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एक ख़्वाहिश ऐसी भी : प्राकृतिक से प्रेम भी और दोस्ती भी …..

Posted: अप्रैल 23, 2020

कभी कभी प्राकृतिक के ऐसे ऐसे रूप देखने को मिलते हैं, जिससे मन में लालसा पैदा हो जाती है, काश ! हम भी ऐसे होते, आज़ाद परवाज़ और आज़ाद जीवन,जैसे नदियाँ और पेड़।

अपनी ही धुन में मग्न ,

बंजारों के संग ,

बनकर बहती हवा सा ,

दिल चाहता है नदी के जल सा बहता ही जाऊँ मैं।

कभी दिल कहता है जा सागर से मिल जाऊँ मैं।

सच्चे मोती की तलाश में ,

खुद को पाने की आस में ,

लहरों पर हो सवार ,

दिल चाहता है समंदर की गहराइयों को नापू में।

कभी दिल कहता है क्षितिज से जा मिल जाऊँ मैं।

मंजिल को पाने की प्यास में ,

पंछी बन उड़ जाऊँ मैं ,

बादलों पर हो सवार ,

दिल चाहता है सबसे ऊँची शिखर पर चढ़ जाऊँ मैं।

कभी दिल कहता है जीत का पताका लहराऊँ मैं।

इतिहास के पन्नों में अपना भी एक नाम हो ,

एक अलग पहचान हो ,

बनकर हीरे सा निखरूँ मैं ,

दिल चाहता है इन सितारों सा चमकूँ मैं ,

कभी दिल कहता है उस चाँद तले अपनी एक दुनिया बसाऊँ मैं ,

दिल चाहता है उड़ जाऊँ सपनों के पंख लगाए दूर आसमां में।  

कभी दिल कहता है कर ले मुझको भी शामिल इस नील गगन में। 

मूल चित्र : Pixabay 

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