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सावित्री बाई फुले की 189 वीं जयंती – उनके नारीवादी विचार अभी भी प्रासंगिक हैं  

सावित्री बाई फुले की 189 वीं जयंती पर याद करते हैं भारत की पहली स्कूल हेडमिस्ट्रेस सावित्रीबाई फुले जो अपने समय से काफी आगे थीं।

सावित्री बाई फुले की 189 वीं जयंती पर याद करते हैं भारत की पहली स्कूल हेडमिस्ट्रेस सावित्रीबाई फुले जो अपने समय से काफी आगे थीं।

अनुवाद : पल्लवी वर्मा 

सावित्री बाई फुले की 189 वीं जयंती मना रहे हैं हम क्यूंकि भारत की पहली स्कूल हेडमिस्ट्रेस सावित्रीबाई फुले अपने समय से काफी आगे थीं, नारीवाद और महिलाओं के अधिकार के बारे में उनके विचार आज भी प्रासंगिक हैं।

“जाओ, शिक्षा प्राप्त करो
आत्मनिर्भर बनो, मेहनती बनो
काम करो – ज्ञान और धन इकट्ठा करो,
बिना ज्ञान के, सब खो जाता है
हम ज्ञान के बिना, पशु बन जाते हैं,
बैठो बेकार नहीं, जाओ, शिक्षा प्राप्त करो
दीन दुखियों के, दुखों का अंत करें,
आपको सीखने का एक सुनहरा मौका मिला है,
इसलिए जाति की जंजीरों को तोड़ना सीखो।”

यह सावित्री बाई की कविता है

सावित्री बाई ने यह कविता पीड़ितों, दलितों को प्रोत्साहित करने के लिए लिखी ताकि वे शिक्षा प्राप्त करके खुद को सशक्त बना सकें। 3 जनवरी को उनकी 189 वीं जयंती है।

सावित्री बाई फुले पहने हुयी साड़ी के अतिरिक्त अक्सर साथ में एक और साड़ी लेकर स्कूल जाती थीं। उनके ऊपर अक्सर पत्थर, गाय-गोबर से हमले किए जाते थे और उन पर तंज कसे जाते थे। अत्यंत रूढ़िवादी दिमाग होने के कारण लोगों का मानना ​​था कि शिक्षा केवल उच्च जाति के लिए आरक्षित होती है। ऐसे में, अपने पति के साथ औरतों के लिए स्कूल चला कर, उन्होंने लोगों को त्रस्त कर दिया। 

स्कूल शुरू करके, उन्होंने उस रवैये के खिलाफ विद्रोह किया। अपनी जाति और जेंडर के कारण, उन्हें शिक्षा से वंचित कर दिया गया था। उनकी शादी कम उम्र में हो गई थी लेकिन उनके पति, ज्योतिराव फुले, ने उन्हें शिक्षित किया। दोनों ने 1851 के अंत तक तीन अलग-अलग स्कूलों को संचालित किया।

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सही मायनों में विद्रोही थीं सावित्री बाई 

सावित्री बाई भारत की पहली शिक्षिका और प्रधानाध्यापिका हैं। उन्होंने देश में बहुत सारे सामाजिक सुधार किये हैं और पुणे विश्वविद्यालय ने उनके प्रयासों को मान्यता दी। 2015 में, पुणे विश्वविद्यालय का नाम बदलकर सावित्री बाई फुले पुणे विश्वविद्यालय कर दिया गया। उन्होंने कई दलित आंदोलनों को गति दी। इसलिए, उन्हें ‘आई ‘ कहा जाता है, जो एक मराठी शब्द है, इसका अर्थ है ‘माँ’।

ज्योतिराव फुले ने अपनी पत्नी को खुद शिक्षित किया। वे दोनों समाज के निचले तबके से ताल्लुक रखते थे और दोनों को शिक्षा से वंचित रखा गया था। अपनी शिक्षा प्राप्त करने के बाद, उन्होंने दो शिक्षक प्रशिक्षण कार्यक्रमों में दाखिला लिया। वे एक प्रशिक्षित शिक्षिका थी।

 इस दंपति ने, 1848 में पुणे के भिडेवाडा में महिलाओं के लिए देश का पहला स्कूल शुरू किया, जिसके  पाठ्यक्रम में गणित, विज्ञान और सामाजिक अध्ययन का समावेश किया गया था। यह पश्चिमी शिक्षा से प्रभावित था। इनके स्कूल का पाठ्यक्रम उस समय के सरकारी स्कूलों में उपलब्ध कराए गए पाठ्यक्रम और शिक्षा से बेहतर था। उनके स्कूलों में नामांकित लड़कियों की संख्या सरकारी स्कूलों में नामांकित लड़कों की संख्या से भी अधिक थी।

इस दंपति ने बहुत से सुधार किये। उन्होंने अपनी जाति या जेंडर की परवाह किए बिना सभी को शिक्षित किया। और गर्भवती, बलात्कार पीड़ितों के लिए ‘बाल हत्या प्रतिबंधक गृह’ (बाल-हत्या निषेध गृह) नामक एक देखभाल केंद्र खोला ताकि बच्चों को जन्म देकर, उनकी देखभाल इस सुरक्षित स्थान पर आराम से की जा सके ।यह उस समय में अभूतपूर्व था। उनके द्वारा किए गए सभी प्रयासों ने बहुत सारे सामाजिक बदलाव लाने में मदद की।

भारत में नारीवादी आंदोलन के अग्रणी

महिलाओं की शिक्षा में उनका योगदान अद्वितीय है। उनने विधवा पुनर्विवाह के लिए लड़ाई लड़ी और सती प्रथा और कई अन्य सामाजिक कुरीतियों, जिसमें महिलाओं को निशाना बनाया जाता था, के खिलाफ आवाज़ उठाई। सबसे उल्लेखनीय आंदोलन में से एक ‘नाई हड़ताल’ थी। यह हड़ताल विधवाओं के मुंडन के खिलाफ थी।

महिला सेवा मंडल का गठन 1852 में किया गया था। सावित्री बाई ने अपनी सामाजिक स्थिति और अधिकारों के संबंध में महिलाओं में जागरूकता पैदा करने के लिए आंदोलन का नेतृत्व और पहल की। अपने पति की मृत्यु के बाद, उन्होंने शिक्षा और जागरूकता के माध्यम से दलितों को सशक्त बनाने के लिए सत्य शोधक समाज में अध्यक्षीय भूमिका निभाई।

सावित्रीबाई की मौत भी वीरों जैसे ही हुई, क्यूँकि वे एक व्यक्ति को प्लेग से बचाने की कोशिश कर रहीं थीं। और इस बीमारी की चपेट मे आकर उनकी मृत्यु हो गई। पुणे सिटी कॉरपोरेशन ने उनके लिए 1983 में एक स्मारक भी बनाया।

(इस पोस्ट को प्रकाशित करते हुए ये पता चला है कि हाल ही में पारित नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) का विरोध करते हुए, दिल्ली, मुंबई, चेन्नई, कोलकाता, अहमदाबाद, बेंगलुरु और रांची में महिलाएं और LGBTQI + समूह आज सावित्री बाई फुले की 189 वीं जयंती पर एक राष्ट्रीय मार्च का आयोजन कर रहे हैं। वे आज भी सावित्री बाई से प्रेरित हैं!)

मूल चित्र : Google 

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Snigdha Nalini Oreya

A Journalism student. When not busy with college and assignments, I read a lot. Big time foodie and dog mom. Pop culture, feminism and news gets me excited. read more...

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