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एक और एक ग्यारह – एक कहानी एक रिश्ते की ज़ुबानी

Posted: January 23, 2020

सास-बहु के रिश्ते कोमहामाया ने बहुत ही ख़ूबसूरती से इस सुंदर कहानी में पिरोया है, ” यह क्या कह रही है तम्मना! सपने में अपनी दिल की बात कह रही है?”

तम्मना अपने ससुराल में हमेशा सहमी-सहमी रहती। उसकी और प्रशान्त की शादी को दो साल हो गए थे फिर भी उसे यह घर अपना नहीं लगता। प्रशान्त का छोटा सा परिवार था, वो और उसके माता-पिता।

तम्मना के ससुर फौज के रिटार्यड अफसर थे। वह समय के बड़े पाबंद थे। उसकी सासु माँ सरला देवी भी बड़ी दबंग थी। घर के हर मामले में उनकी पैनी नजर रहती थी। घर का छोटा-बड़ा हर फैसला वह ही लेती थी। घर में किसी भी चीज की कमी नहीं थी।

ऐसी बात नहीं थी कि उसके सास-ससुर तम्मना को किसी तरह की तकलीफ देते या उस पर अत्याचार करते थे। बल्कि वह तो उसकी हर जरूरत का ख़्याल रखते थे। पर इस घर में सब कुछ बड़ा औपचारिक था। यहाँ ना तो कोई तम्मना के घर की तरह आपस में गप्पें लगाता ना ही कोई दिल खोलकर हँसता था। दम घुटने लगा था उसका यहाँ।

प्रशान्त भी उससे कटे-कटे रहते थे। शादी के पहले दिन से ही उसके पति ने कभी उससे सीधे मुँह बात नहीं की।दूसरों के सामने वह सामान्य रहते पर अकेले में उनकी बातचीत हाँ-ना तक सीमित थी। पूछने पर भी अपने इस व्यवहार का कोई कारण वह बताते नहीं थे।

उनकी चट मंगनी और पट विवाह हुआ था। एक दूसरे को समझने का उन्हें कोई मौका नहीं मिला। तम्मना आगे पढ़ना चाहती थी परन्तु उसके परिवारवालों को इतना अच्छा रिश्ता हाथ से निकल जाना मंजूर नहीं था। उसे कहा गया कि आगे की पढ़ाई तो शादी के बाद भी की जा सकती है। तम्मना इस बारे में प्रशान्त से साफ-साफ बात करना चाहती थी, पर उसे यह कह कर रोक दिया गया कि इतने आधुनिक विचारों वाले परिवार को पढ़ाई से क्या परहेज होगा।

शादी के बाद तम्मना की हिम्मत ही नहीं हुई कि वह अपने पति से इस बारे में बात करे और सास-ससुर से तो बात करने का सवाल ही नहीं उठता था। तम्मना सबके रहते हुए भी खुद को  बड़ा अकेला महसूस करने लगी थी।अपने मायके में वह किसी को तकलीफ नहीं देना चाहती थी। कोई नहीं था जिससे वह अपनी दिल की बात करती। अपने मायके में सदा खिलखिलाने वाली तम्मना बुझी-बुझी रहने लगी थी। इसी तरह गुज़र रही थी जिंदगी।

सरला सुबह-सुबह डायनिंग टेबिल पर अकेले ही चाय पी रही थी। प्रशान्त कल ही आफिस के काम से एक सप्ताह के लिए शहर से बाहर गया है। मेजर साहब रोज की तरह सुबह की सैर पर निकले हैं। तम्मना शादी के बाद से रोज उनके साथ सुबह की चाय पीती है। सुबह-सुबह नहा-धोकर तैयार हो कर मेज़ पर आ जाती है। पता नहीं आज क्या हो गया, सात बज गए पर अभी तक अपने कमरे से नहीं निकली।

यूँ तो सरला को सालों से अकेले ही खाना-पीना करने की आदत थी, पर प्रशान्त की शादी के बाद से तम्मना उसके साथ-साथ ही रहती है। उनके बीच अधिक बातचीत नहीं होती पर तम्मना का आसपास रहना सरला को अच्छा लगता है। बड़ी प्यारी बच्ची है तम्मना, पर उसे देखकर लगता है कि कुछ परेशान सी रहती है।

सरला ने कई बार सोचा कि उससे बात करे पर सास का ओहदा उसे ऐसा करने से रोकता। तम्मना को देखकर उसे अपना समय याद आता है। भरे-पूरे परिवार से जब वह ब्याह कर इस परिवार में आई तो उसे अजीब सा लगता था। उसके पति अधिकतर बाहर रहते थे। उसका सारा समय नौकरों के साथ बीतता।

मेजर साहब की अनुपस्थिति में घर और प्रशान्त की सारी जिम्मेदारी उठाते-उठाते कब वह भोली-भाली सरला से दबंग सरला मेमसाहब बन गई, उसे पता ही नहीं चला। सोचा था कि प्रशान्त की शादी के बाद अपनी बहू के साथ खूब गप्पें लगाएगी और अपनी बहू की सारी इच्छा पूरी करेगी। पर तम्मना के शांत स्वभाव और उसके ओहदे ने उसे ऐसा करने नहीं दिया। सरला अपनी ही सोच में डूबी हुई थी, रसोइए के पुकारने पर वह वर्त्तमान में वापस आई।

रसोइए को नाश्ते की हिदायत देकर सरला ने घड़ी की तरफ देखा-आठ बज रहे थे। मेजर साहब तो सैर से सीधे जिम चले जाते हैं। उनके लौटने में अभी समय है। पर तम्मना अभी तक अपने कमरे से नहीं निकली! सरला चिन्तित हो गई। वह उठकर तम्मना के कमरे की तरफ बढ़ी।

११(ग्यारह)

तम्मना को अपनी माँ की बड़ी याद आ रही थी। कल शाम से ही सिर भारी सा हो रखा है। प्रशान्त तो सुबह पांच बजे ही निकल गए। वह भी मेनगेट तक गई थी उनके साथ। जब उनकी कार आँखों से ओझल हो गई तब वह वापस अपने कमरे में आ गई। अजीब सा महसूस हो रहा है। घड़ी की तरफ देखा तो साढ़े पांच ही बजे थे, सोचा आधा घंटा आराम करके छह बजे नहाने जाएगी।

तम्मना के कमरे के बाहर आकर सरला थोड़ी देर के लिए ठिठकी-अन्दर जाए या नहीं! फिर दरवाजे पर हल्के से हाथ रखा, हाथ रखते ही दरवाज़ा खुल गया। सरला ने हल्के से तम्मना को पुकारा पर कोई जवाब नहीं आया।अब सरला से रहा नहीं गया, वह धीरे से कमरे के अंदर गई।

खिड़की पर टंगे गुलाबी परदे से सूरज की रोशनी छन-छन कर कमरे के अंदर आ रही थी पर कमरे की लाइट अभी भी जल रही थी। बिस्तर पर तम्मना बड़ी गहरी नींद में सो रही थी। उसके मासूम चेहरे पर हल्की मुसकान थी। सरला धीरे से उसके पास गई और प्यार से उसके माथे पर हाथ रखा। तम्मना के माथे पर हाथ रखते ही सरला चौंक पड़ीं, उसे तेज बुखार था।

“माँ तुम आ गयीं “, तम्मना ने अपने माथे पर रखे हाथ को पकड़ते हुए कहा।

“तुम्हारी बड़ी याद आ रही थी। तुम्हें बहुत कुछ बताना है। काफी समय से सोच रही थी कि तुम्हें अपने दिल की बात बताऊँ पर…”

“अच्छा माँ, पहले तो तुम्हे कुछ बताने में झिझक नहीं होती थी। तो क्या शादी के बाद बेटियां सचमुच पराई हो जाती हैं? अगर तुम पराई हो तो मेरा अपना कौन है माँ? प्रशान्त? पर वो तो मुझसे सीधे मुँह बात ही नहीं करते। किससे कहूँ कि मुझे आगे की पढ़ाई करनी है, मुझे पहले की तरह खुल कर जीना है, ठहाके लगाकर हँसना है?”

यह क्या कह रही है तम्मना! सपने में अपनी दिल की बात कह रही है। क्यों नहीं सरला उसकी माँ बन सकी! क्यों उसके रहते उसे यहाँ अकेलापन लगा! सरला का मन तड़प उठा।

सरला ने प्यार से तम्मना के माथे को चूमा। प्यार से उसे पुकारा। तम्मना ने धीरे से आंखें खोली। सामने सासु माँ को देखकर धड़पड़ा कर उठकर बैठ गई। तम्मना के उठते ही सरला ने उसे गले से लगा लिया।

पहले तो तम्मना चौंक गई पर सरला के आलिंगन में उसे माँ की ममता का अहसास हुआ और वह भी छोटी बच्ची की तरह सरला से लिपट गयी।

मूल चित्र : Canva 

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