हम तो जज करेंगे क्यूंकि जजमेंटल हैं हम!

Posted: October 29, 2019

हम लोग किसी को ना जानते हुए, पहचाने बिना, बाहरी स्थिति को देखकर, दूसरे के प्रति एक धारणा बना लेते हैं, दूसरों को जज करने की आदत हो गयी है हमारी।    

“अरे क्या हो गया है आज! इतना शोर शराबा कैसे हो रहा है?”

“कुछ हुआ है क्या?” हमारे मोहल्ले में रवि ने अपनी पत्नी मीरा से पूछा।

“मैं आपको जगाने ही आ रही थी अभी। देखो आज सुबह-सुबह सभी लोग इकठ्ठा हो गए हैं और इस लड़के और लड़की को डांट रहे हैं। क्यों क्या हो गया रवि ने आश्चर्य से फिर पूछा।

“देखो ना यह जोड़ा रोज सुबह 6 बजे हमारे मोहल्ले में तफरी करने आ जाता है। दोनों कभी एक साथ हाथ में हाथ डाल कर चलते हैं, तो कभी बाइक पर आते हैं, कभी पैदल। रोज़ का काम हो गया इनका। दोनों देखने में भले घर से लगते हैं, लेकिन फिर भी ऐसा काम करते हैं?”

“इन्हें क्या हमारा ही मोहल्ला मिला है रंगरेलियां करने के लिए?”

“तभी कल गली की सब महिलाओं और पुरुषों ने इन दोनों को सुबह रोकने का प्लान बना लिया था। अब इनसे पूछताछ करने के लिए इनको रोका है और इनकी अच्छे से क्लास ली जा रही है। इन्होंने हमारे मोहल्ले की शांति भंग कर रखी है। जिसे देखो वही इनके बारे में बात रहा है।”

“आज पता चलेगा इन दोनों को कि क्या होता है जब हम किसी गली या मोहल्ले के चक्कर लगाते हैं।” फिर रवि और मीरा भी चले गए उस शोर का हिस्सा बनने के लिए।

मोहल्ले में सभी लोग उनको घेर कर खड़े हो गए और उन दोनों से तरह-तरह के सवाल करने लगे, “कौन हो तुम लोग? तुम्हारे क्या रिश्ता है? एक दूसरे को कैसे जानते हो? यहां क्यूं आते हो? यही जगह मिली है? तुम दोनों ने हमारे मोहल्ले को गंदा कर दिया अपनी हरकत से!”

“इनको देखकर गली के और बच्चे भी बिगड़ जाएंगे। आजकल वैसे भी माहौल बहुत खराब हो गया है। तुम्हें ऐसा करते देखकर हमारे बच्चे भी वही गलती करेंगे। क्या काम है तुम्हारा यहां आने का? वो भी रोज़- रोज़ आ जाते हो? रोज़!”

हमारी गली की सभी औरतें उन दोनों पर अपने बेहिसाब सवाल किए जा रही थीं। बाकी वहां मौजूद लोग तमाशबीन की तरह तमाशा देख कर खुश हो रहे थे। हम भी वहां ये सब चुपचाप देख रहे थे।

इससे पहले कि पब्लिक उन पर अपना रुद्र रूप लेती, वो लड़का बोल पड़ा, “आप सब कैसे लोग हो? कितनी गंदी सोच है आपकी! यह लड़की मेरी गर्लफ्रेंड नहीं, मेरी बहिन है। और, रोज़ मैं इसके साथ डॉक्टर के पास जाता हूँ। इसको सुनाई नहीं देता, तभी मै इसका हाथ पकड़कर चलता हूँ। डॉक्टर इसको इशारों में बात करना सीखा रहे हैं। इसकी रोज़ सुबह क्लास होती है और मेरे माता-पिता दोनों प्राइवेट जॉब करते हैं, इस कारण उन्हें समय नहीं मिल पाता तो मैं इसकी देखभाल करता हूँ और इसके साथ रोज़ आता हूँ।”

उसकी बातों को सुनते ही सभी मौजूद लोग बिल्कुल चुप हो गए जैसे की उन्हें सांप सूंघ गया हो।फिर धीरे-धीरे सभी लोग वहां से खिसक गए और अपनी गलती को जानकर बिना कुछ कहे वहां से चलते बने।

हमें भी अपनी गलती का अहसास हुआ। कैसे हम लोग किसी को ना जानते हुए, पहचाने बिना, बाहरी स्थिति को देखकर दूसरे के प्रति एक धारणा बना लेते हैं लेकिन जब हकीकत का पता चलता है तो अपनी गलती पर सिर्फ पछतावा ही होता है।

दूसरों को जज करने की आदत ही बन गई है हमारी। चाहे आपको उसके बारे में पता हो या ना हो। हमारे आसपास ऐसे कई लोग मिल जाएंगे जो आपके प्रति अपनी एक अलग ही सोच रखते हैं, लेकिन जब वो हमारे संपर्क में आते है तो यह बात स्वीकार कर लेते हैं कि आप तो ऐसे नहीं है जैसा मैंने सोचा था।

आपके साथ भी कभी ऐसा हुआ है तो जरूर बताएं। आप मुझे लाइक, कॉमेंट और मेरे ब्लॉग को शेयर भी करें।

मूल चित्र : Canva 

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