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माँ, अंतिम क्षण तक करती रहूंगी अपनी शक्ति का प्रदर्शन!

Posted: दिसम्बर 4, 2019

जा नहीं देना मुझे अपनी सफाई का कोई सबूत, जा अब और नहीं आना मुझे इस निष्ठुर कठोर पत्थर दिल जग में, जहाँ मेरी किलकारी सुन एक और शिकारी जन्म लेता है!

बड़े बड़े नाखून, नुकीले रौंदते हुए से पंजे
लंबे लंबे दांत और कातिल आँखे
खूंखार चेहरा और विशाल दैत्य सा आकार
अगर यह होती उस शैतानी ताकत की पहचान
तो हो जाओ सब होशियार
बस इतना कह
सारे शहर में पर्चा बंटवा देती
अगर होता इनका भी कोई रंग रूप
तुझे सतर्क करने को
तेरे दिलो-दिमाग पर मैं छपवा देती
कहे तो
एक बड़ा सा पोस्टर
हर गली नुक्कड़ पर भी लगवा देती।

पर क्या करूं
मज़बूर हूँ
कुछ भी तो अता-पता नहीं
ओ मेरी नन्ही सी गुड़िया
कैसे बाँधूँ तेरे पैरों में बेड़ियां
पर जान ले
बड़ी ही क्रूर है यह दुनिया
हर कदम संभाल के रखना तू
क्योंकि इन पापियों के पाप की कोई सीमा नहीं, कोई अंत नहीं
क्योंकि इन पापियों के पाप की कोई सीमा नहीं, कोई अंत नहीं।

ना कोई चेहरा है
ना कोई पहचान
ना कोई इशारा है
ना कोई खेद
इंसानियत का मुखौटा लगाए
पहने चोला मासूमियत का
सिर्फ काली रात में ही नहीं
दिन के खुले उजाले में भी
विरान सड़कों पर ही नहीं
भीड़ भरी राहों में भी
घूमते हैं ये खुलेआम
ये दानव बेरहमी के
दिखते हैं बिल्कुल हम तुम जैसे
जाने किस मिट्टी के बने हैं
ये काल विनाशक किस और चले हैं
ये काल विनाशक किस और चले हैं।

ऐसा कोई एक दिन ना बीता
जब इनके काले करतूतों की खबरें अखबारों में ना छपी हों
कानों में ना गूंजी हों
अरे इन जालिमों ने तो
किसी को भी ना छोड़ा
कोई 26 या 56 वर्ष युवती हो
या मासूम सी स्कूल जाती बच्ची
या हो कुछ महीने भर की ही फूल सी गुड़िया
जिसने अभी कुछ पल पहले ही तो आंखें खोली है
जो अब तक दुनिया को ढंग से देख भी ना पाई थी
अपने शरीर तक को ना पढ़ पाई थी
उसकी अनदेखी अनसुनी कहानी के पन्नों को
कैसे तूने बेरहमी से फाड़ डाला!

कैसे दिलाए कोई माँ अपनी गुड़िया को अब एक नया खिलौना
जब इन दरिंदों ने उस मासूम गुड़िया को ही खिलौना बना लिया
जाने कैसे हर बार एक नया तरीका ढूंढ लेते हैं ये अपने मनोरंजन का
जब तक खिलौना टूट न जाए
हर एक पुर्जा उखड़ ना जाए
तब तक खूब दिल बहलाते हैं
इतना ही नहीं
फिर बेजान टूटे खिलौनों पर भी
अपनी बची खुची हसरत पूरी कर जाते हैं
अंत में जब किसी काम का ना रहे
चकनाचूर कर कूड़ेदान में डाल आते हैं।

आज फिर
दिल सहम सा गया है
रूह काँप सी गई है
और जल उठा है मेरा रोम रोम
बार-बार यही सोच
ये नरक के बाशिंदे जाने धरती पर कैसे आते हैं
ये नरक के बाशिंदे जाने धरती पर कैसे आते हैं।

अरे ओ दरिंदे!
बस कर अपनी हैवानियत की अश्लीलता दिखाना
जंगली जानवर भी तुझसे सौ गुना बेहतर होता है
कहीं इतनी देर ना हो जाए
की हर एक नन्ही सी जान
थामें हाथ ममता का
मासूम नजरों से यह बोल उठे
कमज़ोर नहीं
अंतिम क्षण तक करती रहूंगी अपनी शक्ति का प्रदर्शन
पर घेरे हुए हैं हर मोड़ पर यह राक्षस दल।

जा
नहीं देना मुझे अपनी सफाई का कोई सबूत या कोई प्रमाण
जा अब और नहीं आना मुझे
इस निष्ठुर कठोर पत्थर दिल जग में
जहाँ मेरी किलकारी सुन एक और शिकारी जन्म लेता है
इससे भला तो
अपनी कोख में ही खत्म कर देना मां
क्योंकि
मैं एक और निर्भया नहीं बनना चाहती!
मैं एक और निर्भया नहीं बनना चाहती!

मूल चित्र : Canva

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