फेसबुक की दुनिया बहुत छोटी होती है, तेरी मेरी खुशियों का ढिंढोरा होती है

Posted: September 9, 2019

मैंने भी कोशिश की, छुपा कर सब दुःख-दर्द सीने में, खुशिओं का मुखौटा लगाकर जीने की, पर क्या फ़ायदा ऐसे बेमानी मुस्कराने में, झूठी मुस्कान हमेशा फीकी होती है

फेसबुक की दुनिया बहुत छोटी होती है, तेरी मेरी खुशियों का ढिंढोरा होती है।

देखकर दूसरों की जिंदिगी में उजाले, ना जाने कितनी रातें मुझे नींद नहीं आई,
मालूम है ऐसी सोच संकुचित मानसिकता की निशानी होती है।
मैंने भी कोशिश की, दुनिया संग मुस्कराने की,
छुपा कर सब दुःख-दर्द सीने में, खुशिओं का मुखौटा लगाकर जीने की,
पर क्या फ़ायदा ऐसे बेमानी मुस्कराने में, झूठी मुस्कान हमेशा फीकी होती है,
फेसबुक की दुनिया बहुत सीमित होती है, तेरी मेरी खुशियों का ढिंढोरा होती है।

मन के अंधेरों को कैसे रोशन करुं, ढूंढा बहुत ये चिराग मैंने, सोशल मीडिया के गलियारों में,
मन के अंधेरों को कैसे रोशन करुं, ढूंढा बहुत ये चिराग मैंने, सोशल मीडिया के गलियारों में।
अँधेरा सिर्फ गहराता ही गया, अँधेरा सिर्फ गहराता ही गया, जितनी चली मैं इन चौराहों में,
इतनी सस्ती नहीं खुशियां, इतनी सस्ती नहीं खुशियां, जो मिल जाए हमें गैस के गुबारों में,
फेसबुक की दुनिया बहुत छोटी होती है, तेरी मेरी खुशियों का ढिंढोरा होती है।

मूल चित्र : Pixabay 

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