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‘माँ’ के साथ-साथ अपने ‘मैं’ को ज़िंदा रखने का हुनर मैंने आशा से सीखा

Posted: November 20, 2019

आशा का ‘माँ’ से ‘मैं’ तक का सफ़र छोटा नहीं था। पूरी ज़िंदगी बीत गयी थी खुद के अन्दर के ‘मैं’ को पहचान दिलवाने में, अपने अस्तित्व को तलाशने में।

“माँ! गौरव मेरा बिलकुल ख्याल नहीं रखते। बात-बात पर रोक-टोक करते हैं। आपने मेरे लिए ऐसा लड़का क्यूँ चुना माँ?” सुबकते-सुबकते आरवी की आँखें भर गयीं और गला रुंध गया।

“ऐसा नहीं है आरवी, गौरव बहुत अच्छा लड़का है। हर रिश्ते में एक दूसरे को समझने में समय लगता है बेटा।  तुम्हारे पापा भी मुझे बिलकुल पसंद नहीं थे शुरू-शुरू में, लेकिन समय के साथ हम एक दूसरे को जैसे-जैसे जानने लगे, समझने लगे, हमारा रिश्ता अलग रूप लेता चला गया।”  आशा ने अपनी बेटी को समझाते हुए कहा।

अपने बच्चों का सबसे बड़ा ‘सपोर्ट सिस्टम’ थीं आशा। जीवन की कैसी भी कठिनाई हो, बच्चे सबसे पहले माँ के कंधे पर सर रख कर रोते क्यूंकि वे जानते थे कि उनके दर्द की संजीवनी बूटी केवल उनकी माँ के पास है।  उनके चेहरे पर सजी वो मुस्कान और प्यार से भरे वो बाल सहलाते हाथ, जैसा सुख देते, लगता कोई गम है ही नहीं।

आशा, छोटे से गाँव की, पंडित की बेटी, 8वीं पास और 14 साल की उम्र में फैक्ट्री में कार्यरत मज़दूर से ब्याह दी गयीं। तमगा 8वीं पास का लेकिन खड़े-खड़े 5 साल का ब्याज और मूल दोनों गिन कर निकाल ले। हिसाब में माहिर। सिलाई में निपुण। और उनके हाथ के स्वाद का कोई सानी नहीं। बेटी को विदा करते समय पिता ने हाथ जोड़कर एक ही विनती की थी कि हो सके तो बेटी को शहर में आगे की पढ़ाई पूरी करवा देना।

शहर में जाते ही उनकी सिलाई के चर्चे होने लगे। धीरे-धीरे आसपास की सब औरतें उन्हीं से सिलाई करवाने आने लगी। सासू माँ घर में बढ़ती आमदनी देखकर खुश होने लगीं और बहु को पढ़ाई करवाने का ख्याल उनके लोभ के आगे गौण हो गया। नयी बहु ज़्यादा कुछ बोल नहीं पायी और घर की माली हालत देखकर उन्होंने भी सिलाई करना जारी रखा।

समय गुजरा, वो 4 बच्चों की माँ बनीं। उनकी परवरिश एक तरफ और सिलाई एक तरफ। बाहों में बच्चे को सुलाकर पैरों से सिलाई मशीन का पाटा चलाकर समय कहाँ गुज़रता चला गया, पता ही नहीं चला। सास-ससुर भी उम्र के चलते साथ छोड़ गए। शहर के स्कूल की पढ़ाई आशा को समझ नहीं आती लेकिन बच्चे जब तक स्कूल में होते वो उन किताबों को खुद पढ़तीं और ये तय करके रखती थीं कि आज शाम उन्हें कौन सा पाठ पढ़ाना है। रोटी सेकते-सेकते बच्चों को बिठाकर ‘दो एकम दो’ बुलवातीं। व्यवहारिक ज्ञान से जुड़ी बातें खेलते खेलते सिखातीं। अपनी लड़की को घर के काम के साथ-साथ पढ़ाई पर भी उतना ही ध्यान देने को कहतीं। रात को बच्चों के सो जाने के बात अपने मशीन से जुड़े काम निपटातीं।

समय निकलता गया और आशा की मेहनत रंग लायी। बच्चे पढ़ाई में होशियार निकले। सबकी अच्छी जगह नौकरी लग गयी। बेटी का तो लोक संघ सेवा आयोग में उच्च अधिकारी के पद पर चयन हुआ। बच्चों की शादी हो गयी और वो सब अपने जीवन में रम  गए।

बच्चों को नौकरी के लिए बाहर निकलना पड़ा और वो और उनके पति अकेले रह गए। आदमी तो फिर भी बाज़ार जाकर, बाहर बातें कर के अपना समय निकाल लेते हैं पर औरत बेचारी कहाँ जाए? पर ऐसी बातें शायद मेरे जैसे अल्हड़ और बातूनी लोग करते होंगे, आशा ऐसी कहाँ है।

पास पड़ोस के बच्चों से बार-बार यू ट्यूब और फेसबुक का नाम सुनकर उनसे उनके बारे में जानने की इच्छा जताई। फिर किसी ने उन्हें बताया कि हम कुछ भी उस पर शेयर कर सकते हैं, देख सकते हैं, और सीख सकते हैं। धीरे-धीरे वो फेसबुक चलाना सीख गयीं। एक दिन न्यूज़ फीड देखते-देखते उन्होंने कुछ रेसिपीज़ देखीं। उन्होंने ध्यान से देखा तो पाया कि वो उस से भी बेहतर कुछ बना सकती हैं।

जब उनकी बेटी छुट्टियों में उनके साथ रहने आई तो उन्होंने उसके साथ भी ये सब शेयर किया और इसको और बारीकी से सीखा। उनकी बेटी देखकर आश्चर्यचकित थी कि एक 8 वीं पास महिला, जिसने कभी मोबाइल की शक्ल नहीं देखी, अंग्रेजी की एक लाइन नहीं पढ़ी, सोशल मीडिया का जो मतलब भी नहीं जानतीं, वो फेसबुक और यू ट्यूब जैसे प्लेटफार्म को केवल समझ ही नहीं रही हैं बल्कि उसमें कुछ अपना जोड़ने के विचार बना रही हैं।

अपनी बेटी की मदद से उन्होंने फेसबुक पर एक पेज बनाया और खाने से जुड़ी जानकारी, रेसिपी, गृहिणियों के लिए उपयोगी वस्तुएं, जो उनका समय बचाने में काम आये, ऐसी जानकारियाँ अपडेट करने लगीं। धीरे-धीरे उनकी रूचि कब जूनून में बदल गयी पता ही नहीं चला। उनके फ़ॉलोअर्स बढ़ते चले गए। लोग उनके पेज को लाइक करने लगे, उन्हें उनके खाने से जुड़े समस्याओं के समाधान पूछने लगे और उन्होंने ‘फ़ूड ब्लॉगर’ के रूप में अपनी एक नयी पहचान बनायी। उनके पेज के फ़ॉलोअर्स 1 लाख हैं। उनके फ़ूड चैनल, देसी किचन, के 50000 सब्सक्राइबर्स हैं। इन्टरनेट की दुनिया में उनका जाना पहचाना नाम है। मुंबई के एक 3 सितारा होटल में उन्हें शेफ की नौकरी के लिए भी आमंत्रित किया गया।

हाँ उनका ‘माँ’ से ‘मैं’ तक का सफ़र छोटा नहीं था। पूरी ज़िंदगी बीत गयी थी उनकी उन्हें खुद के अन्दर के ‘मैं’ को पहचान दिलवाने में, अपना वजूद खोजने में, अपने अस्तित्व को तलाशने में। अपने छोटे गाँव से होने के बावजूद, अनपढ़ होने के बावजूद, घर में अभावों के बीच रहने के बावजूद, किसी प्रोत्साहन के ना मिलने के बावजूद, उन्होंने पहले ‘माँ’ का सफ़र तय किया और उसी सफ़र के अंतिम भाग में अपने अन्दर छुपे ‘मैं’ को खोजा। परिस्थितियों को अपने आगे झुकाया। बुढ़ापे का गीत गाने की बजाय उसी अनुभव को अपना हथियार बनाया और खुद को पाया।

शायद एक औरत ही ऐसा उत्कृष्ट मिश्रण हो सकती है , जो ‘माँ’ के साथ-साथ अपने अन्दर के ‘मैं’ को भी ज़िंदा रखने का साहस रखती हो।

मूल चित्र : Canva

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