बच्चों का व्यक्तित्व संवारें : यूँ ही अपने बच्चों का बच्चपन ना छीनें!

Posted: January 22, 2020

घर के बच्चों को जितना डांट कर रखा जाता है, वो बच्चे उतने ही दब्बू, संकोची, और कभी-कभी गुस्सैल भी हो जाते हैं, आप एक मार्गदर्शक की तरह उनको देखें। 

“अरे वीना! बहू कहां हो तुम?”

“इन बच्चों को देखो! घर में मेहमान आने वाले हैं…”

“तुम्हारे पापा के दोस्त मिस्टर गुप्ता अपनी फैमिली के साथ आयेंगे और हमारे घर के ये बंदर तो उछल-कूद करने से बाज़ ही नहीं आते। घर को देखकर तो ऐसा लगता कि अभी यहां कोई तूफ़ान आकर गया हो। सब सामान यहां से वहां…”

“तुम भी कुछ समझाती नहीं हो इन शैतान बच्चों को…”, उषा जी ने अपनी बहू वीना को गुस्से में कहां और चल पड़ीं अपने कमरे की तरफ।

“माँ आप चिंता मत करिए, मैं इन बच्चों को पार्क में भेज दूंगी इनके पापा के साथ, घर भी साफ कर दूंगी अंकल आंटी के आने से पहले”, वीना ने कहा।

“ठीक है बहू, देख लेना उनके सामने बच्चें किसी प्रकार की कोई शैतानी ना करें, उन्हें बुरा लगेगा।”

फिर वीना ने अपने दोनो बच्चों को पार्क जाने के लिए तैयार कर दिया और अपने पति रवि से कहा, “जब मैं  फोन करुँगी, तब आप इन दोनों के साथ घर आना, तब तक आप इन्हें पार्क में ही रखना।”

“ओके! अच्छा हम पार्क जा रहे हैं.. फोन याद से कर देना”, रवि ने वीना से कहा।

थोड़ी देर बाद मिस्टर गुप्ता भी अपनी फैमिली के साथ आ गए। गुप्ता अंकल, आंटी और उनके दो बेटे और दो बहुएं और उनके 4 बच्चे सब आए। इन सब को देखकर उषा जी ने बहू की तरफ हंस कर देखा जैसे बोल रही हों  कि पूरी बारात ही ले आए।

सबके चाय-नाश्ता करने तक तो बच्चे चुपचाप बैठे रहे, ऐसा लगा मानो कितने संस्कारी बच्चे हैं। उषा जी उनकी तारीफ करते हुए बोलीं, “आपके बच्चे तो बहुत शांत और सौम्य स्वभाव के हैं…काश हमारे घर में ऐसे बच्चे होते।”

फिर उषा जी बोलीं, “बच्चों आप गार्डन में खेलो… हम सब भी आपस में पुरानी बातें फिर से दोहराते है… कुछ गप्पें हम भी मार लेते हैं।”

इतना सुनते ही बच्चे अपने असली रूप में आ गए। फिर जो खेलकूद, शैतानियां शुरू हुईं, उनकी शोर-शराबा पूरे घर में सुनाई दे रहा था। और उन बच्चों को उषा जी कुछ बोल नहीं पा रही थीं। उनकी शैतानियों को नज़रअंदाज ही करना पड़ा।

इसी बीच रवि भी अपने बच्चों के साथ वापिस आ गए। फिर तो सभी बच्चों ने मिलकर सामान को हिलाना शुरू कर दिया। खिलौने यहां से वहां, कोई चीज़ ना मिलने पर उनका रोना, लड़ाई करना, आपस में साथ खेलना, लड़ना, फिर एक हो जाना यही उनका खेल था।

उषा जी की हालत ऐसी हो गई कि मानो उन्हें सांप सूंघ गया हो, बिल्कुल चुपचाप बैठ कर बस बच्चों को ही देख रही थीं। सबको लगा कि उन्हें बच्चों की चिंता है। सच्चाई क्या थी यह तो सिर्फ उनकी बहू वीना जानती थी कि मांजी की हालत बहुत खराब है क्यूंकि पानी उनके सर के ऊपर से जा रहा है और वो कुछ नहीं कर पा रही हैं।लेकिन अपने बच्चों को इस प्रकार से खेलते हुए देखकर गुप्ता परिवार और वीना काफी खुश थे…और आपस में बात कर रहे थे कि बच्चों की यही उम्र होती है खेलकूद की, यदि इस समय उनके साथ जबरदस्ती की जाए तो उनका पूर्ण विकास नहीं हो पाता।

बच्चों का शारीरिक, मानसिक और तार्किक विकास और उनका पूर्ण व्यक्तित्व भी इसी पर निर्भर करता है। बच्चों की शैतानियों और उनकी हंसी ठिठोली से घर पूर्ण घर बनता है, उनके बिना तो कोई घर घर ही नहीं लगता।

घर के बच्चों को जितना डांट कर रखा जाता है, वो बच्चे उतने ही दब्बू, संकोची, और कभी-कभी गुस्सैल भी हो जाते हैं।

बच्चों के साथ कभी भी जबरदस्ती नहीं करनी चाहिए, बच्चों को जैसा करना चाहे वैसे करने देना चाहिए।

आप उन पर अपनी नज़र रखें ताकि उनके बर्ताव से किसी को कोई तकलीफ़ ना हो और उन्हें भी कोई नुकसान न हो। आप एक मार्गदर्शक की तरह उनको देखें, उनकी हेल्प करिए…उन्हें साधन उपलब्ध कराएं, तब देखिए आपका बच्चा आपका मित्र बन जाएगा और आपकी सभी बातों को सुनेगा, मानेगा, स्वीकार भी करेगा। और आगे चलकर आपका और अपना नाम भी रोशन करेगा।

आप सब का इस संबंध में क्या विचार है? क्या हमे अपने बच्चों पर लगाम कसनी चाहिए या फिर उन्हें स्वतंत्र छोड़ देना चाहिए?

आप सब भी अपने अमूल्य विचारों को व्यक्त करें, आप मुझे लाइक, कॉमेंट और मेरे ब्लॉग को शेयर भी करें

मूल चित्र : Canva

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