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दिल्ली चुनाव की 3 महिला उम्मीदवार, उनके वादे और आपकी उम्मीदें!

Posted: February 11, 2020

कौन जीतेगा कौन नहीं, फिलहाल तो नहीं पता, लेकिन हम इन तीन स्ट्रॉग महिला उम्मीदवारों के ज़रिए बताना चाहते हैं कि कैसे राजनीति में महिलाओं की भूमिका बदली है।

कुछ ही घंटों बाद दिल्ली चुनाव के नतीजे आ जाएंगे और आपको चल जाएगा कि राजधानी का मुख्यमंत्री कौन बनेगा। दिल्ली की 70 विधानसभा सीटों पर 672 उम्मीदवार आमने-सामने हैं जिनसे से सिर्फ़ 79 महिला उम्मीदवार हैं। हालांकि ये संख्या पिछली बार के मुकाबले में बढ़ी है। एक सर्वे पढ़ रही थी कि साल 2015 में सिर्फ 29 महिलाएं उम्मीदवार थीं। अच्छी बात है कि थोड़ा फासला कम हुआ लेकिन अभी और कम होना चाहिए।

दिल्ली राजधानी है इसलिए राजनीति में महिलाओं की भागीदारी को लेकर बाकी राज्यों की अपेक्षा में इसे बेहतर उदाहरण पेश करना चाहिए। दिल्ली चुनाव में खड़ी 3 बड़ी पार्टियां बीजेपी, AAP और कांग्रेस लड़ रही हैं। कौन जीतेगा कौन नहीं, फिलहाल तो नहीं पता लेकिन हम इन दलों की तीन स्ट्रॉग महिला उम्मीदवारों के ज़रिए यहां ये बताना चाहते हैं कि कैसे राजनीति में महिलाओं की भूमिका बदली है।

आतिशी मर्लेना (AAP)

AAP की उम्मीदवार आतिशी मर्लेना अपनी पार्टी की एक सशक्त उम्मीदवार हैं। 38 साल की आतिशी दिल्ली की कालकजी सीट से लड़ रही हैं। पिछली बार वो थोड़े से अंतर के कारण बीजेपी उम्मीदवार गौतम गंभीर से हार गई थीं। गौतम गंभीर क्रिकेटर हैं और उनकी पॉपुरैलिटी उनकी जीत का एक बड़ा कारण हो सकती हैं। आप तो जानते हैं क्रिकेट और भारतीयों का रिश्ता।

ख़ैर, आतिशी की बात करें तो वो बेहद पढ़ी-लिखी हैं और काफ़ी सालों से ना सिर्फ पॉलिटिक्स बल्कि कई सामाजिक मुद्दों से भी जुड़ी रही हैं। उनके माता-पिता दिल्ली यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर हैं। आतिशी का मिडल नेम मर्लेना, उनके माता-पिता ने जाने माने सामाजिक क्रांतिकारी मार्क्स और रशियन रेव्ल्यूशनरी लेनिन का नाम जोड़कर रखा था।

आतिशी बड़ी हुईं तो उन्होंने अपना सर नेम हटाकर आतिशी मर्लेना ही लिखना शुरू कर दिया था क्योंकि वो चाहती थी लोग उनका काम पहचाने ना कि ये कि वो कौन सी जाति या किस धर्म से आती हैं।

आतिशी सेंट स्टीफंस कॉलेज दिल्ली से इतिहास में ग्रेजुएट हैं और इसी विषय पर उन्होंने स्कॉलरशिप के ज़रिए ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी, इंग्लैंड से मास्टर्स पूरी की। पब्लिक पॉलिसी में हमेशा से ही आतिशी की रूचि रही है इसलिए जब AAP का सबसे बड़ा आंदोलन दिल्ली में हो रहा था तो वो काफ़ी प्रभावित हुईं और पार्टी की पॉलिसी फॉर्मेशन टीम में शामिल हो गईं ताकि लोगों के लिए अच्छे से अच्छा काम किया जा सके। 2015 में वो मध्य प्रदेश में होने वाले जल सत्याग्रह के साथ भी बारिकी से जुड़ी हुई थीं। आतिशी एक बेहतरीन पॉलिसी मेकर है।

चुनाव में आतिशी के वादे और उनसे उम्मीद

आतिशी कहती हैं कि अगर वो जीतती हैं जो शिक्षा, स्वास्थ्य, महिला सुरक्षा और गुड गवर्नेंस पर काम करेंगी। आतिशी से दिल्लीवालों को भी यही उम्मीद रहेगी कि वो अपनी शिक्षा और अनुभव का इस्तेमाल करके दिल्ली के इलाकों में अच्छा काम करें। आतिशी से उम्मीद इसलिए भी बढ़ जाती हैं क्योंकि वो ख़ुद एक स्कॉलर परिवार से आती हैं और अच्छी खासी पढ़ी लिखी हैं।

एक समझदार महिला और सामाजिक कार्यों में अपना ज्यादातर समय लगाने वाली आतिशी से महिलाओं की सुरक्षा के लिए भी कड़े कदम उठाने की उम्मीद है। ज्यादातर नेता पावर में आने के बाद जनता को भूल जाते हैं लेकिन सामाजिक कार्यकर्ता होने के नेता आतिशी से उम्मीद है कि वो जनता से जुड़ी रहेंगी।

आतिशी कहती हैं, “हमारे समाज में औरतों को बलिदान का पर्याय बना दिया गया है। औरतें अपने परिवार के लिए अपना करियर, पढ़ाई सब कुछ त्याग कर देती हैं। राजनीति जैसा प्रोफेशन बहुत डिमांडिंग और आपका काफ़ी समय मांगता है। इसलिए शायद पुरुषों के मुकाबले महिला उम्मीदवार कम होती हैं। लेकिन अब समय बदल रहा है क्योंकि महिलाएं अब जागरूक हो रही हैं। शिक्षा और युवा महिलाओं की भागीदारी के कारण हम और ज्यादा महिलाओं से राजनीति में आने की उम्मीद कर रहे हैं।”

शिखा राय (बीजेपी)

49 साल की शिखा राय दिल्ली के ग्रेटर कैलाश से बीजेपी की महिला उम्मीदवार हैं। वो लगभग तीन दशकों से बीजेपी की सक्रिय सदस्य रही हैं। प्रोफेशन से शिखा एक वकील हैं और 22 साल से प्रैक्टिस कर रही हैं ।

शिखा राय ने अपनी पूरी पढ़ाई पंजाब यूनिवर्सिटी से ही पूरी की। उन्होंने BA.Hons, MA English के बाद LLB की पढ़ाई की। शिखा दिल्ली बीजेपी की महिला मोर्चा की अध्यक्ष भी हैं जिसके तहत वो महिला सुरक्षा, महंगाई, भ्रष्टाचार जैसे कई अहम मुद्दों पर जागरूकता अभियान करती रहती हैं। उन्होंने 26 जनवरी 2011 को श्रीनगर के लाल चौक पर कर्फ्यू और अलगाववादियों के हंगामे के बीच तिरंगा लहराया था।

शिखा राय विचारों से लिबरल हैं और सभी धर्मों को समान समझती हैं। इससे पहले वो साउथ MCD की पहली महिला स्थायी समिति की अध्यक्ष भी रह चुकी हैं। उन्हें तब निर्विरोध चुना गया था।

चुनाव में वादे, शिखा से उम्मीद

शिखा दावा करती हैं कि उनके विधान सभा सीट ग्रेटर कैलाश में पिछले 5 साल से कुछ खास काम नहीं हुआ और MLA फंड का पैसा सिविक कामों में लगाया जा रहा है जबकि सिविक बॉडीज़ को अलग से फंड दिया जाता है। वो कहती हैं कि एक नेता का काम लोगों के बीच जाकर उनकी समस्याएं सुनकर सुलझाना है। शिखा महिला सुरक्षा, प्रदूषण, पार्किंग, शिक्षा जैसे कई मुद्दों को अहम मानती हैं और उनपर काम करना चाहती हैं।

शिखा वकील होने के नाते काफ़ी पढ़ी लिखी हैं और ख़ुद एक पत्नी और मां भी हैं। इसलिए हमें उनसे उम्मीद है कि वो औरतों की ज़रूरतों और समस्याओं को समझकर उसपर काम करेंगी। प्रदूषण बेशक जानलेवा हो चुका है इसलिए अगर वो इसके लिए कुछ ठोक कदम उठा पाती हैं तो जनता को काफ़ी फायदा होगा। MCD में कई साल काम करने का उनका अनुभव की दिल्ली की बेसिक समस्याएं जैसे पार्किंग, सड़कें वगैरह खत्म करने में काम आएगा।

चुनावों में महिलाओं की भागीदारी पर शिखा कहती हैं, “बदलाव के लिए महिलाओं का प्रतिनिधित्व बेहद ज़रूरी हैं। संख्या ज़रूर बढ़नी चाहिए लेकिन मौका उन्हें ही मिलना चाहिए जो इसके लिए उपयुक्त हैं। समय बदल रहा है और महिलाओं का प्रतिनिधित्व राजनीति में बढ़ना एक अच्छा सूचक है।”

अलका लांबा (कांग्रेस)

दिल्ली की चांदनी चौक सीट से कांग्रेस की अलका लांबा उम्मीदवार हैं। 44 साल की अलका अपने बेबाक अंदाज़ से किसी ना किसी वजह से ख़बरों में रहती ही हैं। राजनीति में उन्होंने अपना सफ़र 19 साल की उम्र में ही शुर कर दिया था। जब वो दिल्ली यूनिवर्सिटी में B.Sc की छात्र थी तो उन्होंने कांग्रेस की स्टूडेंट विंग NSUI ज्वाइन कर ली थी और 1995 में दिल्ली यूनिवर्सिटी के छात्र चुनाव जीतकर अध्यक्ष बन गईं । 2 साल बाद ही उन्हें NSUI की ऑल इंडिया अध्यक्ष बना दिया गया। वो

2002 में ऑल इंडिया महिला कांग्रेस की और 2006 में दिल्ली प्रदेश कांग्रेस कमेटी की जेनेरल सेक्रेटरी बन गई। उनका राजनीतिक करियर काफ़ी तेज़ी से आगे बढ़ता गया और कच्ची उम्र में ही वो राजनीतिक में पक्की हो गईं।

अलका लांबा का एक NGO भी है GO INDIA FOUNDATION, जिसका काम महिलाओं और युवाओं भारत के राजनीतिक, सामाजिक और पर्यावरण सुधार में महत्वपूर्ण अंग बनाना है। ये NGO विशेषकर महिलाओं के लिए काम करता है। अलका काफ़ी अच्छी पब्लिक स्पीकर हैं और महिला सशक्तिकरण, मानवाधिकार और सस्टेनेबेल डिवलपमेंट के मुद्दों पर वो UK, रशिया, चीन जैसे कई देशों में हज़ारों सेमिनार में स्पीच भी दे चुकी हैं।

अलका लांबा के वादे और उनसे उम्मीद

सालों से अलका लांबा राजनीति के साथ-साथ सामाजिक कामों से भी जुड़ी रही हैं। वो दावा करती हैं कि वो विधानसभा में आएंगी तो महिलाओं, बेरोज़गारी, पर्यावरण से जुड़े कई काम करेंगी। क्योंकि वो सालों से इस दिशा में पहले से ही काम कर रही हैं इसलिए उनसे हमारी उम्मीद भी बढ़ जाती है कि उनका आना दिल्ली वालों के लिए फायदेमंद साबित हो सकता है।

अलका कहती हैं, “महिलाओं को आगे आने से कोई नहीं रोक सकता। बेहतर माहौल और शिक्षा से वो कुछ भी हासिल कर सकती हैं। जैसे महिलाएं हर क्षेत्र में आगे आ रही हैं वैसे ही राजनीति में भी ये शुरू हो चुका है और जल्द ही नए बदलाव देखने को मिलेंगे।”

ये महिलाएं भले ही अलग-अलग दलों से हैं लेकिन इनसे हमारी एक सी उम्मीद हैं। ऐसी पढ़ी-लिखी महिलाएं जनता का मार्गदर्शन करेंगी और अपने किए हुए वादे पूरे करेंगी तो वो किसी एक वर्ग या दल के लिए नहीं बल्कि समाज की हर महिला के लिए प्रेरणादायी होगा।

क्योंकि आपमें से भी कई लोग दिल्ली से होंगे और अपने मताधिकार का इस्तेमाल आपने किया होगा। इसलिए आप भी हमारे साथ अपने विचार साझा कीजिए कि आप क्या सोचते हैं महिला उम्मीदवारों के बारे में? या फिर आपकी उनसे क्या उम्मीद होती हैं? और क्या आपको लगता है कि महिला उम्मीदवार पुरुषों की अपेक्षा अच्छा काम करती हैं?

मूल चित्र : Wikipedia/Twitter 

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