लता मंगेशकर के 11 नए-पुराने गाने जो उनके संगीतमय जीवन की कहानी सुनाते हैं

Posted: December 7, 2019

लता मंगेशकर के 11 नए-पुराने गाने और उनके जीवन के कुछ पल जिसमें साफ़ झलकता है कि जितनी संवेदनशील वह कलाकार हैं उतनी ही नेक इंसान।

१८ नवम्बर की सुबह का अखबार खोला ही था कि लगा जैसे कुछ पलों के लिए दिल की धड़कन रुक गई हो। लता मंगेशकर को अस्पताल में भर्ती कराया गया था। २९ सितंबर को उन्होंने अपना आखिरी गाना रिकॉर्ड किया और अपना ९० वा जन्मदिन मनाया। खबर थी कि लता दीदी को वायरल चेस्ट कंजेशन के कारण ब्रीच कैंडी अस्पताल में भर्ती कराया गया। १८ नवम्बर जा पूरा दिन दिल में अजीब सी बेचैनी थी। लता दीदी का चेहरा, उनके गाने, उनका स्वर कोकिला का खिताब, दुनिया का उनको वंडर वॉइस के नाम से जानना, सब कुछ याद आ गया।

कहीं उन्हें खोने का डर मन में घर करने लगा। अगली सुबह तब राहत दे गई जब उषा मंगेशकर जी का बयान पढ़ा कि लता दीदी की हालत में सुधार है और वो जल्द ही घर आ जाएंगी। कुछ दिन बाद फिर खबर आई की अब दीदी को आईसीयू में ले जाया गया। लेकिन दीदी एक योद्धा कि तरह अपने फेफड़ों कि कमजोरी से लड़कर आईसीयू से भी बाहर आ चुकी हैं।

डॉक्टर्स का कहना था कि ८० दशक तक उनके गायन ने उन्हें इतनी शक्ति दी कि उनके फेफड़े इस बीमारी का मुकाबला कर पाए। दीदी का स्वस्थ हो कर अस्पताल से बाहर आना बताता है कि वो एक सच्ची फायटर हैं। दीदी के इस ज्जबे को कुछ अलग रूप से लिखने का प्रोत्साहन मुझे मिला और मैंने दीदी के हर रूप के बारे में लिखने का सोचा।

उम्र के ९० साल पूरे होने पर लता मंगेशकर ने अपना आखिरी गाना रिकॉर्ड किया और वह मराठी गाना है ‘आता विसाव्याचे क्षण’।  इसका अर्थ है ‘अब विश्रांति के पल’। यह गाना सुनते वक़्त आंखे नम होने लगती हैं। गाना सुनते हुए लगता है जैसे हाथों से कुछ छूट रहा हो। दीदी बस यूं ही गाती रहें और हम यूं ही सुनते रहें। लेकिन यह सोच शायद स्वार्थी हो।

पिछले ८ दशकों से अपनी सुरीली आवाज़ का जादू लोगों पर चलाते हुए दीदी अब थक रही हैं। ८ दशकों तक अपने हुनर से लोगों का मनोरंजन करना और उनका दिल जीत लेना, यह कोई विरला ही कर सकता है।

दीदी की आवाज़ के इस जादू से १९६३ में भारत के पहले प्रधानमंत्री जवहरलाल नेहरू की आंखें भीगीं वहीं ९० के दशक में ‘दीदी तेरा देवर’ गाने पर माधुरी दीक्षित ने ठुमके लगाए। लता दीदी के गाए हुए गानों पर मधुबाला, मीना कुमारी से लेकर माधुरी दीक्षित, श्रीदेवी और काजोल ने अपने होंठ और पैर थिरकाएं हैं। दीदी के गाने हमारे देश की अब चौथी पीढ़ी सुन रही है। दुनिया में शायद ही कोई ऐसा कलाकार हुआ हो जिसने अपने हुनर का इतने लंबे अंतराल तक कामयाबी से जतन किया हो।

दीदी की जीवनी कई लोगों ने लिखी। राजू भारतन उनमें से एक लेखक हैं जिन्होंने लता दीदी के जीवन के कुछ नकारात्मक पहलुओं पर भी रोशनी डाली। दीदी का मोहम्मद रफ़ी के साथ के रॉयल्टी को लेकर मतभेद, एस. डी. बर्मन के साथ अनबन के कारण सात सालों तक एकसाथ काम ना करना, भूपेन हज़ारिका के साथ दीदी का नज़दीकी रिश्ता, अपनी कामयाबी के चलते सुमन कल्याणपुर जैसी गायिका पर हावी होना, ओ. पी. नय्यर का दीदी को कभी भी अपने संगीत में गाना ना गवाना, यह कुछ अनछुए पहलू दीदी ने बिना कोई आपत्ति जताए राजू भारतन को अपनी किताब में छापने की अनुमति दी। दीदी की यह सोच दीदी की ईमानदारी और बड़प्पन का प्रतीक है।

दीनानाथ और शेवांती मंगेशकर के घर २९ सितंबर १९२९ को जन्मी पूत्री हेमा जी आगे जाकर स्वर कोकिला लता मंगेशकर बनीं। अपने गायकी की पहली प्रस्तुति लता ने उम्र के ९ वे साल में दी। उनके पिता एक नाटक कंपनी चलाते थे। एक कलाकार, गायक और दिग्दर्शन कि सारी खूबियां दीनानाथ जी में थी। अपनी बड़ी बेटी की आवाज़ को पहचानते हुए उन्होंने लता को अव्वल तालीम देने की ठानी। इसके चलते लता दीदी ने गुरुओं के रूप में स्वयं अपने पिता, उस्ताद अमानत अली खान, गुलाम हैदर और तुलसीदास शर्मा को पाया। अपनी तालीम के साथ ही उन्हें उम्र के १४ वे साल में मराठी फ़िल्म ‘गाजाभाऊ’ का गाना ‘माता एक सपूत’ गाने का मौका मिला।

दीनानाथ जी ने लता दीदी को स्कूल भेजना चाहा और वह स्कूल गयीं भी लेकिन सिर्फ एक दिन के लिये। आज के युवकों की भाषा में कहा जाए तो शी इस अ स्कूल ड्रॉपआउट (she is a school drop out)! अपने भाई-बहनों को स्कूल में गाना सिखाने की सज़ा उन्हें दी गई और उन्होंने स्कूल जाना ही छोड़ दिया।

फिल्मों में गाने का मौका जब दीदी को मिलने लगा तब कई तरह के लोग और उनके अलग अलग विचार सामने आने लगे। दीदी की आवाज़ को लेकर कई तरह की टिप्पणियां होने लगीं। लेकिन लता दीदी ने सभी बातों को गहराई से सोचा और अपने गायन शैली में बदलाव किया।

१९४८ में बन रही फिल्म शहीद के दिग्दर्शक सशधर चटर्जी ने दीदी की आवाज़ को यह कहकर अस्वीकार किया कि यह आवाज़ बहुत पतली है और प्ले बैक सिंगिंग के लिए सही नहीं है। यह बात ग़ुलाम हैदर, जो लता मंगेशकर के गुरु गॉडफादर थे उन्हें खल गई। गुलाम हैदर ने इस बात को गहराई से लिया और दीदी की तालीम और ज़ोरों से शुरू कर दी और कहा कि एक दिन इसी आवाज़ के लोग दीवाने होंगे।

वहीं दूसरी ओर दिलीप कुमार साहब ने कहा कि लता दीदी के गाने में मराठी भाषा का स्पर्श आता है और वे नूरजहां की नकल करती हैं। दीदी ने इस बात पर भी गौर किया और शफी साहब से उर्दू की तालीम ली। नूरजहां की गायकी की छाप से अपनी गायकी को अलग किया।

लता मंगेशकर के बारे में यह अफवाह भी फैलाई गई कि वह अपने छोटे भाई-बहनों को संगीत क्षेत्र में आगे बढ़ने का मौका नहीं देती हैं। लेकिन यह इल्जाम भी सरासर झूठ साबित हुआ। लता से छोटे सभी भाई बहनों ने फ़िल्म इंडस्ट्री में अपनी अलग पहचान बनाई। आशा भोंसले एक वर्सटाइल सिंगर के रूप में उभरी तो उषा और मीना ने भी खूब गाने गाए। उषा मंगेशकर का ‘मूंगडा’ आज भी जादू चलाता है। हृदय नाथ मंगेशकर हिंदी के साथ ही मराठी फिल्मों के सफल संगीतकार बने।

एक पत्रकार ने दीदी के बारे में लिखा कि वो आशा कि तरह सेंसेशनल गाने नहीं गा सकतीं। इस चुनौती को दीदी ने स्वीकार किया और बख़ूबी हेलेन पर फिल्माया गया ‘आ जाने जां’ गाना गा कर सबके होश उड़ा दिए।

१९५८ में शुरू हुए फ़िल्म फेयर अवार्ड में दीदी ने अपनी नाराज़गी जताई। इस अवॉर्ड में सिर्फ बेस्ट सॉन्ग कैटेगरी थी। लता दीदी ने बेस्ट मेल और फीमेल सिंगर्स कैटेगरी की शुरवात करवाई। १९५८ से १९६६ तक लगातार इस फ़िल्म फेयर अवॉर्ड को पानेवाली लता मंगेशकर अकेली फीमेल सिंगर हैं। १९६७ से लता दीदी ने खुद ही इस अवॉर्ड को लेने से मना कर दिया ताकि नवयुवतियों को मौका मिल सके।

फ़िल्म महल, मधुमति, चोरी चोरी और कई और फिल्मों में उनके गाए गीतों ने एक नया आयाम हासिल किया। फ़िल्म महल का ‘आएगा आनेवाला’ गाने को अब तक के गाये हुए सबसे मुश्किल गीत के रूप में जाना जाता है।

लता मंगेशकर को तीन नेशनल अवॉर्ड मिले और नेशनल अवॉर्ड को पाने वाली सबसे बुजुर्ग गायिका का सम्मान भी उन्हें मिला। १९९० में फ़िल्म ‘लेकिन’ के लिए उम्र के ६१ साल में यह रिकॉर्ड उन्होने बनाया। महाराष्ट्र एवम् भारत सरकार के कई सम्माननीय पुरस्कार की हकदार भी रहीं। महाराष्ट्र रत्न, पद्म भूषण,पद्म विभूषण, भारत रत्न जैसे पुरस्कारों ने उनकी सफलता में चार चांद लगाए। दीदी के ९० वे जन्मदिन पर भारत सरकार ने ‘डॉटर ऑफ़ इंडिया‘नामक एल्बम रिलीज़ कर के उन्हें गौरवान्वित किया। दीदी ने आज तक ५०००० गाने १४ अलग-अलग भाषाओं में गाए हैं। लता मंगेशकर की उपलब्धियां और सफलता सुनकर सिना चौड़ा हो जाता है। बड़े गर्व के साथ हर भारतीय यह कहता है कि लता मंगेशकर भारत की सुपुत्री हैं।

जैसे चांद पर दाग होते हैं वैसे ही दीदी के जीवन में भी कई विवाद आए। उनमें से एक विवाद ने उन्हें झकझोर कर रख दिया। और वह विवाद था कोल्हापुर का जयप्रभा स्टूडियो। बॉलीवुड में दीदी के गॉडफादर भालजी पेंढारकर ने कोल्हापुर का जयप्रभा स्टूडियो दीदी के नाम कर दिया।

भालजी की मौत के बाद महाराष्ट्र सरकार वहां भालजी का एक स्मारक बनाना चाहती थी। दीदी को यह मंजूर ना था। सरकार और लता मंगेशकर के बीच की यह लड़ाई सुप्रीम कोर्ट तक गई। आखिरकार दीदी ने अपनी पेटिशन वापस ली और सरकार ने जयप्रभा स्टूडियो को हेरिटेज साइट घोषित किया।

लता मंगेशकर की जीवनी और उनकी शख्सियत को शब्दों में बांध पाना नामुमकिन है। दीदी का काम उनके नाम से कई ज़्यादा बड़ा है। संगीत को अपना जीवन अर्पण करना और लोगों के मनोरंजन के लिए अपने हुनर की कसौटी लगाना किसी महान तपस्वी के ही बस का है।

लता मंगेशकर के इन 11 नए-पुराने गानों की तरह दीदी की तपस्या उनके गाए सब गानों में साफ झलकती है। अपने जीवन के उतार चढ़ाव में उन्होंने जिस तरह सफलता को गले लगाया उसी तरह अपनी कमियां और विवादों की भी ज़िम्मेदारी उठाई। जितनी संवेदनशील वह कलाकार हैं उतनी ही नेक इंसान। इस संवेदनशीलता और नेक दिली के आगे में नतमस्तक हूं। और अब लगने लगा है वाकई में दीदी के लिए विश्रांति के पल ज़रूरी हैं।

मूल चित्र : Google/YouTube

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