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कर्म को धर्म मानने वाली, हमारी संस्कृति में कई सवालों के लिए जगह नहीं होनी चाहिए

Posted: December 19, 2019

जब आप किसी अस्पताल पहुँचते हो तो क्या धर्म देखकर डॉक्टर चुनते हो? उस पल बस आप यही चाहते हो कि डॉक्टर कोई भी हो, बस इलाज ठीक हो जाये।

यादों की बात चली तो मुझे बरसों पहले का वाकया याद आया इस किस्से की याद आने की एक वजह हाल ही में आई कुछ खबरें भी हैं। मैं यह क्यों कह रही हूं यह आप लेख पूरा पढ़ने के बाद समझ पाएंगे।

कुछ साल पहले की बात है,  मैं पुणे की एक आईटी फर्म में कार्यरत थी और किसी काम के सिलसिले में मुंबई जाना हुआ। काम खत्म होते-होते रात हो चली थी और मुझे अगले दिन सुबह ही ऑफिस पहुंचना था, इसलिए मैंने टैक्सी लेकर रात में ही पुणे पहुँचने का फैसला किया। मुंबई से पुणे के टैक्सी आसानी से उपलब्ध हो जाती है। कुछ टैक्सी वालों से किराए को लेकर बहस करने के बाद मैंने एक टैक्सी वाले से उचित किराया तय किया और उसी के साथ पुणे तक आने का फैसला किया।

रात के 9:00 बज चुके थे और मैं अकेली सफर कर रही थी, लिहाज़ा अपने दोस्तों और घर पर बात की और उनकी नसीहतों के बाद मैंने टैक्सी वाले की पूरी जानकारी लेने के उद्देश्य से उससे बातचीत का सिलसिला शुरू किया। उसकी लंबी ढाढ़ी और बढ़े हुए बालों वाले हुलिए को देखकर मुझे वो कुछ अलग लगा और न जाने मुझे क्या सुझा, मैंने अपना पहला सवाल दागा, “भैया मुस्लिम हो क्या?”

उसने थोड़ा झेंपते हुए उत्तर दिया, “नहीं मैडम, मैं हिन्दू हूँ और मेरा नाम अतुल है।” 

उसके जवाब के बाद मुझे एहसास हुआ कि ये मेरा पहला सवाल नहीं होना चाहिए था। खैर, मैं इधर-उधर की बातों से स्वयं को और उसको उस स्थिती से बाहर निकाला और हमारा सफर शुरू हुआ।

मैं अपने फोन पर व्यस्त हो गई, अगले दिन की दिनचर्या बनाते और कुछ किताब के पन्ने पलटते हुए समय बीत गया। अतुल ने टैक्सी बड़ी सावधानी से चलाई और तेज़ भी और सही समय पर मुझे पुणे पहुंचा दिया। मैं टैक्सी से उतर कर उसे पैसे दे ही रही थी कि अचानक उसका फ़ोन बजा..

वो पैसों के हिसाब में व्यस्त था, इसी वजह से उसने फ़ोन स्पीकर पर कर बात शुरू की। उधर से आवाज़ आई, “और अब्दुल मियां कहां हो?” 

मेरे कानों में ये शब्द पढ़े ही थे कि उसने पलक झपकते ही फ़ोन काट दिया।

‘अब्दुल मियां’, वो शब्द मैंने साफ सुने थे, लेकिन फिर भी मुझे यकीन नहीं हो रहा था।

मुझसे रहा न गया और बचे हुए पैसे वापस लेते हुए मैंने पूछ ही लिया, “भैया, अभी फ़ोन पर आपको किसी ने अब्दुल मियां कहा ना?”

“हाँ मैडम, झूठ नहीं बोलूंगा। आपने सही सुना। मेरा नाम अब्दुल ही है और मैं एक मुस्लिम हूँ। मैं हाथ जोड़कर माफी मांगता हूं कि मैंने आपसे अपनी पहचान छुपाई। लेकिन अगर मैं आपको अपनी सही पहचान बता देता तो क्या आप मेरी टैक्सी लेतीं?”

मेरे पास उसके सवाल का कोई जवाब नहीं था।

उसने बोलना जारी रखा, “समझ नहीं आता मैडम, लोग धर्म क्यों पूछते हैं। हमारे लिए तो हमारा ये काम, हमारी रोज़ी-रोटी ही हमारा धर्म है। हम पूरी मेहनत और ईमानदारी से अपना काम करते हैं और उसी को इबादत मानते हैं।”

“मुझे आज पैसों की सख्त ज़रूरत थी और अगर आप कोई और टैक्सी ले लेते, तो और कोई सवारी मिलना मुश्किल था। मैं अभी ये सब इसलिए बोल पा रहा हूँ कि मैंने आपको सही सलामत आपके घर पहुंचा दिया है और आपने देख लिया है कि मेरे धर्म का मेरे काम से कोई रिश्ता नहीं है।”

“यही बात अगर मैं आपको पहले बताता कि मैं बहुत अच्छा ड्राइवर हूँ और आपको कोई तकलीफ नहीं होगी, तो आप शायद नहीं मानते। कोई नहीं मानता मैडम। बहुत बार अपनी पहचान छुपा कर काम चलाना पड़ता है।” 

“सब दिमागी जाले हैं मैडम। ज़िंदगी और मौत के लड़ाई लड़ते हुए जब आप किसी अस्पताल पहुँचते हो तो क्या धर्म देखकर डॉक्टर चुनते हो? नहीं ना? उस पल बस आप यही चाहते हो कि डॉक्टर कोई भी हो, बस इलाज ठीक हो जाये। तो फिर हमसे क्यों पूछ्ते हों? सिर्फ ये काफी नहीं कि हम सही सलामत आपको घर पहुँचा दें?” ये कहते हुए उसने टैक्सी स्टार्ट की और अंधेरे में ना जाने कहाँ खो गया। 

ज़हन के जाले। सचमुच ये जाले ही तो हैं। मेरे पास इस सवाल का कोई जवाब नहीं था कि मैंने उसका धर्म क्यों पूछा।

क्यों आज के आधुनिक दौर में भी हम इन सब चीज़ों में उलझे हुए हैं? अभी कुछ ही दिनों पहले खबर आई थी कि  किसी ने ज़ोमैटो से मंगाया हुआ आर्डर निरस्त कर दिया था, क्योंकि लाने वाला किसी धर्म विशेष से था। कुछ दिनों से खबर चल रही है कि बरसों से संस्कृत पढ़ा रहे एक प्रोफेसर के धर्म पर सवाल उठाए जा रहे हैं। ये हम कहाँ जा रहे हैं?

कर्म को धर्म मानने वाली हमारी संस्कृति में इन सवालों की कोई जगह नहीं है और न इन सवालों के कोई मायने है। ये सिर्फ में हमारे ज़हन के जाले हैं। जितनी जल्दी साफ हो जाएं अच्छा है।

मूल चित्र : Canva

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