हिंदी साहित्य और लेखन में महिलाएं – तब से अब तक हमेशा रहा योगदान और भागीदारी

Posted: September 13, 2019

ख़ुशी की बात है कि महिला लेखक अपने अनूठे अनुभवों और विचारों को सक्षमता से प्रस्तुत कर रही हैं। हिंदी साहित्य और लेखन में महिलाएं अपना स्थान बनाये हुए हैं। 

आज 14 सितम्बर का दिन भारत के लिए एक महत्वपूर्ण दिन है क्योंकि इस दिन को समस्त देश में हिंदी दिवस के रूप में मनाया जाता है। आज हम यहां हिंदी साहित्य और लेखन में महिलाएं, उनकी भागीदारी और योगदान की बात करेंगे।

पहला हिंदी दिवस 14 सितम्बर 1953 को मनाया गया

जब भारत ब्रिटिश राज्य से आज़ाद हुआ तब यह सवाल उठ खड़ा हुआ कि देश की भाषा कौन सी हो क्योंकि भारत भाषायी, धार्मिक, सामाजिक और खान-पान की विविधता वाला देश है। यहाँ अनेकोनेक भाषाएं और बोलियां बोली जाती हैं। ऐसे में देश की एकता और कामकाज की सुविधा के लिए एक आधिकारिक भाषा को चुनना ज़रूरी था।

हिंदी ह्रदय की भाषा

महात्मा गाँधी और अन्य कई नेतागण का भी विचार था कि हिंदी जन मानस की भाषा है और वे चाहते थे कि हिंदी को राष्ट्रभाषा का सम्मान दिया जाये। यह इच्छा महात्मा गाँधी ने  1918 में प्रगट भी की थी। वे मानते थे कि ‘हिंदी ह्रदय की भाषा’ है।

स्वतंत्रता प्राप्ति के दो साल बाद आज ही के दिन हिंदी को संविधान सभा में एक मत से राज भाषा का दर्ज़ा प्रदान किया गया था। राजभाषा नीति में यह भी कहा गया था कि पंद्रह सालों तक शासकीय कामों में अंग्रेज़ी का प्रयोग पहले की तरह किया जाता रहेगा। ऐसा विश्वास किया गया था कि इन पंद्रह वर्षों में सभी नागरिक हिंदी पढ़ना-लिखना सीख जायेंगे और फिर हिंदी को राष्ट्रभाषा के रूप में अपनाने में किसी प्रकार का अवधान नहीं होगा। पर कुछ अहिन्दीभाषी राज्यों के विरोध और कुछ अन्य कारणों की वजह से हिंदी को राष्ट्रभाषा का दर्ज़ा नहीं दिया जा सका है। इसी वजह से आज भी शासकीय काम हिंदी, अंग्रेज़ी और क्षेत्रीय भाषाओं में किया जाता है।

हिंदी में तो कई भाषाओं का समन्वय है

पर ऐसा नहीं है कि हिंदी का प्रयोग करना अन्य भाषाओँ का बहिष्कार या तिरस्कार करने जैसा है। हिंदी में तो कई भाषाओँ जैसे संस्कृत, उर्दू और न सिर्फ़ कई क्षेत्रीय भाषाओँ बल्कि विदेशी भाषाओँ जैसे फ़ारसी, पुर्तगाली, तुर्की आदि का समन्वय है। यह अन्य भाषाओँ को साथ लेकर चलती है और इस तरह से यह जन-जन की भाषा है।

हिंदी के प्रचार-प्रसार में पत्रकारिता और साहित्य का भी महत्वपूर्ण योगदान रहा है

प्रख्यात कवि भारतेंदु हरिश्चंद्र ने कहा था,

‘निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल, 
बिन निज भाषा ज्ञान के, रहत मूढ़ के मूढ़ ।’ 
अर्थात अपनी भाषा का समग्र ज्ञान रख कर ही आप उन्नति कर सकते हैं।’ 

हिंदी साहित्य और लेखन में महिलाएं

यदि हम हिंदी साहित्य में महिलाओं की भागीदारी और योगदान की बात करें तो आज़ादी की लड़ाई के दौरान ज्यादातर साहित्य में देशप्रेम के भावना दिखती थी। उषा देवी मित्रा, सरोजिनी नायडू, महादेवी वर्मा, सुभद्रा कुमारी चौहान आदि ने अपने समकालीन विषयों को अभिव्यक्ति दी।

भारत कोकिला के नाम से प्रसिद्ध सरोजिनी नायडू का मानना था कि भारतीय नारी कभी भी कृपा की पात्र नहीं थी, वह सदैव समानता की अधिकारी रही है। कांग्रेस प्रमुख चुने जाने के बाद उन्होंने अपने अध्यक्षीय भाषण में कहा था, ‘अपने विशिष्ट सेवकों में मुझे मुख्य स्थान के लिए चुनकर आपने कोई विशेष उदाहरण नहीं दिया है। आप तो केवल पुरानी परंपरा की ओर लौटे हैं और फिर से भारतीय नारी को उसके उस पुरातन स्थान पर ला खड़ा किया है जहाँ वह कभी थी।’

महिलाओं का अपनी पारम्परिक छवि को तोड़ना

आज़ादी के बाद परिस्थितियां बदलने के साथ ही साहित्य और लेखन में महिलाओं के स्वर और विषयों में भी बदलाव दिखने लगा। नारी मुक्ति की भावना और अभिव्यक्ति ज्यादा मुखर रूप से उभर कर सामने आयी। महिलाओं का अपनी पारम्परिक छवि को तोड़कर एक नए रूप में दिखना पुरुषों के लिए अचम्भे से कम नहीं था। मन्नू भंडारी, उषा प्रियंवदा, चन्द्रकिरण सौनरिक्सा आदि का लेखन इसका उदाहरण है।

नए परिवेश में पुरुष के साथ बराबरी से कन्धा मिलाकर चलने, पारिवारिक और सामाजिक मूल्यों में बदलाव के साथ साथ वैयक्तिक चेतना ने महिला साहित्य में एक नए स्वर को जन्म दिया। अमृता प्रीतम, शिवानी, कृष्णा सोबती, निरुपमा सेवती, मेहरुन्निसा परवेज़ आदि के लेखन ने नारी मूल्यों को नए सिरे से गढ़ा और एक नयी पहचान दी।

अमृता प्रीतम ने दशकों पहले ही कह दिया था, ‘भारतीय मर्द अब भी औरतों को परंपरागत काम करते देखने के आदी हैं। उन्हें बुद्धिमान औरतों की संगत तो चाहिए होती है पर शादी करने के लिए नहीं। एक सशक्त महिला के साथ की क़द्र करना उन्हें अब भी आया नहीं है।’ वे अपने वक़्त से बहुत आगे की सोच रखती थीं।

उपन्यास लेखन की बजाय कथा-कहानी

वर्तमान समय में जब टेलीविज़न और इंटरनेट जैसे मनोरंजन के नए साधन ज्यादा प्रचलित हो गए हैं, साहित्य में लोगों की रूचि कम हो रही है और हिंदी साहित्य में तो और भी। शायद यही कारण है कि महिला लेखकों की हिंदी लेखन में रूचि कम होती प्रतीत होती है या यूँ कहे तो ज्यादातर लेखिकाएं उपन्यास लेखन की बजाय कथा-कहानी लिखना पसंद कर रही हैं। ये मेरी व्यक्तिगत राय है। फिर भी पिछले वर्षों में बाबुषा कोहली, मनीषा कुलश्रेष्ठ, योगिता यादव आदि ने हिंदी साहित्य में अपनी पहचान बना ली है।

हिंदी पत्रकारिता में भी महिलायें का अच्छा काम

और इंटरनेट के नुकसान हैं तो लाभ भी हैं। सोशल मीडिया की वजह से ही अनुराधा सिंह, मोनिका कुमार जैसे कई नाम तेजी से उभर रहे हैं। बहुत से वेबसाइट भी महिलाओं को घर बैठे ही अपनी क्रियात्मकता दिखाने का अवसर प्रदान कर रही हैं। हिंदी पत्रकारिता में भी महिलायें काफ़ी अच्छा काम कर रही हैं।

यह बहुत ख़ुशी की बात है कि महिला लेखक अपने अनूठे अनुभवों और विचारों को सक्षमता से प्रस्तुत कर रही हैं। हिंदी साहित्य और लेखन में महिलाएं अपना स्थान बनाये हुए हैं।

वैश्विक स्तर पर हिंदी का सम्मान

आज हमारे राजनेता विदेश में भी हिंदी में भाषण देना पसंद कर रहे हैं और यह वैश्विक स्तर पर हिंदी के सम्मान को बढ़ा रहा है। जब हमारे राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री हिंदी में देशवासियों को सम्बोधित करते हैं तो उनमें हिंदी के लिए एक अपनत्व की भावना का संचार होता है। यह आज की हिंगलिश बोलने वाली देसी और विदेश में रहने वाली नयी पीढ़ी की भी हिंदी में रूचि जागृत कर रहा है और यह एक बहुत उत्साहवर्धक संकेत है।

मूल चित्र : Google/Canva 

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