कोरोना वायरस के प्रकोप में, हम औरतें कैसे, इस मुश्किल का सामना करते हुए भी, एक दूसरे का समर्थन कर सकती हैं?  जानने के लिए चेक करें हमारी स्पेशल फीड!

मैं ना भी चाहूं तो सुबह जल्दी उठना पड़ता है क्यूंकि बहू देर तक सोती अच्छी नहीं लगती…

Posted: अक्टूबर 30, 2019

सुबह बहू उठेगी, सबके लिए चाय बनाएगी, सबके पैर छुएगी, मंदिर में पूजा करेगी तभी…सिर्फ तभी, घर में लक्ष्मी, सुख और शांति आएंगे।

इस बात से हर शादीशुदा मिडल क्लास औरत वाकिफ़ होगी कि सुबह जल्दी उठना उसके लिए कितना ज़रूरी है, भले वो चाहे या ना चाहे। अपनी मम्मी को हम सब ने सुबह सबसे पहले उठकर सबके लिए चाय-नाश्ता बनाते हुए देखा है। जैसे कि ये सिर्फ उनकी ड्यूटी है कि उनके उठने के बाद ही घर के बाकी लोग बिस्तर छोड़ेंगे। प्रथाएं सिर्फ पर्दा प्रथा, घूंघट प्रथा, सती प्रथा ही नहीं है, ये भी उनमें से एक है ‘जल्दी उठने की प्रथा’ जो सिर्फ महिलाओं पर लागू होती है।

मायके में देर तक सोएगी तो मम्मी कहने लगेंगी कि इतनी-इतनी देर तक सोएगी तो आगे ससुराल में जाकर क्या करेगी, बेइज़्जती कराएगी, नाक कटा देगी हमारी। भले ही लड़की पढ़ने, खेलने में कितनी भी अच्छी क्यों ना हो लेकिन ये एक बुरी आदत उसकी सारी काबिलियत पर भारी पड़ जाएगी।

शादी होने के बाद तो देर तक सोना लड़की खुद ही भूल जाती है क्योंकि सालों-साल अपनी अम्मा से उसने यही सुना होता है कि ससुराल में जाकर क्या करेगी? क्या करेगी? क्या करेगी?

सुबह बहू उठेगी, सबके लिए चाय बनाएगी, सबके पैर छुएगी, मंदिर में पूजा करेगी तभी…सिर्फ तभी, घर में लक्ष्मी, सुख और शांति आएंगे। घर का बाकी कोई भी व्यक्ति कुछ भी अच्छा-बुरा, नीच-पापी क्यों ना हो उसके कर्मों से घर की शांति का कोई लेना-देना नहीं होता है।

मेरी शादी अभी हाल-फिलहाल हुई है। मैं और मेरे पति काम की वजह से घर से दूर दिल्ली में रहते हैं। इसलिए जब घर जाते हैं तो मेरी सासु मां या ससुर कोई भी मुझे जल्दी उठने के लिए नहीं कहते क्योंकि उन्हें लगता है बच्चे थक कर इतनी दूर से आए हैं। लेकिन फिर भी 7.30 बजे के करीब मुझे लगने लगता है कि अब तो बाहर चले जाना चाहिए वर्ना क्या सोचेंगे?, भले ही वो कुछ ना सोचें लेकिन मन में ये बात ज़रूर आ जाती है।

मैं कोशिश कर रही हूं कि ऐसा ना सोचूं पर ये बात मुझे भी मालूम है कि उम्मीद तो सब करते हैं। अभी तो मैं कभी-कभी जाती हूं, अगर वहीं रहूं और रोज़ लेट उठूं तो क्या होगा? ये डर हमेशा बना रहता है क्योंकि ये डर सदियों से औरतों में ऐसा ठूंस दिया गया है कि वो कितनी ही सबल और सक्षम क्यों ना हूं, खुद से सवाल करने लगती हैं। थोड़ी सी छूट ससुराल वाले दे भी दें तो क्रेडिट भी उन्हें ही जाता है कि वाह अच्छा घर मिला है। लेकिन अगर लड़की कुछ कह जाए तो हाय-हाय कितनी बतमीज़ है। लड़की, लड़की होने से पहले इंसान है, उस पर उम्मीदों और जिम्मेदारियों का इतना बोझ ना डालें कि वो झेल ना सके।

एक रिपोर्ट के मुताबिक औरतों को मर्दों से ज्यादा नींद की ज़रूरत होती है क्योंकि उन पर प्रेशर भी ज़्यादा होता है। इसलिए अगली बार आपकी बेटी या बहू देर तक सो रहे हों तो सोने दीजिए क्योंकि सुख-शांति-लक्ष्मी तभी आएंगे जब घर की औरतें ख़ुश रहेंगी, मन से भी और तन से भी।

नोट:- घर के आदमी लोग देर से उठें, खाना देर से खाएं, रात देर से आएं, आपके लिए सब ओके हैं। लेकिन फिर भी एक बार, सिर्फ एक दिन के लिए अपनी मां, पत्नी, बेटी की दिनचर्या को गौर से देखिएगा, आप समझ जाएंगे!

मूल चित्र : Pexels

पसंद आया यह लेख?

पाइये विमेन्सवेब के सारे दिलचस्प हिंदी लेख अपने ईमेल इनबॉक्स मे!

विमेन्सवेब एक खुला मंच है, जो विविध विचारों को प्रकाशित करता है। इस लेख में प्रकट किये गए विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं जो ज़रुरी नहीं की इस मंच की सोच को प्रतिबिम्बित करते हो।यदि आपके संपूरक या भिन्न विचार हों  तो आप भी विमेन्स वेब के लिए लिख सकते हैं।

घर के बाहर काम करने से क्या मैं बुरी माँ बन जाऊँगी?

टिप्पणी

Women In Corporate Allies 2020

अपना ईमेल पता दर्ज करें - हर हफ्ते हम आपको दिलचस्प लेख भेजेंगे!

Women In Corporate Allies 2020