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जी हाँ! आप, मैं और ये समाज, हम सभी हैं ‘गिल्टी’

Posted: मार्च 9, 2020
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यौन शोषण की घटना को जब कोई सबके सामने लाता है, तो या तो सब एक चुप्पी साध लेते हैं या उस आवाज़ को चुप करने की तमाम साज़िशें होती हैं।

नेटफ्लिक्स पर हाल में रिलीज़ हुई फ़िल्म गिल्टी कुछ अरसे पहले मीटू मूवमेंट के दौरान कई लड़कियों की दर्दनाक अतीत को फिर से तरोताज़ा कर देती है, जो उस दौरान सोशल मीडिया पर दर्ज़ हो रही थी। उस दौरान जैसे एक तबका इन दर्दनाक अतीत को बयां करने वाली आधी-आबादी के साथ खड़ा था तो दूसरा तबका यह मानने को तैयार नहीं था।

उस दौरान हो रही तमाम सामाजिक प्रतिक्रियाओं को पकड़ते हुए, उसे एक कहानी के रूप में कोशिश हैं फ़िल्म गिल्टी। यह हमेशा से होता रहा है कि कोई भी जब कभी अपने साथ हुए यौन शोषण की घटना को सबके सामने लाता है तो या तो एक चुप्पी साध ली जाती है या जो अपनी आवाज़ शोषण के खिलाफ बुलंद करना चाहते हैं उसको चुप करने की तमाम साज़िशें होती हैं। पीड़िता का चरित्र-चित्रण पूरा समाज तो करता ही है, उसके उठ कर खड़े होने को भी समाज़ बर्दाशत नहीं कर पाता है।

गिल्टी की कहानी शुरू होती है सोशल मीडिया पर मीटू के एक खुलासे से जिसकी पड़ताल वकील दानिश(ताहिर) करता है। जैसे-जैसे जांच आगे बढ़ती है, परतें वैसे-वैसे खुलती हैं।

कहानी शुरू होती है दिल्ली के सेंट मार्टिन कालेज के गलियारे से, जहां एक पावरफूल नेता का बेटा सबसे कूल डूड वीजे(गुरफतेह पीरजादा) है, जो एक बैंड का सिंगर भी है और वह कालेज की सबसे कूल लड़की नानकी(कियारा आडवाणी) से प्यार करता है जो इस बैंड की गीतकार है। इस बैंड के सारे दोस्त एक-दूसरे से दोस्ती की कसमें देते रहते हैं। वीजे-नानकी के जोड़ी से सेंट मार्टिन के लड़के-लड़कीयां रश्क रखते हैं पर धनबाद से आई तनु कुमार(आकंक्षा) अक्सर वीजे को पटाने की कोशिश करती है। फिर एक दिन तनु सोशल मीडिया पर वीजे पर आरोप लगाती है कि उसका बलात्कार वीजे ने किया है। तब कुछ लोग उसे अटेंशन सीकर कहते हैं, तो कुछ लोग उसके साथ खड़े होते है।

फिर कहानी खोलना शुरू करती हैहरैसमेंट और क्लास डिफरेंस की गिरहें, जिसमें फेमिनिस्ट समझी जाने वाली नानकी तक अपने धोखेबाज़ प्रेमी वीजे के बारे में जानने के बाद भी तनु को ही दोषी मानती है। वह कभी बिंदास सी दिखती है, कभी बोल्ड और कभी खुद को खोजती हुई एक-टूटी बिखरी लड़की, जिसके खूद के साथ यौन-उत्पीड़न किसी ने बचपने में किया था। तब वह कुछ बोल नहीं पाई। फिल्म मीटू जैसे गंभीर विषय को अचानक समाज से गायब हो जाने और इस गंभीर विषय पर मीम्स बनाने वाले समाज पर तंज भी कसती है।

फिल्म शोषण, पावर-पालिटिक्स और भावनाओं के बीच सच्चाई तक पहुंचने को सही तरीके से पिरोती है। फिल्म में तमाम डेब्यू करने वालों कलाकारों ने अच्छा काम किया है। कियारा और दानिश का अभिनय आत्मविश्वास से भरा है।

कहानी के अंत में लगता है कि कहानी मीटू को बयां करने वाली लड़कियों के पक्ष में नहीं खड़ी है लेकिन क्लाइमेक्स एक साथ कई राज़ को फिर सेंट मार्टिन कांलेज के प्रोग्राम में मंच पर खोलता है और आरोपी को सबों के सामने नंगा करते हुए बताता है कि यौन-हिंसा के घटनाओं में आरोपी केवल एक नहीं होता है।

आरोपी समाज भी होता है जो उसको दबाने की कोशिश करता है और वह इसलिए इन बातों को दबाता है क्योंकि उसके हाथ स्वयं इसमें गंदे हुए होते है। नानकी कहती है कि गिल्टी टू क्योंकि मैं भी बलात्कार जैसी हिंसा को छुपाने का हिस्सा थी, पर जो मेरे साथ हुआ था उसके लिए मैं गिल्टी नहीं हूं। आज मैं कहने को तैयार हूं पर क्या कोई सुनने वाला है।

अंत में, तनु नानकी का हाथ पकड़ लेती है और दोनो एक-दूसरे को देखती हैं, मानो एक-दूसरे को कह रही हों कि यौन शोषण के तमाम मामलों में हम सब के सब शामिल हैं – हम सब हैंगिल्टी

मूल चित्र : YouTube 

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