गीत, ‘मेरे साजन हैं उस पार’ है, जिसके गायक थे सचिन देव बर्मन!
सचिन देव बर्मन एक अच्छे संगीतकार के साथ-साथ एक बेहद संवेदनशील गायक भी थे! उनकी आवाज़ में एक गहराई और उनके संगीत में शास्त्रीय लोकधुन और रबिन्द्र संगीत का काफी प्रभाव था। 
इस गीत के गीतकार शैलेंद्र की कलम से निकले ये शब्द बिदा, गुन-अवगुन, बंदिनी, संगिनी, आँचल, पुकार और माझी हमारे भीतर तक उतरकर हृदय बेंध जाते हैं !

और सचिन दा का मार्मिक स्वर तो हमारे शरीर से मानो आत्मा ही निकालकर अपने साथ ले जाता है।

‘ओ रे माझी, मेरे साजन हैं उस पार ,
मैं मन मार हूं इस पार , ओ मेरे माझी
अबकी बार , ले चल पार !’

सचिन दा द्वारा गाया यह गीत एक भटियाली मांझी गीत है। 

कहा जाता है कि इसे नाविक अक्सर भाटे(ज्वार भाटा) के तेज़ बहाव के समय गाया करते हैं, क्योकि भाटे में चप्पू चलाने की आवश्यक्ता ही नहीं पड़ती है इसलिए मांझी लोग उस समय भटियाली गीत गुनगुनाने लगते हैं और इसी भाटा संगीत को ‘भटियाली’ लोक संगीत कहते हैं।

बंदिनी फिल्म का यह क्लाइमेक्स गीत ही इस फिल्म की जान है और फिल्म के अंतिम दृश्य में यह गीत पूरी फिल्म का उपसंहार है, जहां अपने सुनहरे भविष्य की ओर कदम बढ़ाती कल्याणी अपने पीड़ादायी अतीत को अचानक अपने सामने पाकर खुद को जीवन की मंझधार में फंसा पाती है और मांझी, अर्थात् अपने दिल से ही अनुरोध करती है कि सही फैसला लेने में उसकी मदद कर उसे इस मंझधार से निकाल कर पार ले जाए !
यहां तब वह अपने जीवन के सुनहरे सवेरे से विदा लेकर अपने अतीत के अंधियारे को ही अपने प्रेम से रौशन करने का निर्णय लेती है बिना इस बात की परवाह किए कि इस रौशनी से अब उसका पूरा जीवन जलना तय है!

‘मत खेल जल जाएगी कहती है आग मेरे मन की
मैं बंदिनी पिया की मैं संगिनी हूं साजन की !
कि मेरा खींचती है आँचल , मनमीत तेरी हर पुकार !
मेरे साजन हैं उस पार !’

ब्लैक एंड व्हाइट , बिना किसी आडंबर और बेहद सादा तरीके से किरदारों के भावपूर्ण अभिनय से रचा गया यह गीत आज की वी.एफ.एक्स. और एस.एफ.एक्स. तकनीक से बने गीतों की तुलना में हर लिहाज से भारी पड़ता है!

सचिन दा के वेदनामयी स्वर और शब्दों को यदि ‘नूतन’ जी ने अपनी हृदयस्पर्शी और भावपूर्ण अदाकारी से जीवंत न किया होता तो शायद इस गीत को वो मुकाम कभी न मिल पाता जिस मुकाम पर यह गीत आज है वैसे तो बंदिनी फिल्म का यह किरदार ‘कल्याणी’ एक कलम से रच गया पात्र ही था लेकिन उस किरदार की आत्मा की तड़प और विवशता को जिस प्रकार से नूतन जी ने अपने भीतर उतारा तो देखने वालों को उसमें कोई आभासी गढ़ा हुआ किरदार नहीं बल्कि उस नारी का चेहरा नजर आया जो यह जानती थी कि यदि आज उसने अपने बढ़ते कदमों को रोक न लिया और अपने दिल की आवाज को अनसुना कर दिया तो वो फिर कभी अपने प्रियतम से नहीं मिल पायेगी ! जो भी है वो इसी पल में है और अभी ही उसको निर्णय लेकर अपनी जीवन नैया की पतवार को अपने मांझी के हाथों में सौंप देना चाहिए और जिस बेचैनी से दौड़कर वह अपने प्रियतम का दामन थामती है वह सब कुछ बेहद मार्मिक है।

गीत के अंत में कल्याणी का दौड़ते हुए पट बंद होने के ठीक पूर्व स्टीमर पर जाकर घोष बाबू का चरणस्पर्श करना और फिर उनका उसे गले लगाना, यह देखकर सभी की आंखें नम हो जाती है। सिर्फ ये गीत देखकर ही हर व्यक्ति नूतन जी के अभिनय की गहराई और उसकी ऊंचाई का अंदाजा लगा सकता है। अंत में जब कल्याणी और घोष बाबू बिन कुछ कहे जिस प्रकार एक दूसरे को देखते हैं , ऐसा लगता है जैसे संवाद उनके चेहरों पर ही लिखे हों और हम उसे पढ़ रहे हों।
और इस प्रकार एक दुखद विदा एक सुखद मिलन में बदल जाती है !
आगे फिर कुछ भी कहने या सुनने की भी कोई आवश्यकता नहीं रह जाती!
हां , बस कल्याणी को यूं घोष बाबू के साथ जाते देखकर मेरा मन बस यही कहता है कि , “कल्याणी , तुमने पूरा जीवन बहुत दुख पाया और अब , अपने दुखों की गठरी इसी तट पर छोड़ जाना!”

वैसे इस गीत को बचपन से आज तक न जाने कितनी ही बार सुना लेकिन जब भी “अवगुन मेरे भुला देना” वाली पंक्तियां आती है तो मेरी आँखों से हर बार आँसू छलक उठते हैं मानो मैं खुद ही कोई बहुत बड़ी गुनाहगार हूं और ईश्वर से क्षमा-याचना करते हुए कह रही हूँ कि “गुन तो ना था कोई भी, अवगुन मेरे भुला देना !”

मूल चित्र :Pexels

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