ख़ूबसूरत या ख़ूबसीरत? कोई मेरी सूरत पसंद न करे चलता है, मैं ख़ुद को कमतर मानूं, खलता है!

Posted: August 19, 2019

ख़ूबसूरती चेहरों में नहीं होती, वो तो दिलों से निकली ज्योति। ब्यूटी इंडस्ट्री ने ख़ूबसूरती को फ़क़त ३६-२६-३६ बता, औरतों को बार्बी डॉल सा बना दिया – कमला भसीन 

कमला भसीन कहती हैं –

मेरी भला क्या औकात है,  
पर ये मेरी नहीं
खलील जिबरान साहब की फ़रमाई बात है। 
वे फ़रमाते हैं, ख़ूबसूरती चेहरों में नहीं होती 
वो तो है दिलों से निकली ज्योति।
इसलिए, अब तो सोचना हमें भी है 
ख़ूबसूरत या खूबसीरत? चमकते चेहरे या अन्दर की लौ?
लगन किस की है, अगन किस की है?
सूरत हम सब की है क़ुदरत बनाती 
क़ुदरत किसी को ख़ूब, किसी को बद बताती 
क़ुदरत की बनाई मूरतों को ख़ूब या बद बताना 
कहाँ की दानिशमंदी है, हमें ज़रा समझाना।  

कोई और मेरी सूरत पसन्द न करे ये तो चलता है 
पर मैं ख़ुद, ख़ुद को कमतर मानूं, ये तो खलता है।  
जब चेहरा ही नकली हो गया तो बचा क्या असली 
चेहरा नकली, तो अन्दर-बाहर सब नकली।  
अच्छी सीरत की चमक कहीं अन्दर से निकलती है 
ये वो शै है जो कुदरतन और हमेशा चमकती है।
सूरत आई-गई है, आज है कल नहीं 
मेहनत से बनाई सीरत जाती नहीं कहीं।  
दिलों से निकली लौ चमका देती है चेहरे 
फिर लगाने नहीं पड़ते ब्यूटीशियनस के फेरे।  

अच्छी सीरत पैदा होती है हमारे मूल्यों से, हमदर्दी से 
इन्साफ़, प्यार और बराबरी फैलाने की जल्दी से।  
घावों पर मलहम लगाने से
दुखती रगों को सहलाने से।  
सीरत ख़ूब हो तो सुरत ख़ुद बख़ुद चमकती है 
खूबसीरत और खूबसूरत दोनों बनतीं हैं प्यार देने और पाने से
मेहनत कर कमाने से, मिल बैठ कर खाने से। 

ये बदक़िस्मती है आज के युवाओं की 
उन्हें सुननी पड़ती हैं बातें बाज़ारू, मुनाफ़ाखोर हवाओं की।  
ब्यूटी इंडस्ट्री ने ख़ूबसूरती को फ़क़त ३६-२६-३६ बता दिया 
इंडस्ट्री के झांसे में आने वाली औरतों को बार्बी डॉल सा बना दिया। 
दक्षिण एशिया में तो चमकता है सूरज, यहाँ क्यों है हंगामा गोरे रंग का 
यहाँ क्यों बजता है दिन भर, जगह-जगह फेयर एंड लवली का डंका।
गोरे रंगों के दलाल और उनके काले धंधे
बन रहे हैं साँवली-काली लड़कियों के गले के फंदे।   

ब्यूटी कॉम्पीटीशन्स झूठ और फ़रेब भी फैलाते हैं 
वे प्रतिद्वंदियों को झूठ बोलना सिखलाते हैं। 
तभी तो इंटरव्यू में सुन्दरियां गीत मदर टेरेसा के गाती हैं 
मगर ख़िताब मिलते ही चक्कर वो बॉलीवुड के लगाती हैं।  
इंटरव्यू में बात वीमेन एम्पावरमेंट की करी
पर बाद में नज़र सिर्फ़ पैसे और मुनाफ़े पर धरी।  
इन सुन्दरियों ने हर क़िस्म के झूठे इश्तहारों से पैसा कमाया 
देश की युवा पीढ़ी को नकली सौन्दर्य के जाल में फँसाया।
इन सुन्दरियों की मदद से ब्यूटी इंडस्ट्री मुनाफ़े से लहलहा रही है 
मगर सौ में से सत्तर औरतें कमतरी के अहसास को सहला रही हैं।  

एक बॉलीवुड सुन्दरी देती हैं ज़ोरों से देशप्रेम की दुहाई 
पर ग़ैरक़ानूनी इश्तेहारों में व्हिस्की को सोडा बताने में उन्हें शर्म न आई।
ये सौन्दर्य और देशप्रेम कैसा है 
जिसके दिल में और आसपास सिर्फ़ पैसा है।  
तो, हमें फिर से सोचना होगा, ख़ूब सूरत या ख़ूब सीरत?
लगन किस कि है , अगन किसकी है?
पितृसत्ता ने हम औरतों को सिर्फ़ जिस्म माना
हमें ‘चीज़’ और ‘माल’ जैसे ही पहचाना। 

ख़ूबसूरती’ के नाम पर चीन में हमारे पांव बांधे  
अफ्रीका में लड़कियों की यौनिकता को क़ाबू करने को FGM(female genital mutilation)किये 
हमारी विर्जिनिटी के सबूत सफ़ेद चादर पर खून के दाग़ देख कर लिए।
अगर हम किसी को सिर्फ़ जिस्म, हाड-मांस जाने 
उन्हें इंसान ही न माने 
तब बहुत आसान हो जाता है उन्हें नकारना,दुत्कारना, मारना, मरवाना  
उन का बलात्कार करना, उनसे दिन रात अच्छा-बुरा काम करवाना 
उनके जिस्म को इश्तेहारों, आइटम नंबर्स में बेहयाई से इस्तेमाल करना। 
क्या यही सब नहीं किया पितृसत्ता ने लड़कियों औरतों के साथ?

क्या बदकिस्मती है कि अब बहुत सी औरतें, खुद को सिर्फ़ जिस्म समझ कर 
बुन रही हैं ज़ाली और सतही ख़ूबसूरती के जाले
और कर रहीं हैं ख़ुद को बाज़ारू, बिकाऊ ख़ूबसूरती के हवाले।  
शादी के मंडप पर जाने से पहले 
लेती हैं हज़ारों का ब्राइडल मेकअप पैकेज
फिर इस मंहगे, बनावटी चेहरे और जिस्म के साथ शुरू करती हैं नई ज़िन्दगी।  
ये ब्राइडल मेकअप कितने दिन चलता है?
रिश्तों और ज़िन्दगी में क्या ये कुछ भी बदलता है
इस मेकअप के धुल जाने के बाद क्या पलता है?
क्या कोई असलियत देख, निराश हो हाथ मलता है?
क्या किसी को ये झूठ, ये फ़रेब खलता है?

मैं सोचती हूँ कि क्या ये मेकअप पैकेजिज़ की ख्वाहिश हमारे अन्दर की है 
या बाज़ारू ख़ूबसूरती में बहके हुए नकलची बन्दर की है?
पिदरशाही और बाज़ार की नज़र में खूबसूरत चन्द औरतों को ज़रूर खूब चढ़ाया जाता है 
शायरी में उन्हें हुस्न कहा जाता है,
मगर सिर्फ़ हुस्न, सिर्फ़ जिस्म।  
मर्द है इश्क़, औरत हुस्न।   
शायर जिसे नूरानी समझते हैं उस औरत को शमा कहते हैं  
वो शमा जिस पर मंडरा कर परवाने (मर्द) जल मरते हैं।  
पर ये सब सुना और दिखा सिर्फ़ शायरी में, हक़ीक़त में नहीं।  

ये ज़रूर सच है कि कुछ औरतें कुछ वक़्त के लिए 
पितृसत्ता में अपने जिस्मों को भुना सकती हैं 
औरों की बनाई परिभाषा में ख़ूबसूरत लग कर निजात पा सकती हैं 
मगर कितनी औरतें? कितने वक़्त के लिए?
क्या इस तरह पिदरशाही निज़ाम को बदला जा सकता है?

दोस्तो, हमें मानना ही होगा कि जिस्मोजाँ नश्वर है, फ़ानी है 
इसकी शक्लोसूरत, इसकी रंगत आनी-जानी है।  
हो सकता है कुछ औरतें कुछ वक़्त के लिए जिस्मों के ज़रिये पा लें निजात 
पर इस रास्ते चल कर ज़्यादा औरतें तो होती रहेंगी बरबाद।  
सही तो यही लगता है कि हमारा जिस्म जैसा भी है उसे अपनाना है
उसे प्यार करना है और मज़बूत, लचीला बनाना है।  
साथ-साथ अपनी सीरत को चमकाना है
और हर झूँठी, बनावटी चीज़ और बात को दबाना है।  

कमला भसीन : एक संक्षिप्त परिचय

कमला भसीन महिला आन्दोलन से जुड़ी एक नारीवादी और विकास कर्मी हैं। १९७० से आज तक वे नारीवादी समूहों व संजालों और संयुक्त राष्ट्र संघ के माध्यम से नारी-पुरुष समानता, मानव अधिकार, शान्ति और सतत विकास पर काम कर रही हैं। कमला का कार्यक्षेत्र एशिया रहा है। जिन सँस्थाओं और संजालों से उनका जुड़ाव रहा है, वे हैं सेवा मंदिर उदयपुर, FAO/UN, जागोरी दिल्ली, जागोरी हिमाचल, Sangat A Feminist Network, Peace Women across the Globe, One Billion Rising, People’s SAARC, South Asians for Human Rights, आदि।

कमला भसीन ने अपने काम से जुड़े तमाम मुद्दों पर हिन्दी व इंग्लिश में किताबें, लेख, गाने, कविताएँ लिखी हैं व पोस्टर और बैनर बनाये हैं। बच्चों के लिये भी इन्होंने किताबें, गाने व कवितायें लिखी हैं।

कमला अपने पुत्र जीतकमल के साथ दिल्ली, जयपुर व हिमाचल में रहती हैं।

मूलचित्र : Pexels/Google 

      

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