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सवालों में सवाल है ‘बड़ी होती बेटी की शादी कब करोगे?’

Posted: फ़रवरी 20, 2020

ये बात इस समाज को अच्छे से गाँठ बंध लेनी चाहिए कि अपनी बेटी के हाथ कब पीले करने है यह निर्णय लेना, सिर्फ उसके परिवार वालों का ही काम है। 

दिल्ली में इस बार ठंड इतनी ज्यादा है कि मॉर्निंग वाक पर जाना कोई युद्ध करने के बराबर हो गया है।

बच्चों की जिद्द के कारण आज शाम को उन्हें पार्क ले गई। वहां पार्क में घूमते हुए शर्मा आंटी और उनकी बेटी मीनल मिली। काफी दिनों के बाद उनसे मुलाकात हुई थी। मीनल 29 साल की सुंदर सी, पढ़ी लिखी, होशियार और एक प्राइवेट कंपनी में नौकरी करती है।

लेकिन अभी तक उसके लिए कोई रिश्ता तय नहीं हुआ था। उस कारण से अंकल आंटी दोनों बहुत परेशान थे।

आज भी शर्मा आंटी का मुंह उतरा हुआ था पूछा तो बोली, “क्या बताऊं… वैसे तो कोई रिश्ता आता नहीं। यदि आ भी जाए तो कभी मीनल को पसंद नहीं, तो कभी लड़के वाले कुछ मीन-मेख निकाल देते हैं। कभी नौकरी पसंद नहीं आती लड़के की, तो कभी लड़का छोटा निकल जाता है…क्या करें कुछ समझ नहीं आता।”

“हमें तो कोई दिक्कत नहीं है, लेकिन हमारे आस पड़ोस और रिश्तेदारों से तो मीनल की आज़ादी देखी नहीं जाती वो तरह-तरह की बातें करते हैं, “तुम्हारी बेटी कितनी बड़ी हो गई है! कब करोगे इसकी शादी?” शर्मा आंटी मीनल को देखते हुए बोली।

“कोई बात नहीं आंटी जी, आजकल तो वैसे भी शादी की कोई उम्र नहीं है! जब मन करे तब कर लो… कोई 20 में करता है, तो कोई 40 के बाद भी कर रहा है! आप टेंशन मत करो, जब मिलेगा लड़का तब सब देखते रह जाएंगे। मेरी शादी भी 30 साल के बाद ही हुई थी।”

“अच्छा फिर तो ठीक है। फिर तो हम भी इंतजार करेंगे कि कोई अच्छा लड़का मिल जाए जो हमारी बेटी को प्यार से रखें। तब जाकर इस समाज का मुंह बंद होगा।”

तभी मेरे बच्चों ने मुझे आवाज लगाई। मैंने भी आंटी से विदा ली और चल पड़ी अपने बच्चों के पास…

लेकिन यह सोच रही हूं कि आज भी हमारे समाज में लोग अपनी बेटी की बढ़ती उम्र को लेकर बहुत चिन्ता में है, जैसे शादी की उम्र मानो निकल गई हो। आज जब लड़की अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद अपने पैरों पर खड़ी हो जाती है, अपने माता पिता के लिए कुछ करना चाहे तो यह समाज उसकी बढ़ती उम्र को नहीं देेख नहीं सकता।

उन्हें तो लगता है कि लड़की के मां-बाप उसकी जान बूझकर शादी नहीं कर रहे है। समाज के लोगों के लिए यह एक गंभीर मुद्दा बन जाता हैं। लेकिन वो ये भूल जाते है कि इसके कारण उस लड़की और उसके परिवारवालों को बहुत सुनना और सहन करना पड़ता है।

अपनी बेटी के हाथ कब पीले करने है यह निर्णय लेना, सिर्फ उसके परिवार वालों का ही काम है। लेकिन समाज के कुछ लोगों ने ये भी अपने घर का मुद्दा बना लिया है…

आपके क्या विचार है इस बारे में?

ब्लॉग को पढ़ने के लिए आपका हार्दिक आभार।

मूल चित्र :

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