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हमें कोरोना से डरना नहीं अपितु डट के सामना करना है

कोरोना के समय में भी इस माँ ने अच्छाई ढूंढ ली और कहा, "सच कहूं तो इस कोरोना की वजह से ही मेरा परिवार साथ में समय व्यतीत कर रहा है।"

कोरोना के समय में भी इस माँ ने अच्छाई ढूंढ ली और कहा, “सच कहूं तो इस कोरोना की वजह से ही मेरा परिवार साथ में समय व्यतीत कर रहा है।”

“मम्मी आजकल सब लोग कितने दहशत में हैं, इस कोरोना वायरस की वजह से”, रोहन बोला।

तभी रिया बोली, “हां मुझको तो बहुत डर लगता है, इसलिए मैं तो दिन में बीसों बार हाथ धोती हूँ।”

“इंसान सुकून से नहीं बैठ सकता। टी.वी, मोबाइल, पेपर जहां देखो वहां बस वायरस वायरस, जैसे कि और कोई न्यूज़ है ही नहीं”, रवि रोहन के पापा ने टी.वी का रिमोट गुस्से से मेज पे रखते हुए कहा।

“ये लो आ गए गरमागरम पकौड़े और अदरक वाली चाय”, सुधा रोहन की माँ ने बोला।

सब पहले हाथ धो के आये फिर सब मिलके पकौड़े का लुफ़्त लेने लगे।

“सुधा तुम कैसे हर माहौल में खुश रह लेती हो। तुम्हारे चहरे पे कोरोना की शिकन नही दिखाई देती”, रवि बोला।

“अरे कोरोना से डरने की नहीं डट के मुकाबला करने की ज़रूरत है। ध्यान से देखो तो इस कोरोना ने तुम्हें क्या पूरे दुनिया को अच्छी आदत डलवाने के लिए मजबूर कर दिया। क्यों सही कहा ना?”

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“हम सबको पता है कोई भी चीज़ खाने से पहले हाथ धोने चाहिए। पहले धोते नहीं थे। पर अब बिना कहे धोते हैं”, सुधा ने रिया की ओर इशारा करके कहा।

“अपने नाक, कान में उंगली नहीं डालनी चाहिए। सबको पता था, पर तब कोई नहीं मानता था। तब कह कह के थक गई थी मैं”, सुधा ने रवि की ओर इशारा करके कहा।

“बाहर का खाना ज़्यादा नहीं खाओ, मगर तब रिया नहीं सुनती थी। आये दिन कभी पिज़्ज़ा, तो बर्गर मंगवा के खाती थी। अब बाहर के खाने पे कैसे कान पकड़ती है”, रिया की ओर इशारा करके सुधा ने कहा।

“आये दिन पार्टी, कभी पिकनिक, जिनके घर पर कभी पैर नहीं टिकते थे। वो सारा दिन घर पर रहते हैं”, सुधा ने रोहन की और इशारा करके कहा।

ऐसा नहीं कि ये सब कोरोना की वजह से शुरू हुआ है। हाथ धोना, सात्विक खाना, सफाई रखना, परिवार को समय देना, मिलजुल के रहना, नमस्कार करना, ये तो हमारी भरतीय संस्कृति है और ये सब तो पता नहीं कब से चल रही है। वो बात और है कि कोरोना से पहले इसे आउट ऑफ फैशन कहते थे और कोरोना के बाद इसकी महत्ता मान रहे हैं।

आखिरकार ये है हमारी भरतीय संस्कृति, ओल्ड इस गोल्ड, समझे!

“मैं ये नहीं कहती कि कोरोना से डरो मत। डर सबको लगता है। मुझे भी लगता है, क्योंकि खतरा तो सब कहीं है, लेकिन डर के ज़िंदगी नहीं जी जा सकती। कोरोना से ज़्यादा खतरनाक बीमारियां हैं इस दुनिया में पर इसका मतलब ये तो नहीं कि हम ज़िंदगी जीना छोड़ दें। हमें सावधानी बरतनी होगी। हम बस वो ही कर सकते हैं और वो सब हम कर ही रहे हैं। आगे जो प्रभु चाहे”, सुधा बोली।

“सच कहूं तो इस कोरोना की वजह से ही मेरा परिवार साथ में समय व्यतीत कर रहा है।”

सब सुधा को एकटक सुन रहे थे।

“वाह मम्मी! क्या बोली हो आप”, रोहन बोला।

“बेटा ये है भारतीय नारी जो बुराई में से भी अच्छाई ढूढ़ लेती है”, रवि ने अपनी पत्नी की प्रशंसा करते हुए कहा।

दोस्तों हर सिक्के के दो पहलू होते हैं। एक अच्छा एक बुरा। यदि हम बुरे समय में से भी अच्छाई के चंद कण ढूंढने में कामयाब हो गए तो ज़िंदगी जीना आसान हो जाता है। इसलिए हमेशा सकारात्मक सोच रखिये और खुश रहिए।

याद रखिये कोरोना से डरना नही डट के सामना करना है।

मूल चित्र : YouTube(FilterCopy) 

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