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पितृतंत्र के दंश का अंत अब हमारे हाथों होगा

Posted: दिसम्बर 10, 2019

वह कपड़ों पर इस्त्री कर रहा था, और उसकी आँखें टीवी पर आ रहे एक भावुक दृश्य को देखकर लगातार बह रही थीं, वह मुस्कुरा कर उठ गई और रसोई की तरफ चल दी।

पीड़ा में रोने की चाहत होती है, लेक़िन,
क्या करें, स्कन्धों पर बोझ है पुरुषत्व का!

रात का सन्नाटा भी उसके कदम नहीं रोक पा रहा था। वह रमणी द्वंदातीत अपने विरस अधरों पर जीभ फिराते हुए बढ़ी जा रही थी। कुछ दूर पर उसके कदम रुक गए थे। सामने एक पुरानी झोपड़ी थी। खपरैल की काली छत, सफेद चूने से पुती दीवारें और लोहे की लंबी डंडी वाली खिड़कियाँ। वहाँ की नीरवता, चुम्बकीय तथा शब्दातीत थी।

घर के वाम-पक्ष में एक छोटी सी राशन की दुकान थी। दुकान में एक छोटी सी शीशे की अलमारी भी थी। अलमारी में शीशे की छोटी-छोटी शीतल पेय की बोतलें रखी थी। एक किनारे पर सिगरेट के डब्बों की कतार लगी थी। उसके नीचे ही ब्लैक मोंक और गॉडफादर की बोतलों की कतारें भी थीं। ऐसे निर्जन स्थान पर, जहाँ विधुतीकरण की सूक्ष्म उपस्थिति भी नहीं समझ में आ रही थी, वहाँ इन बोतलों को ठंडा रखने की उस अलमारी का होना, विस्मयकारी था।

तभी उसे स्वयं के तृषित होने का अनुभव हुआ। वह आगे बढ़कर गॉडफादर की एक बोतल उठाना चाहती थी, किन्तु अनाधिकार चेष्टा का भय तथा एक अज्ञात ग्लानि ने उसके हाथों को थाम लिया। उस दुकान पर विक्रेता की अनुपस्थिति के बावजूद, एक भय व्याप्त था। वातावरण विस्मय हो उठा था। स्वयं को थामकर, सामने के द्वार से उसने भीतर प्रवेश किया।

घर के भीतर भी अँधेरा था। थोड़ा आगे बढ़ने पर एक स्त्री पर दृष्टि पड़ी। किन्तु वह कुछ बोली नहीं, आगे बढ़ गयी। कुछ और स्त्रियां भी दिखी, परंतु पुरुष एक भी नहीं दिखे। वह कुछ पूछने के लिए आगे बढ़ी ही थी कि एक बूढ़ी स्त्री ने कमरे में जाने का इशारा कर दिया। अपने शरीर के स्पंदन को विस्मृत कर, उसने कमरे में प्रवेश किया।

कमरा बहुत बड़ा था। सामने की दीवार पर एक छोटी खिड़की थी, जिसके पट अधखुले से थे। ऐसा प्रतीत हो रहा था, जैसे बंद खिड़की को खोले जाने का प्रयास जारी था। उसी खिड़की पर रखा एक मिट्टी का पुराना दिया, कमरे में से अंधेरे को तिरोहित कर रहा था।

कई चारपाइयों को मिलाकर एक लंबा बिस्तर बनाया गया था। चारपाई को ऊँचा रखने के लिए, उसके पैरों के नीचे ईंटें लगाई गयी थीं। उस बिस्तर पर अनेक स्त्रियां सो रही थीं। लम्बे केश, छरहरा बदन, शून्य आँखें, शरीर पर एक समान सफ़ेद धोती तथा अधरों पर विचित्र मुस्कान। वह सिहर गयी थी। किन्तु कुछ विशेष शेष था। उनके मध्य एक नवजात शिशु, सफेद कपड़ों में लिपटा शांत सो रहा था।

अनजान भावना से वशीभूत, वह आगे बढ़ी और बच्चे को हाथों में भरकर अपने वक्ष से लगा लिया। स्त्रियों से आच्छादित इस घर में वह शिशु पुरुषों का प्रतिनिधित्व कर रहा था।

“यह किसका बच्चा है?” उसका स्वर तीव्र था।

“रुरु रु…” एक प्रौढ़ स्त्री बोली, किन्तु उसका स्वर अस्पष्ट था।

“क्या?” वह पुनः चीखी।

इस बार कोई उत्तर नहीं। इससे पूर्व की वह पुनः चीखती, पीछे से आए एक अप्रत्याशित सिक्त स्वर ने उसे बांध लिया।

“अपनी वाणी को अकारण कष्ट क्यों दे रही हो। कोई उत्तर नहीं मिलेगा, यह सभी जीवित मुर्दा हैं।”

वह उस स्वर की दिशा में पलटी। लम्बे केश, एकहरा शरीर, श्यामवर्णी रंग, शरीर पर लाल रंग की धोती और आँखों में एक ज्वाला। उनके समान होती हुई भी, वह उन सब से भिन्न थी।

“किन्तु, यह शिशु किसका है?”

उन दोनों की दृष्टि में एक समान प्रकाश था।

“शिशु की माता कौन है, यह किसी भी प्रकार इसके आने वाले भविष्य को प्रभावित नहीं करेगा। इसके द्वंद्व का भी कोई उपचार नहीं हो पायेगा।”

“ऐसा क्यों!”

“आलोचनात्मक समाज इस पर अपेक्षाओं का बोझ डालेगा। पितृतंत्र का वज्र प्रहार इसे कठोर बनाने के लिए प्रयासरत रहेगा। पितृसत्तात्मक समाज इसे पुरुष की एक अशुद्ध व्याख्या समझायेगा। स्वयं की पीड़ा को भूलने का अभिनय कर, झूठे पौरुष का नकाब पहनना इसे सीखना होगा।”

“मर्द को परिभाषित करने हेतु, इसे स्त्री के प्रति कठोर होने की शिक्षा दी जाएगी। इस यात्रा में, इसकी सहायक यह सभी आस-पास पड़ी स्त्रियां भी होंगी। यह ही तो कभी परिचारिका बन इसके पौरुष को झूठी हवा देंगी। यह ही तो कभी निर्बल बन अपनी सभी अपेक्षाओं का बोझ इस पर डालेंगी। समाज ने इनकी उपस्थिति को पूजनीय इस कारण ही तो बनाया है।”

“स्त्री के भीतर के पुरूष का तथा पुरूष के भीतर की स्त्री का अंत करने के लिए नियम निर्धारित किये जाते हैं, मान्यताओं का निर्माण होता है।”

“शक्तिशाली प्रतीत होने वाले ये पुरुष, वास्तव में चिरबन्दी हैं। पितृसत्ता का प्रहार इन्हें ऐसी पीड़ा प्रदान करता है, जिसे वे व्यक्त भी नहीं कर सकते। अपनी पीड़ा को कठोरता के पीछे छिपाने के प्रयास में, अत्याचारी बन जाते हैं। स्वयं को मालिक बनाने की चाह में, स्वयं के ही गुलाम बन जाते हैं।”

“तो क्या सब ऐसा ही रहेगा!”

“बंदिनी, परिचारिका, स्वार्थमयी के अतिरिक्त, स्त्री का एक स्वरूप हम दोनों भी तो हैं, विद्रोहिणी और स्वाधिनी। पुरुष का एक रूप यह बालक भी तो है। तुम इस बालक को ही तो लेने आई हो!”

दरवाजे पर दस्तक के साथ वह जाग गयी थी। वह कपड़ों पर इस्त्री कर रहा था, और उसकी आँखें टीवी पर आ रहे एक भावुक दृश्य को देखकर लगातार बह रही थीं। वह मुस्कुरा कर उठ गई और रसोई की तरफ चल दी। उनके जीवन की इतनी बड़ी खुशखबरी, वह कॉफी के साथ सुनाना चाहती थी!

मूल चित्र : Canva

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