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पाकिस्तानी गीत दुआ-ए-रीम : एक करारा जवाब समाज की रूढ़िवादी सोच को

दुआ-ए-रीम में दो पीढ़ी की महिलाओं का अपने साथ होने वाली हिंसा पर चुप्पी और नई पीढ़ी की महिलाओं का हिंसा पर खुदमुख्तार तरीके से बोलना उभर कर सामने आता है।

दुआ-ए-रीम में दो पीढ़ी की महिलाओं का अपने साथ होने वाली हिंसा पर चुप्पी और नई पीढ़ी की महिलाओं का हिंसा पर खुदमुख्तार तरीके से बोलना उभर कर सामने आता है।

बीते आठ मार्च महिला दिवस के अवसर पर दुआ-ए-रीम का विडियो सोशल मीडिया पर पाकिस्तान में रिलीज़ किया गया। जो देखते ही देखते सोशल मीडिया पर वायरल भी हो गया। इस विडियो को देखने का एहसास और सीमोन द बोउआर की किताब पढ़ने का अहसास मुझे एक सा लगा। ऐसा लगा कि विडियो में कही गई बात हर महिला के मन में कौंधती होगी, वह यही सोचती होगी कि यहाँ तो हमारे ही मन की बात है जिसको कहा जा रहा है।

पूरी दुनिया में महिलाओं को एक साथ जोड़ने वाला जो विषय है, वह है हिंसा। यह देश, भाषा, व्यवहार, संस्कार और संस्कृति में जमीन-आसमान के बदलाव के बाद भी पूरी दुनिया में महिलाओं के साथ एक ही तरह की है। समय के साथ-साथ महिलाओं के साथ हिंसा की कहानियां बस बदली हैं। हिंसा के स्वरूप में बदलाव आया है, महिला के साथ हिंसा में कोई बदलाव नहीं आया है, उसमें नई चीज़ें जुड़ती ज़रूर चली गई हैं।

बहरहाल, इस वीडियो की बात करें तो इसकी पेशगी शिकवा और जवाब शिकवा की तरह लगती है जो तरन्नुम के तरह पेश होती है। महिलाओं के बीच संवाद को बड़ी उम्दा अदांज से गीत के रूप में प्रस्तुत किया गया है या यह भी कह सकते है कि दो पीढ़ी की महिलाओं का अपने साथ होने वाली हिंसा पर चुप्पी और नई पीढ़ी की महिलाओं की हिंसा पर खुदमुख्तार तरीके से बोलना उभर कर सामने आता है।

यह गीत अल्लाम इक़बाल की लिखी एक नज्म लब पे आती है दुआ बनके तमन्ना मेरी की तर्ज पर पाकिस्तान के मारूफ़ कलाकार शोएब मंसूर ने लिखी है, गाया है दामिया फारूक शहनाज़ और महक अली ने। शोएब मंसूर वही हैं जो बोल और खुदा के लिए जैसी फिल्में बनाकर पितृसत्तात्मक व्यवस्था पर दहलीज़ पर धक्का मारते रहते है।

वीडियो का नाम दुआ-ए-रीम है मतलब ‘दुल्हन की दुआ’ है जिसमें जाना पहचाना चेहरा है माहिरा खान का, जो पाकिस्तान की तरह भारत में भी अनिनेत्री के बतौर जाना पहचाना है। गाना की प्रस्तुति को दो भाग में बंटा हुआ, ये कहा जा सकता है। दुआ-ए-रीम के पहले भाग में पितॄसत्तात्मक सोच में पली-बढ़ी महिलाएं हैं, जो पितृसत्तात्मक समाज में महिला की जि़ंदगी को जस का तस आगे बढ़ाने की परंपरा का समाजीकरण अपनी संगीत दुआ के जरिए विरासत के रूप में अगली पीढ़ी यानी दुल्हन को सौंप रही हैं। जैसा अक्सर हमारे यहां भी शादी के मौके पर मां-दादी-नानी दुल्हन के साथ करती है। दुआ-ए-रीम विडियो में पहनावे को देखकर यह कहा जा सकता है कि यह उच्चवर्गीय महौल को दिखाने की कोशिश है। गीत की शुरुआत में कहा गया है कि –

लब पे आवे है दुआ बनके तमन्ना मेरी
ज़िंदगी अम्मा की सूरत हो खुदाया मेरी

Never miss real stories from India's women.

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दुआ-ए-रीम गीत गा रही महिला के चेहरे का उतार-चढ़ाव इस बात कि गवाही दे रहा है कि उन्होंने अपनी जिंदगी हिंसा को सहते हुए बितायी है, इसके बाद गीत आगे बढ़ता है-

रा ईमां हो शौहर की इताअत करना
उनकी सूरत की न सीरत की शिकायत करना

घर में गर उनके भटकने से अंधेरा हो जावे
नेकियां मेरी चमकने से उजाला हो जावे

धमकियां दे तो तसल्ली हो के थप्पड़ न पड़ा
पड़े थप्पड़ तो करूं शुक्र के जूता न हुआ

हो मेरा काम नसीबों की मलामत करना
बीवियों को नहीं भावे है बगावत करना

मेरे अल्लाह लड़ाई से बचाना मुझको
मुस्कुराना गालियां खा के सिखाना मुझको

दुआ-ए-रीम में ये वही नसीहतें है, जिसको बचपन से एक लड़की को घर-परिवार और समाज अपने समाजीकरण में सिखाता है। इस पूरे गीत के दौरान नई पीढ़ी की लड़कियां जिसमें दुल्हन भी शामिल है, आश्चर्य से आंख बड़ा करती है, कभी मुंह सिकोड़ती है तो कभी दांत पिसती हुई दिखती है। दुल्हन भी अपनी अंगलियों बजाते हुई दिखती है। इस वीडियों का शानदार भाग तब शुरु हुआ होता है जब दुल्हन चुप नहीं बैठती है, उन्हें रोकती है और सवाल करती है कि ‘ये किस तरह की दुआएं की जा रही है।’

उसके बाद दुआ-ए-रीम में नये जमाने की दुआएं गाई जाती हैं जिसे पितॄसत्तात्मक हिंसा को आज की आत्मनिर्भर महिलाओं का जवाब कहा जा सकता है। वो कहती है-

लब पे आती है दुआ बनके तमन्ना मेरी
घर तो उनका हो हुकूमत हो खुदाया मेरी

मैं अगर बत्ती बुझाऊं के अंधेरा हो जाए
मैं ही बत्ती को जलाऊं के उजाला हो जाए

मेरा ईमान हो शौहर से मुहब्बत करना
न इताअत न गुलामी न इबादत करना

न करूं मैके में आकर मैं शिकायत उनकी
करनी आती हो मुझे खुद ही मरम्मत उनकी

आदमी तो उन्हें तूने है बनाया या रब
मुझको सिखला उन्हें इंसान बनाना या रब

घर में गर उनके भटकने से अंधेरा हो जाए
भाड़ में झोंकू उनको और उजाला हो जाए

वो हो शाहीन तो मौला मैं शाहीना हो जाऊं
और कमीने हो तो मैं बढ़के कमीना हो जाऊं

लेकिन अल्लाह मेरे ऐसी न नौबत आए
वो रफाकत हो के दोनों को राहत आए

वो मुहब्बत जिसे अंदेशा-ए-ज़वाल न हो
किसी झिड़की, किसी थप्पड़ का भी सवाल न हो

उनको रोटी है पसंद, मुझको है भावे चावल
ऐसी उल्फत हो कि हम रोटी से खावे चावल

यह जवाब केवल पितृसत्ता पर नहीं, बल्कि उस समाजीकरण पर भी है जिसको महिलाएं भी पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ाती हैं और यह ताने भी सुनती हैं कि औरत ही औरत की दुश्मन होती है। सच्चाई यह है कि कोई औरत किसी औरत की दुश्मन नहीं होती है, वह अपने तय दायरे में अपने साथ किए समझौते को बस आगे बढ़ाती है क्योंकि उसको यकीन है कि वो कुछ बदल नहीं सकती है। पर आज की पीढ़ी की खुदमुख्तार आज़ाद ख्याल लड़कियां इसको बदलने के लिए किसी भी तरह का बगावत करने को तैयार हैं। वो आशावादी भी हैं, वो नहीं चाहतीं कि उनको यह कदम उठाना पड़े पर वो औरत मर्द को बराबरी से तवज्जों देते हुए ‘रोटी से चावल’ खाने की बात करती हैं।

दस मिनट से भी कम समय के दुआ-ए-रीम विडियो को जब मैंने देखा तब यही लगा कि महिला के साथ हिंसा का मामला गोली-काली चमड़ी, मज़हब, भाषा, देश-दुनिया सब जगहों पर एक ही तरह का है। जिसको पितृसत्ता में कैद महिलाएं उसका समाजीकरण कर अपनी दास्तां को विरासत तक गतिशील रखने के लिए मज़बूर हैं। शायद इसलिए क्योंकि उनके पास और कोई नया रास्ता ही नहीं था। पर विडियो अपने दूसरे हिस्से में आते ही एक नई उम्मीद को भर देता है जो सकून तो देता ही है, साथ ही मुस्कान भी। क्योंकि यह अपनी आज़ाद ख्याली की खुदमुख्तारी करता है पर लैगिंक समानता की शर्त्त पर।

मूल चित्र और अन्य चित्र : YouTube

 

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