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अब समझ आ रहा है कि क्यों लड़की पैदा होते ही सबके माथे पर शिकन की लकीर खिंच जाती है

क्यों नहीं एक मिसाल प्रस्तुत की गई कभी भी, सारे आरोपियों को तत्काल दंडित करके, ताकि आगे कभी भी किसी लड़की को अपने लड़की होने पर डर नहीं लगे? आज एक बात अगर मैं आपसे कहूं तो उसे मानियेगा ज़रूर अपनी बेटी को शेरनी के समान करें क्यूंकि चारों तरफ भूखे भेड़िए घात लगाए बैठे […]

क्यों नहीं एक मिसाल प्रस्तुत की गई कभी भी, सारे आरोपियों को तत्काल दंडित करके, ताकि आगे कभी भी किसी लड़की को अपने लड़की होने पर डर नहीं लगे?

आज एक बात अगर मैं आपसे कहूं तो उसे मानियेगा ज़रूर अपनी बेटी को शेरनी के समान करें क्यूंकि चारों तरफ भूखे भेड़िए घात लगाए बैठे हैं। उसे सभ्य नहीं साहसी बनाएं, नज़र झुकाना नहीं आंख मिलाना सिखाएं।

बहुत ही दुःख की बात है कि पिछ्ले बलत्कारों के आरोपियों की सजा मुकर्रर हुई भी नहीं हुयी थी कि एक नया केस उसी तर्ज पर पुलिस रिकॉर्ड में दर्ज हुआ है। हर बार की तरह आरोपियों को तो पकड़ लिया गया है किंतु हमारी न्याय प्रणाली के अति सुस्त रवैया, प्रशासन का ढीलापन, उच्च अधिकारियों का गैर ज़िम्मेदाराना रवैया ने  वापस उसी मोड़ पर मोमबत्तियों के साथ खड़ा कर दिया।

जानकारी मिली है कि महान न्याय पालिका ने, हालिया दोषियों को, नोटिस जारी की है, जिसमें कहा गया है कि चारों आरोपी बताएं कि वे सज़ा मुकर्रर होने से पहले, कोई अर्जी लगाना चाहते हैं या नहीं। 

यह किस तरह का न्याय है?

भारत में जहां पर एक लड़की की इज़्ज़त, जानवर से बदतर तरीके से छिन्न-भिन्न करके तार-तार कर दी जाती है, उसे या तो मरने के लिए बीच सड़क में नग्न डाल दिया जाता है या बलात्कार करके जला दिया जाता है। उन्हें तो कभी न्याय नहीं मिलता, पर मुजरिमों को पूरी सुनवाई का मौका दिया जाता है। उनको पूरा न्याय मिलेगा, सहारा मिलेगा, जैसे पुलिस की सुरक्षा, कोर्ट का साथ, इत्यादि।

सज़ा से पहले देखा जाएगा कि यह केस रेयेर टू रेयरेस्ट में आता है कि नहीं, दोषी नाबालिग तो नहीं, दोषी की मानसिक हालत कैसी थी, हत्या का मोटिव क्या था? क्यों इस तरह का अंधा कानून है यहाँ।

भारत में लगातार दोषियों को नोटिस जारी किया जा रहा है

अन्य देशों में जहां बीच चौराहे में बलात्कारियों को मौत की सजा दी जाती है, वहीं भारत में लगातार दोषियों को नोटिस जारी किया जा रहा है। कोर्ट में कहा जाता है कि जब तक दया याचिका लंबित है, तब तक कोर्ट कैसे डेथ वारंट जारी कर सकता है? जान बूझकर दोषी इस तरह की प्रक्रिया में फंसा कर फांसी की सज़ा को रोकने की पुरज़ोर कोशिश करते रहे हैं। 

एक लड़की के पैदा होने पर सभी के माथे पर शिकन की लकीर

निस्सहाय और कमज़ोर पीड़िता न्याय की गुहार लगा-लगा कर थक जाती हैं, और फिर रह जाती है केवल अगली तारीख। जहां सरकार और देश के विकास उत्थान से संबंधित अधिकारी ‘बेटियों को बचाओ, पढ़ाओ, आगे बढ़ाओ’ का नारा लगा रहे हैं, वहीं एक लड़की के मां-बाप को आज तक न्याय नहीं दिला पा रहे हैं। अब समझ आ रहा है कि इस सामाजिक व्यवस्था और दोगले नियम के कारण ही तो एक लड़की के पैदा होने पर सभी के माथे पर शिकन की लकीर खिंच जाती है।

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सारे आरोपियों को तत्काल दंडित करें

अगर सच में स्त्री और पुरुष का समान दर्जा है, यदि सच में लोकतंत्र का कोई अस्तित्व है तो क्यों बलात्कार और निर्मम हत्या कांड में शामिल, नाबालिग सहित सभी आरोपियों को, तत्काल प्रभाव से सजा-ए-मौत नहीं दे दी जाती? क्यों नहीं एक मिसाल प्रस्तुत की गई कभी भी, सारे आरोपियों को तत्काल दंडित करके, ताकि आगे कभी भी किसी लड़की को अपने लड़की होने पर डर नहीं लगे?

क्या बाकी लोगों को न्याय की दरकार नहीं है

दूसरी वजह जो बहुत ज्यादा अंदर तक झकझोर रही है वो ये कि जब एक पढ़ी-लिखी, आत्मनिर्भर, आधुनिक समाज का प्रतिनिधित्व करने वाली लड़की के साथ यह जघन्य अपराध हो सकता है, तो कमज़ोर, कोमल, मासूम या अनपढ़ लाचार औरत के साथ क्या कुछ नहीं होता होगा।

आज एक हाई प्रोफाइल रेप-मर्डर केस मीडिया में छाया हुआ है। क्या पुलिस के पास भारत के किसी अंदरूनी कोने में, किसी मजबूर महिला या बच्ची के साथ किया गया दुर्व्यवहार, मानसिक प्रताड़ना, यौन उत्पीड़न, बलात्कार या बलात्कार के बाद हत्या का हर अपराध दर्ज़ है? क्या बाकी लोगों को न्याय की दरकार नहीं है?

सुरक्षा के बिना, विकास का कोई अर्थ ही नहीं

ऊपरी आडंबर और दिखावा, नारी जागरूकता का, बंद होना चाहिए। सुरक्षा के बिना, विकास का कोई अर्थ ही नहीं। इसलिए मैंने आपसे कहा कि परवरिश एसी हो कि हमारी बेटियाँ मजबूत दिमाग के साथ, स्वस्थ, और तेजतर्रार व आक्रामक बनें।

ऐसे संस्कार जिनसे हम अपनी बच्चियों को मृदु व्यवहार, शिष्टता और और सभ्यता सिखाते हैं, इससे वे समाज के हिसाब से तो ढल जाती हैं मगर उनका खुद का आत्मसम्मान और अस्तित्त्व कहीं खो जाता है। उन्हें अनावश्यक रूप से लादे गए, बिना कारण के दोगले रिश्तों का आदर करना छोड़ देना चाहिए। इसके बदले, हर एक बच्ची को सिखाएं कि हर कोई चाचा-ताऊ नहीं होता।

बहुत हो चुकी तमीज़दार, सदव्यवहारी बच्ची बनाने की परवरिश

यहां जंगलराज है, जिसे पूरी स्त्री जाति, अपने जीवन काल में पल-पल या समय-समय पर महसूस करती है कितने भूखे भेड़िए उसे नोचने को तैयार बैठें हैं? यहां तो हर एक एक बच्ची को, सेल्फ डिफेंस, अलर्ट रहना, खुद की रक्षा के लिए छोटे-मोटे औज़ार रखना सिखाना चाहिए। अब बहुत हो चुकी तमीज़दार, सदव्यवहारी बच्ची बनाने की परवरिश। अब सिखाओ मुंह तोड़ जबाब देना, गर्जना, ईंट का जवाब पत्थर से देना, इज़्ज़त करवाना, मांग रखना और उसे पूरी करवाना।

अब कायदा-मर्यादा बाद में, पहले अपनी स्थिति मजबूत बनाना। यही सब बातें हैं जो आज की लड़कियों को सिखानी हैं। जो बीत गया सो बीत गया, अब सिर्फ एक गुणवान लड़की का लेबल चिपकाने के बदले खुद को आत्मनिर्भर लड़की बनाएं।

एक-एक बच्ची दुर्गा का अवतार होना चाहिए

हर किसी के हाथ में, मशाल होनी चाहिए ताकि कोई भी इस पंगु न्याय व्यवस्था के दरवाज़े पर, न्याय की भीख मांग-मांग के दम ना तोड़े। अपनी रक्षा स्वयं करे

एक-एक बच्ची दुर्गा का अवतार होना चाहिए, जो राक्षसों से मुकाबला कर सक। मेरा भारत की सभी मांओं से कर बद्ध निवेदन है कि अपनी बच्चियों को स्वयं रक्षा हेतु कराटे, मार्शल आर्ट, जैसी विद्या सिखाएं, और मजबूत बेटी का भविष्य सुरक्षित बनाए। अब शिष्टाचार बेटियों को नहीं बेटों को सिखाएं।

मूल चित्र : Canva 

 

              

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