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मेरी नौकरी – सिर्फ कमाई नहीं मेरा आत्मसम्मान भी

Posted: August 2, 2019

मेरे लिए नौकरी करने का मतलब सिर्फ रुपये कमाना नहीं है, मैं फिर से अपनी पहचान खोजना चाहती हूँ, अपना खोया हुआ आत्मविश्वास फिर से जगाना चाहती हूँ। 

“लेकिन बेटा, तुम्हें जॉब करने की ज़रूरत ही क्या है? घर संभालो, बच्चों को संभालो। ये काम भी कम हैं क्या?”

लीना के ससुर जी बोले। लीना ने जब घर में ये निर्णय सुनाया कि वो फिर से जॉब करना चाहती है तो घर के सभी सदस्यों के बीच इस बात को लेकर चर्चा होने लगी।

“अरे बहू, तुम्हें क्या ज़रूरत आन पड़ी कमाने की, हमें कोई कमी है भला? ईश्वर की दया से सब कुछ है। तुम बस अपनी गृहस्थी संभालो। क्यों आशीष क्या मैंने कुछ गलत कहा?” लीना की सास ने अपना मत रखते हुए लीना के पति से सवाल किया।

आशीष ने भी अपनी माँ का पक्ष लेते हुए कहा, “यदि तुम्हें कोई कमी हो तो कहो, मैंने तो कभी पैसों को लेकर तुम पर कोई रोक-टोक नहीं की।”

छः साल हो गए लीना की शादी को। मध्यम वर्गीय परिवार की लीना चार बहन-भाइयों में तीसरे नंबर की थी। माता-पिता ने लड़के या लड़की में कोई फर्क नहीं किया कभी। सबको बराबर का पढ़ाया लिखाया। अच्छे संस्कारों के साथ अपने पैरों पर खड़ा होने के काबिल भी बनाया। ग्रेजुएशन के बाद से ही लीना जॉब करने लगी थी। उसके बाद फिर आगे की पढ़ाई व अपने अन्य खर्चों के लिए लीना कभी किसी पर निर्भर नहीं रही।

सही समय आने पर लीना का विवाह आशीष के साथ हो गया, बिना किसी दान-दहेज के। उस समय तो लीना की आत्मनिर्भरता, उसका कमाऊ होना, सबको बहुत अच्छा लगा था। इसलिए शादी के बाद भी वह जॉब करती रही। इस से ससुराल में भी किसी को कोई आपत्ति नहीं हुई। उसकी सास भी घर के कामों में उसका हाथ बटा दिया करती थी। लीना ने शादी के बाद ससुराल पक्ष को तीज-त्यौहार आदि मौकों पर दिए जाने वाले उपहारों के लिए भी कभी मायके से पैसे नहीं लिए। कैसे लेती, ये उसके आत्मसम्मान के खिलाफ था। खुद कमाते हुए, माता-पिता से पैसे लेना उसे स्वीकार न था। ये बात केवल लीना और उसके पति आशीष के बीच ही थी।

दो वर्षों बाद जब लीना पहली बार मां बनी तो उसने स्वयं ही ये निर्णय लिया कि कुछ समय के लिए जॉब से ब्रेक लेगी ताकि बच्ची पर पूरा ध्यान दे सके। जॉब तो फिर से शुरू की जा सकती है किन्तु उस समय बच्ची को उसकी ज़्यादा ज़रूरत थी, इसलिए घर के सभी सदस्यों ने भी उसके इस निर्णय में उसका साथ दिया।

समय बीतता गया और लीना दूसरी बार मां बनी। अब उस पर 2 बच्चों की ज़िम्मेदारी थी। सास-ससुर भी वृद्ध हो चले थे। धीरे-धीरे कर के घर की सब कार्यों की ज़िम्मेदारी लीना पर आ चुकी थी।

इस बात से तो आप में से कोई भी इनकार नहीं कर सकता कि कोई भी गृहिणी, खास-तौर से जो माँ भी हैं, उन्हें कभी भी काम से अवकाश नहीं मिलता है। चाहे इतवार हो या त्यौहार, या कोई और छुट्टी का दिन, पर माँ के लिए हर दिन एक जैसा है, बल्कि छुट्टी वाले दिन तो काम और बढ़ जाता है क्योंकि सब लोग घर पर होते हैं तो सबकी अलग-अलग फरमाइशें पूरी करना भी उस एक मात्र गृहिणी का ही काम होता है। और केवल इसलिए कि उसके द्वारा किये गए कार्यों का कोई आर्थिक मूल्यांकन नहीं हो पाता है या यूँ कहें कि उसे अपने कार्यों के बदले कोई पारिश्रमिक नहीं मिलता है, उसे प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से अक्सर ही ये सुनने को मिल जाता है कि “तुम सारा दिन घर में करती ही क्या हो?” या “तुम तो घर में रहती हो तो जब चाहे आराम कर सकती हो, तुम्हें क्या पता बाहर जा के काम करने में कितनी मेहनत लगती है”, इत्यादि।

लीना की ज़िंदगी भी कुछ ऐसी ही होने लगी थी। मेहनत पहले से दोगुनी कर रही थी, बिना अवकाश के, पर उसकी मेहनत किसी को दिखाई न देती थी। अपनी कोई पहचान का न होना भी उसे कभी-कभी बहुत खलता था। अब तो उसके व्यवहार में वो खीझ दिखाई भी दे जाती थी।

जब बच्चे कुछ बड़े हुए और स्कूल जाने लगे तो लीना को लगा कि यही सही वक्त है पुरानी लीना को फिर से जीवित करने का, आत्मनिर्भर बनने का, अपनी नई पहचान बनाने का। राह आसान नहीं थी, क्योंकि एक लंबे अंतराल के बाद फिर से करियर शुरू करना बहुत मुश्किल होता है। लेकिन लीना का निश्चय दृढ़ था। लीना ने अपनी सहेली प्रिया से जो कि स्वयं एक स्कूल में प्रधानाध्यापिका है, इस बारे में बात की तो उसने तुरंत लीना को अपने स्कूल में शिक्षिका के तौर पर जॉइन करने का आफर दे दिया।

जब लीना ने घर में सबको अपना निर्णय बताया, तो सब को थोड़ा आश्चर्य हुआ और सब अपनी अपनी प्रतिक्रियाएं देने लगे। सबकी सुनने के बाद लीना ने अपना पक्ष रखते हुए कहा कि “मैं जॉब इसलिए नहीं करना चाहती हूं कि मुझे पैसों को लेकर कोई समस्या है। मैं जानती हूँ कि आप लोगों ने कभी रुपये पैसों को लेकर मुझ से कोई सवाल जवाब नहीं किया। पर मेरे लिए नौकरी करने का मतलब सिर्फ रुपये कमाना नहीं है, मैं फिर से अपनी पहचान खोजना चाहती हूँ, अपना खोया हुआ आत्मविश्वास फिर से जगाना चाहती हूँ, अपना आत्मसम्मान फिर पाना चाहती हूँ। मैं जानती हूँ कि घर एवं बच्चों के प्रति भी मेरी काफी ज़िम्मेदारियाँ हैं, लेकिन यदि आप सब भी मेरा साथ देंगे तो सब कुछ बहुत आसानी से हो जाएगा।”

लीना की बात सुन सबको ये आभास हो गया था कि उसने सदैव बिना किसी शिकायत पूरे समर्पण भाव से अपने हर उत्तरदायित्व को निभाया है और इस बात की ग्लानि भी हुई कि इतने वर्षों वे लीना की इच्छाओं को न समझ सके। अब लीना के लिए कुछ करने की बारी घर के बाकी सदस्यों की थी। लीना के पति और सास-ससुर ने मिलकर लीना के इस निर्णय को खुशी-खुशी स्वीकार किया औऱ उसे उज्ज्वल भविष्य की शुभकामनाएं दीं। और लीना चल पड़ी अपने नए सफर की शुरुआत करने, अपनी पहचान बनाने।

बहनों, किसी भी महिला के लिए अपने द्वारा कमाए गए रुपये केवल उसको आर्थिक रूप से सशक्त ही नहीं बनाते बल्कि इससे उस महिला के आत्मसम्मान को भी संबल मिलता है और अपनी एक पहचान भी बनती है। इसलिए हर महिला को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनना चाहिए। काम छोटा हो या बड़ा, आय थोड़ी हो या अधिक, ये ज़्यादा महत्वपूर्ण नहीं है, महत्वपूर्ण है आपकी अपनी एक पहचान। क्या आप मुझसे सहमत हैं?

मूलचित्र : Pexel

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