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शिक़स्त दिल और मायूसी – इश्क़ किया या गुनाह किया!

Posted: January 7, 2020

रिश्तों के टूटने पर दिल से निकलती है ये दुआ, ” जाओ आजा़द किया तुम्हें हमारे ख्यालों की हवालात से, शायद मेरी फिजा़ का तुम पर कुछ असर हो जाए?”

हमारा दिल चकनाचूर करके ऐसे आगे बढ़ गए जैसे कोई रिश्ता ही ना था,
बिखरे हुए टुकड़ों के जनाजे़ में ऐसे शामिल हुए जैसे कोई रिश्ता ही ना था,
फिजा़ओं में हमारे बे-सिला इश्क के तराने उन्होंने अनसुने कर दिए, जैसे कोई रिश्ता ही ना था!

उनका दावा है कि हमारी सलामती की दुआ मांगते हैं,
मगर क्या वह इस बात से अनजान हैं…
कि हमारी खुशियां भी उनकी मोहताज है?

बगुलों की भीड़ में हंस चुना था,
हंस को खुद पर ऐतबार ही न था…
बगुलों में जा शामिल हुआ

कभी हम आपके लिए बहुत ज़हीन हैं,
कभी ज्या़दा रंगीन
ऐसे ही पैमाने बदलते रहे हज़ूर,
तो इश्क क्या… इसकी ख़ाक भी ना हाथ आएगी!

सिर्फ तुम्हारा वक्त ही तो मांगा था,
कम जरफी की इंतहा होती है,
कुछ लम्हें भी ना खर्च कर पाए, हम पर?

इश्क से अश्क तक का फासला कब तै करवा दिया तुमने
राजा़ भी न थी, दिल भी न था
यह कैसी जबरदस्ती थी,
तुमने हमको लूट लिया!

हमें हमारा गुनाह तो बता देते, मिर्जा़
हमारा गुनाह क्या था?
तुम्से मोहब्बत?
यह गुनाह तो हम कयामत तक करेंगे,
सुनवाई के लिए आओगे ना?

ए बर्बाद करने वाले,
तेरे लिए आज भी, दिल से दुआ ही निकलती है,
तूने हमें किसी का ना छोड़ा,
ना अपना बनने दिया…

दिल का ज़ख्म भरते भरते भरेगा,
तीर निशाना चूक गया…
दिल पर निशाना था,
मगर रूह को चीर गया

आ जाओ तुम भी हमारी बर्बादी का जलसा देखने,
दुनिया वाले शरीख हो चुके हैं,
मेहमान ए खास का इंतजा़र है…

दिल हल्का करने की ख्वाहिश है आज,
तुम्हारे दरवाजे़ पर दस्तक देने की ख्वाहिश है आज,
दिल के मंसूबों को अंजाम तक पहुंचाने की ख्वाहिश है आज,
एक रहनुमा की ख्वाहिश है आज,
अर्जी़ दे दीजिए हुजू़र मंजूर करने की ख्वाहिश है आज

खामोश है वो जश्ने बर्बादी पर,
नज़रबंद है वो हमारी तन्हाई से आज,
दिल के काफिले मोड़ लिए उन्होंने हमारी गली से आज
जब आज ही इतना कहर ढा़ रहा है…
तो मुस्तकबिल से क्या डरना?

दुनिया के लिए नकाब पहन लिया है पर ज़हन को अपने दिले जिगर से कैसे छुपाए?
हां वादा किया था तुमसे ताल्लुक नहीं रखेंगे,
एक वादा आज हम भी तोड़ के देखते हैं…

गम देकर, किस गम से हमें बचा रहे थे?
फकीर को फकीरी पढ़ा रहे थे,
ऐसे फजू़ल काम ना किया करें मियां…
ज़माने में मसले बढाया ना करें मियां

यादें इजात हुई थी कि रोंद दी गई
सांसे तेज़ हुई ही थीं, कि दबा दी गईं
लभ पे हाल-ए-दिल आने के खौफ से जो तूने
इश्क का जनाजा़ निकाल दिया
तो रिहा हुए तुम बिन बोले वायदे से…

कागज़ के पन्नों की स्याही के बीच उलझी यादें,
कलम ने तो बेजोड़ कोशिश की थी…
मगर जब इश्क ही दम तोड़ दे,
तो कागज और कलम की इस लड़ाई में… शिकस्त तो मरासिम की हुई ना?

जो इश्क शुरू होने से पहले खत्म हो जाए, ऐसे इसका क्या गम करना?
जो आशिक आशिकी से घबराए, ऐसे आशिक से क्या गिला रखना?
जाओ आजा़द किया तुम्हें हमारे ख्यालों की हवालात से…
शायद मेरी फिजा़ का तुम पर कुछ असर हो जाए?

मूल चित्र : Canva 

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Neha is a Professor of Mass Communication. An erstwhile Copywriter and Corporate communications specialist, she

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