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क्यों 2019 का ट्रांसजेंडर अधिकार संरक्षण बिल मृत्यु का दस्तावेज है?

Posted: मार्च 17, 2020

ये बिल केवल एक कोरा काला कागज़ है। ये ट्रांस लोगों की जिंदगी को बदलने के लिए नहीं बल्कि उसे अधिक पीड़ादायक बनाने के लिए लाया गया है।

जीवन चक्र अपूर्वानुमेय है। हम कब, कहाँ तथा किस लिंग में जन्म लेंगे, इस पर किसी का अधिकार नहीं है। किन्तु, शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य तथा सबसे आवश्यक आत्म अभिज्ञान जैसी मूलभूत अधिकारों के हकदार सभी मनुष्य हैं। यह बात और है कि वास्तविकता में ऐसा नहीं होता। एक वर्ग ऐसा भी हैं जिन्हें उनके लिंग के कारण प्रताड़ित किया जाता है। आज भारत के तीन मिलियन ट्रांसजेंडर, हिंसा और यौन उत्पीड़न के शिकार हो रहे हैं।

सरकार ने भले ही 2014 में ट्रांसजेंडर को तीसरे लिंग की मान्यता दे दी हो, किन्तु आज भी उन्हें समाज में आम लोगों की तरह इज्जत की निगाहों से देखा नहीं जाता। इतना सब बहुत नहीं था कि सरकार ने ट्ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) विधेयक – 2019 लोकसभा में पास कर दिया।

जब 2016 में इस बिल का प्रथम प्रारूप लाया गया, तब इसकी खामियों के कारण इसका विरोध हुआ था। इसलिए जब 2019 में पुनः इस बिल को सदन में रखा गया, तब सरकार से उम्मीदें बढ़ गई थी। हालांकि, इस नए बिल ने भी निराश ही किया। इस बिल के विरोध के पीछे के कारणों को समझने हेतु, बिल की मुख्य बिंदुओं की जानकारी आवश्यक है।

बिल के मुताबिक ट्रांसजेंडर कौन

ट्रैन्ज़्जेन्डर व्यक्ति वो है, जिसका जेंडर उसके जन्म के समय निर्धारित हुए जेंडर से मैच नहीं करता। इनमें ट्रांस-मेन, ट्रांस-विमन, इंटरसेक्स या जेंडर-क्वियर और हिजड़ा और किन्नर से संबंध रखने वाले लोग भी शामिल हैं।

हालांकि, खुद को ट्रांसजेंडर की पहचान दिलाने के लिए, ट्रांस-पर्सन को सर्टिफिकेट बनवाना होगा। इसके लिए डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट के पास अप्लाई करना होगा। उन्हें एक रिवाइज्ड सर्टिफिकेट भी मिल सकता है। ये केवल तभी होगा, जब वह व्यक्ति जेंडर कन्फर्म करने के लिए सर्जरी करवाता है। उसके बाद ही सर्टिफिकेट में संशोधन होगा। किंतु,

  • यह शर्त ट्रैन्ज़्जेन्डर से चुनाव के अधिकार को छीन रही है। यह निजता के अधिकार का भी उल्लंघन है, क्योंकि सभी इस सर्जरी को नहीं चुनते।
  • सर्जरी की यह प्रक्रिया बहुत महंगी है।
  • साथ ही सर्जरी के प्रकार को भी उल्लिखित नहीं किया गया है, क्योंकि इस सर्जरी के भिन्न-भिन्न प्रकार हैं।
  • डिस्ट्रिक्ट मैजिस्ट्रैट व्यक्ति अथवा उसके डॉक्युमेंट्स की जाँच वास्तविकता में कैसे करेगा, इसे परिभाषित ही नहीं किया गया है।

बिल के प्रारूप को किसने तैयार किया

जिस बिल को तथाकथित रूप में ट्रांसजेन्डर के अधिकारों की रक्षा के लिए लाया गया था, उसका मसौदा तैयार करने से लेकर, उसे संसद में पास कराने तक में किसी ट्रांसजेन्डर को सम्मिलित ही नहीं किया गया।

इस समुदाय के किसी वर्ग से उनकी समस्याओं को जानने का प्रयास ही नहीं किया गया। फलतः, सभी उपनियम प्रचलित धारणाओं पर आधारित कर बना लिए गए।

अधिकारों पर प्रश्नचिन्ह

  • ट्रांसजेंडर्स को हेल्थ से जुड़ी हुई सुविधाएं देने के लिए सरकार कदम उठाएगी। अलग से एचआईवी टेस्ट सेंटर्स, सेक्स रिअसाइनमेंट सर्जरी की सुविधा तथा ट्रांसजेंडर्स को मेडिकल इंश्योरेंस स्कीम भी प्रदान की गई है। किन्तु, उन्हें इन सुविधाओं का लाभ किस प्रकार प्राप्त होगा, यह बताया ही नहीं गया। अर्थात, मेडिकल बिल में सब्सिडी प्राप्त होगी अथवा यह निःशुल्क होगा।
  • हर ट्रांसजेंडर को अपने परिवार के साथ, अपने घर में रहने का अधिकार है। यदि उनका परिवार उनका ध्यान रखने में सक्षम नहीं होता तो वह रीहैबिलटैशन सेंटर में रह सकते हैं। यह क्लॉज़ इन्हें दूसरे ट्रांसजेन्डर समुदाय से जुड़ने से रोक रहा है, जैसे कि हिजड़ा समुदाय।
  • यह बिल ट्रांसजेन्डर समुदाय को किसी भी प्रकार का आरक्षण नहीं प्रदान करता, हालांकि इस देश में यह वर्ग वास्तविक अल्पसंख्यक है। जन्म किसी भी धर्म अथवा जाति में हुआ हो, इनके लिए समाज की मुख्यधारा में नौकरी तथा शिक्षा प्राप्त करना कठिन होता है। सुप्रीम कोर्ट ने भी अपने फैसले में उन्हें ओबीसी का दर्जा दिया जाने की बात कही थी।
  • इसके अतिरिक्त बिल में कहीं भी विवाह का अधिकार, गोद लेने का अधिकार, समाजिक सुरक्षा, प्रॉपर्टी में अधिकार अथवा पेंशन का जिक्र भी नहीं है।

क्या अपराध है और क्या दंड होगा?

ट्रांसजेन्डर के साथ घटित अपराधों की एक लंबी सूची तैयार की गई है। उन्हें जबरदस्ती बंधुआ नहीं बनाया जा सकता, सार्वजनिक स्थानों का इस्तेमाल करने से रोका नहीं जा सकता, गाँव अथवा घर से निकाला नहीं जा सकता तथा किसी भी प्रकार की शारीरिक अथवा मानसिक प्रताड़ना पर दंड का प्रावधान रखा गया है। किन्तु,

  • ट्रांसजेंडर्स के खिलाफ ये सारे अपराध करने वाले को मात्र 6 महीने से दो साल तक की सजा हो सकती है।
  • किसी भी ट्रांसस्त्री के साथ हुए यौन अपराध अथवा बलात्कार पर अपराधी को सात साल की सजा अथवा आजीवन कारवास का प्रावधान है। किन्तु, ट्रांसपुरुष के साथ घटित इसी अपराध के लिए सजा मात्र छः महीने अथवा दो साल है। अब यौन अपराध की यह परिभाषा सरकार ही समझा सकती है।
  • इस बिल में ट्रांसजेंडर्स के लिए एक काउंसिल बनाने की बात भी कही गई है। इस काउंसिल का नाम होगा नेशनल काउंसिल फॉर ट्रांसजेंडर पर्सन। सोशल जस्टिस के केंद्रीय मंत्री इसके चेयरपर्सन होंगे तथा राज्य मंत्री इसके वाइस-चेयरपर्सन होंगे। इसके अतिरिक्त मंत्रालय के सचिव, हेल्थ, होम अफेयर्स, ह्यूमन रिसोर्स डेवलपमेंट मंत्रालयों से एक-एक प्रतिनिधी, नीति आयोग और नेशनल ह्यूमन राइट्स कमीशन के मेंबर्स तथा राज्य सरकारों के प्रतिनिधि भी इस काउंसिल में होंगे। हास्यपद तथा निन्दात्मक यह है कि जिनके लिए इस काउंसिल को गठित किया गया है, उस समुदाय से मात्र पाँच प्रतिनिधि रखे जायेंगे।

यह बिल ट्रांस लोगों की हत्या करने हेतु जारी किया गया मृत्यु का दस्तावेज है। सरकार को इनके के लिए कानून और स्वावलंबन की एक सीढ़ी तैयार करनी थी, किंतु इस बिल ने तो उनके अस्तित्व पर ही प्रश्नचिन्ह खड़ा कर दिया है। ये बिल केवल एक कोरा काला कागज़ है। ये ट्रांस लोगों की जिंदगी को बदलने के लिए नहीं बल्कि उसे अधिक पीड़ादायक बनाने के लिए लाया गया है।

इन्होंने अपनी मांगों की एक सूची भी सरकार को प्रदान की थी, जिसे विचारणीय भी नहीं समझा गया। जिस प्रकार से इस बिल को दोनों सदनों में पास किया गया, वह निराशाजनक है। ट्रांसजेन्डर के अधिकारों लिए काम करने वाली संस्थाओं के अतिरिक्त किसी ने भी इस विभेदकारी बिल के खिलाफ़ आवाज नहीं उठाई।

भारत की इस अल्पसंख्यक आबादी के साथ सरकार ने बिल के रूप में जो निंदनीय मजाक किया है, उसके बारे में तो लगभग सभी अंजान ही है। एक बिल द्वारा उनका सेल्फ-आइडेंटिफिकेशन राइट को छीन लिया गया। जरा सोचिएगा, यदि स्वयं के परिचय के लिए आपको किसी मजिस्ट्रेट के पास जाना होगा, तो वह आत्मा पर कितना विकट आघात होगा! स्त्री अथवा पुरुष होने से विलग एक मनुष्य होना, क्यों पर्याप्त नहीं है?

मूल चित्र : YouTube

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