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‘पितृसत्ता के अंतिम संस्कार का समय आ पहुँचा है’-कमला भसीन

Posted: July 22, 2019

दुर्भाग्यवश हमारे परिवार और धर्म जिन्हें समानता और न्याय के पक्ष में खड़ा होने चाहिए था, वे ही पितृसत्ता के सबसे बड़े हिमायती और शालाएं या मदरसे बने बैठे हैं। 

कमला भसीन के अपने शब्दों में –

संयुक्त राष्ट्र संघ के अनुसार दुनिया की हर तीन में से एक औरत पर हिंसा होती है। यानि, सौ करोड़ औरतों पर हिंसा होती है। यह दुनिया की सब से बड़ी जंग है जो कभी बंद नहीं होती और सबसे दुःख और शर्म की बात यह है कि यह जंग सबसे ज़्यादा परिवारों के अन्दर होती है।

हम किसी पर हिंसा तभी कर सकते हैं, या करते हैं जब हम उन्हें अपने से कमतर और कमज़ोर समझते हैं या, जब हम मानते हैं कि वे पूर्ण इंसान नहीं हैं, कम समझ हैं, इसलिए उनका अपमान, उत्पीड़न व शोषण किया जा सकता है। उनको समझाने के लिए हिंसा का इस्तेमाल किया जा सकता है।

महिलाओं और लड़कियों पर होने वाली हिंसा के पीछे पितृसत्तात्मक विचारधारा और ढांचा है। अगर पितृसत्ता है तो औरतों पर हिंसा होगी ही। उसके बिना यह अन्यायपूर्ण व्यवस्था चल ही नहीं सकती। पितृसत्ता के कारण ही पूरी दुनिया में औरतों पर हिंसा हो रही है और दुनिया के किसी भी देश में स्त्री पुरुष समानता नहीं है। इसलिए स्त्री-पुरुष समानता स्थापित करने के लिए और हिंसा मिटाने के लिए पितृसत्ता को गहराई से समझना और उसे जड़ से मिटाना ज़रूरी है।

क्या है पितृसत्ता?

पितृसत्ता एक पुराना शब्द है जिसका मतलब है पिता की सत्ता, मगर आज इस शब्द का अर्थ पुरुष सत्ता है, क्योंकि पितृसत्ता केवल परिवारों में नहीं है और केवल पिता ही औरतों पर हावी नहीं हैं।

पितृसत्ता एक सामाजिक व्यवस्था है जिसमें पुरुषों को स्त्रियों से उत्तम माना जाता है और जिसमें संसाधनों, निर्णयों और विचारधारा पर पुरुषों का अधिक नियंत्रण होता है। अन्य सामाजिक व्यवस्थायों की तरह ही पितृसत्ता एक ढांचा भी है और एक विचारधारा भी। वह है, जो दिखाई देता है, जैसे परिवार के मुखिया पुरुष हैं, वंश का नाम उनसे चलता है, परिवार की संपत्ति पर उनका ज़्यादा अधिकार है, उन्हें हर तरह की आज़ादी है, सामाजिक संस्थानों पर उनका अधिक अधिकार है, आदि।

कोई भी सामजिक व्यवस्था व ढांचा तभी चल सकते हैं जब लोग उन्हें स्वीकारें और मानें। इसके लिए ज़रूरी होती है एक विचारधारा और मानसिकता। यह विचारधारा हर समय दोहराई जाती है। हवा के जैसे, यह चारों तरफ होती है, मगर दिखाई नहीं देती। पुरुषसत्ता को मनवाने और पुख्ता बनाने के लिए, पुरुषों को उत्तम और महिलाओं को निम्न बताने वाली सोच को, भाषा, मुहावरों, कहानियों, गीतों, फिल्मों, विज्ञापनों, त्योहारों के माध्यम से सतत फैलाया जाता है।

धार्मिक व अन्य कहानियों में कहा जाता है कि पुरुष परिवार के मुखिया हैं, वे पति-परमेश्वर हैं, वंश चलाने वाले हैं, इसलिए पारिवारिक संपत्ति पर उनका अधिक अधिकार है, आदि। पुरुष बलवान हैं, तार्किक हैं, स्त्रियाँ कमज़ोर हैं, कम बुद्धि हैं, उन पर नियंत्रण करना आवश्यक है। बेटियां पराया धन हैं, वे बोझ हैं, वे अंतिम संस्कार नहीं कर सकतीं, माहवारी के दौरान वे अछूत हैं, आदि। फिर पुत्र पाने के लिए, पति की लम्बी उम्र के लिए व्रत, ऐसी मान्यताएं और रीति-रिवाज पुरुषसत्ता को बल देते रहते हैं और हम इस व्यवस्था को मानते रहते हैं।

अगर कोई पूछे कि पुरुष कैसे और क्यों स्त्रियों से बेहतर हैं तो इसमें कोई तर्क नहीं हैं। पुरुषों के पास सत्ता थी तो उन्होंने कह दिया कि पुरुष बेहतर हैं। घोषित करने के बाद मन-घड़ंत तर्क दे दिए। यह ठीक वैसे है जैसे जातिवाद में ब्राह्मणों ने खुद को सब से उत्तम घोषित कर दिया। आम जनता को दिया तर्क था कि ब्राह्मण ब्रह्माजी के सिर से पैदा हुए हैं, इसलिए सब से बेहतर हैं। हमने तो किसी को किसी के सिर से पैदा होते नहीं देखा।

सभी इंसान औरतों की योनी से ही पैदा होते हैं। यानि, पित्रसत्ता और जातिवाद दोनों अन्धविश्वास के अलावा कुछ नहीं हैं, मगर ये हमारी ज़िंदगी में छाये हुए हैं और गहरी असमानता फैलाये हुए हैं। पितृसत्ता और जातिवाद दोनों भारतीय संविधान का उल्लंघन और अपमान करते हैं।

पितृसत्ता में स्त्रियों पर तरह-तरह के बंधन और नियंत्रण

पितृसत्ता में स्त्रियों पर कई तरह के नियंत्रण होते हैं, जैसे उनकी श्रम शक्ति पर नियंत्रण। वे क्या पढ़ेंगी और क्या काम करेंगी, उन्हें काम करने भी दिया जाएगा या नहीं, उनके काम का क्या दाम दिया जाएगा, आदि। परिवारों के अन्दर सुबह से शाम तक औरतें जो काम करती हैं उसे आज भी आर्थिक गतिविधि या काम नहीं माना जाता, हालांकि UNDP के अनुसार इस काम की सालाना कीमत है 11 ट्रिलियन डॉलर।

औरतों का अपनी प्रजनन शक्ति पर भी अक्सर अपना नियंत्रण नहीं होता। उनकी शादी कब होगी, वे कब और कितने बच्चे पैदा करेंगी, वे खुद तय नहीं करतीं। पहले परिवार और समाज तय करते थे, अब सरकारें भी कानून बना कर तय करती हैं।

औरतों की यौनिकता पर भी औरों का नियंत्रण हो सकता है, जैसे कम उम्र में शादी करके उनकी यौनिकता पर नियंत्रण पुरुषों को सौंप दिया जाता है। एक तरफ उनकी यौनिकता को दबाने के लिए अपनी बहु-बेटियों को पर्दों और कपड़ों से ढका जाता है, उन्हें घरों से बाहर नहीं जाने दिया जाता और दूसरी तरफ कुछ औरतों को नंगा करके देह के बाज़ारों में बैठाया जाता है, विज्ञापनों में उनका इस्तेमाल किया जाता है, आइटम नंबरों में नचाया जाता है। पितृसत्ता को दोनों तरह की औरतों की ज़रुरत है। लड़कियों और औरतों का यौन शोषण और बलात्कार किया जाता है।

लड़कियों और औरतों पर नियंत्रण रखने के लिए उनके चलने फिरने पर रोक लगाना ज़रूरी है और यह किया जाता है। लड़के और पुरुष कभी भी, कहीं भी आ जा सकते हैं, मगर औरतों पर पाबंदियां होती हैं।

पुरुष सत्ता में हर तरह के संसाधनों पर पुरुषों का अधिक नियंत्रण होता है। लड़कों के हिस्से में भोजन, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवायें, संपत्ति अधिक आती हैं। आज इक्कीसवीं सदी में भी बिरला, टाटा, अम्बानी, बुश, कैनेडी, परिवारों में पुत्र ही संपत्ति और सत्ता के मालिक होते हैं।

lnternational Labor Organisation के अनुसार दुनिया में किये जाने वाले काम का 66% काम महिलायें करती हैं, जबकि दुनिया में बांटे जाने वाली आय का सिर्फ़ 10% उन्हें प्राप्त होता है और वे सिर्फ़ 1% संपत्ति की मालिक हैं।

इस के साथ साथ सभी आर्थिक, राजनैतिक, सामाजिक, शैक्षणिक, क़ानूनी संस्थानों पर भी पुरुषों का अधिक नियंत्रण होता है। यही है पुरुष तन्त्र और यह हमारे चारों ओर विद्यमान हैं।

दुर्भाग्यवश हमारे परिवार और धर्म जिन्हें समानता और न्याय के पक्ष में खड़ा होने चाहिए था, वे ही पितृसत्ता के सबसे बड़े हिमायती और शालाएं या मदरसे बने बैठे हैं। यहीं पर पितृसत्ता के पाठ पढ़ाये और रटाये जाते हैं। यहाँ से पितृसत्ता को हटाना बहुत ज़रूरी है और यही सबसे ज़्यादा मुश्किल भी है। धर्मों पर सवाल उठाने से तो लोग बहुत ही डरते हैं। इस डर को त्यागना होगा ताकि हमारा सबसे महत्वपूर्ण ग्रन्थ, यानि भारत का संविधान जी सके।

पितृसत्ता में स्त्रियाँ एकदम सत्ताहीन नहीं होतीं

ऐसा नहीं है कि पितृसत्ता में स्त्रियों के पास बिलकुल सत्ता नहीं होती। हमारी कई नानियों, दादियों, माओं का बहुत रुतबा और दबदबा हो सकता है। जो औरतें पितृसत्ता को मानती हैं और उसे औरों पर लागू करती हैं और जो क़ाबिल हैं, उन्हें मान और अधिकार दिए जा सकते हैं, मगर पितृसत्ता की मर्यादा के अन्दर।

हमने देखा है कि राजा की मौत के बाद उनकी रानी ने सत्ता संभाली। दुर्भाग्यवश प्रजातंत्र में भी यही हो रहा है। प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति पुरुष के मरने के बाद उनकी कई बेटियों और पत्नियों ने ये पद संभाले हैं, ख़ास तौर से दक्षिण एशिया में। उदाहरण के लिए श्रीमती बन्दारनाय्के, श्रीमती इंदिरा गाँधी, मोहतरमा बेनज़ीर भुट्टो, मोहतरमा खालिदा ज़िया, आदि, मेरी नज़र में ये नारी शक्ति के उदाहरण नहीं हैं। ये तो पितृसत्ता की मज़बूती और प्रजातंत्र की कमज़ोरी के उदाहरण हैं।

सिर्फ़ पुरुष नहीं, स्त्रियाँ भी पितृसत्तात्मक हो सकती हैं और होती हैं

चूंकि स्त्रियाँ भी पितृसत्तात्मक परिवारों और समाजों में पैदा होती हैं, पितृसत्तात्मक धर्मों को मानती हैं, इसलिए वे भी पितृसत्ता को मानती हैं। नयी पीढ़ी को पितृसत्ता के पाठ पढ़ाने की ज़िम्मेदारी भी इनको सौंपी जाती है। है ना विडंबना? अपने पैरों पर खुद कुल्हाड़ी मारना यही है। सास-बहु के झगड़ों के किस्से रोज़ सुनाये जाते हैं और कहा जाता है कि औरत भी औरत की दुश्मन है, मगर सास और जवाई के झगड़ों के किस्से नहीं हैं। पत्नियों की माएँ तो जवाईओं के नखरे झेलते नहीं थकतीं। बहुत सी माएँ अपने राजा बेटों को जी भर के बिगाड़ती हैं, बेटियों के साथ भेद-भाव करती हैं, उन पर पहरे बैठाती हैं।

नारीवादी पुरुषों के खिलाफ नहीं हैं, वे पितृसत्ता के खिलाफ हैं

नारिवादिओं पर अक्सर यह इलज़ाम लगाया जाता है कि वे पुरुषों के खिलाफ हैं, मगर यह सरासर ग़लत है। हम नारीवादी, पुरुषों के खिलाफ नहीं हैं, पितृसत्ता के खिलाफ हैं। अगर पुरुष पितृसत्तात्मक हैं तो हम ज़रूर उनके खिलाफ़ हैं, और हम पितृसत्तात्मक औरतों के भी ख़िलाफ़ हैं। बहुत से पुरुषों ने पितृसत्ता का विरोध किया है और कर रहे हैं और वे नारीवादी हैं, वे स्त्री-पुरुष समानता के हक़ में हैं।

सच तो यह है कि स्त्री-पुरुष समानता की लड़ाई स्त्री और पुरुष के बीच की लड़ाई है ही नहीं। यह तो दो मानसिकताओं के बीच की लड़ाई है। एक मानसिकता मानती है कि पितृसत्ता बेहतर है। दूसरी मानसिकता मानती है कि समानता बेहतर है यानी एक मानसिकता संविधान के ख़िलाफ़ है, और दूसरी उसके पक्ष में है, और दोनों तरफ स्त्रियाँ भी हैं और पुरुष भी।  

पितृसत्ता पुरुषों का भी बहुत नुकसान कर रही है

पितृसत्ता में पुरुषों और लड़कों को अनगिनत फ़ायदे होते हैं, मगर अगर गौर से देखें तो उन्हें नुकसान भी बहुत होते हैं। ठीक वैसे जैसे पितृसत्ता लड़कियों को ज़नाने रूप में ढालती है, वह लड़कों को मर्दाना बनाती है, चाहे वे ये चाहें या नहीं – “तुम लड़के हो तुम रोओगे नहीं”, “लड़के अपनी कमज़ोरी का ब्यान नहीं करते”, “वे भावनायें नहीं दिखा सकते”, “तुम को हर हाल में अपनी ताक़त दिखानी है”, “तुम घर के काम में माँ का हाथ नहीं बटाओगे”, आदि।

बचपन में ही लड़कों को खेलने के लिए बंदूकें पकड़ा दी जाती हैं। उनके हर खेल में प्रतिद्वंदिता है।जैसे ही लड़के जवानी की तरफ़ बढ़ते हैं उन पर ‘मरदाना’ बनने का दबाव रहता है – सिगरेट पिओ, नशा करो, लड़कियों को छेड़ो, कम उम्र में ही मोटरसाइकिल या कार चलाओ और एक्सीडेंट करते फिरो। इस दबाव से बचना मुश्किल होता है और इन सब बातों का क्या असर होता है लड़कों और समाज पर हम जानते हैं।

हर कुछ हफ़्तों में अमरीका में कोई जवान पुरुष बंदूक उठा कर किसी स्कूल, कॉलेज, मॉल में लोगों की हत्या कर देता है। हर आतंकवादी समूह में लड़के और पुरुष भरे हुए हैं, जेल पुरुषों से भरे हुए हैं। आजकल तो 18 साल से छोटे लड़के बलात्कार कर रहे हैं, चोरियां कर रहे हैं। भारत में 40% से 50% पति अपनी पत्नियों पर हिंसा करते हैं, हर 22 मिनट में एक बलात्कार होता है।

मेरा मानना है कि औरों पर वही लोग हिंसा कर सकते हैं जिनकी इंसानियत मर गयी है। कोई इंसान बलात्कार नहीं कर सकता, यह हैवान ही कर सकते हैं। इस का मतलब है कि पुरुषों की इंसानियत मर रही है, वे हिंसक, दबंगी, बेशर्म बन रहे हैं।

लड़के और पुरुष हिंसात्मक पैदा नहीं होते। वे प्राकृतिक रूप से हिंसात्मक नहीं हैं। अगर ऐसा होता तो कोई भी पुरुष बुद्ध, ईसा मसीह या गुरु नानक नहीं बन सकता था। पितृसत्ता पुरुषों को बाक़ायदा हिंसा सिखाती है, उन्हें दबंग, बदतमीज़ बनाती है, उन्हें बेशर्मी सिखाती है। तभी तो हमारे दबंग लाडलों ने भारत की हर गली, सड़क, पेड़, मैदान को मूत्रालय बना दिया है।

अब सच में समय आ गया है कि हम सब,और ख़ास तौर से लड़के और पुरुष समझें कि पितृसत्ता उनका कितना और कैसे नुकसान कर रही है और इस भयंकर बीमारी से कैसे बचा और लड़ा जाए।जब पितृसत्ता स्त्रियों और पुरुषों दोनों का नुकसान कर रही है, असमानता, अन्याय और हिंसा फैला रही है, और यह सब भारत के संविधान का उल्लंघन है, तो फिर हम क्यों इसे सह रहे हैं, क्यों इसे पनपा रहे हैं?

हर बराबरी, इंसाफ़ और अमन पसंद इंसान को अपने दिलोदिमाग़, परिवार,समाज और संस्था से पितृसत्ता को हटाना चाहिए ताकि देश का हर लड़का और लड़की इज्ज़त से जी सके, आगे बढ़ सके और हर परिवार में हिंसा की जगह प्यार का आलम हो।

पितृसत्ता में बेटियों को अंतिम संस्कार नहीं करने दिया जाता, मगर पितृसत्ता का अंतिम संस्कार हम पूरे ज़ोर शोर से, बराबरी पसन्द पुरुषों के साथ मिल कर करेंगी और भारत के संविधान का जश्न मनाएँगी।

मूलचित्र : Pexels

                

कमला भसीन : एक संक्षिप्त परिचय

कमला भसीन महिला आन्दोलन से जुड़ी एक नारीवादी और विकास कर्मी हैं। १९७० से आज तक वे नारीवादी समूहों व संजालों और संयुक्त राष्ट्र संघ के माध्यम से नारी-पुरुष समानता, मानव अधिकार, शान्ति और सतत विकास पर काम कर रही हैं। कमला का कार्यक्षेत्र एशिया रहा है। जिन सँस्थाओं और संजालों से उनका जुड़ाव रहा है, वे हैं सेवा मंदिर उदयपुर, FAO/UN, जागोरी दिल्ली, जागोरी हिमाचल, Sangat A Feminist Network, Peace Women across the Globe, One Billion Rising, People’s SAARC, South Asians for Human Rights, आदि।

कमला भसीन ने अपने काम से जुड़े तमाम मुद्दों पर हिन्दी व इंग्लिश में किताबें, लेख, गाने, कविताएँ लिखी हैं व पोस्टर और बैनर बनाये हैं। बच्चों के लिये भी इन्होंने किताबें, गाने व कवितायें लिखी हैं।  

कमला अपने पुत्र जीतकमल के साथ दिल्ली, जयपुर व हिमाचल में रहती हैं।

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