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घरेलू हिंसा : पितृसत्तात्मक समाज का प्रभाव? एक हिस्सा?

Posted: July 18, 2019

घरेलु हिंसा के ज़्यादातर मामले घर की चारदीवारी से बाहर नहीं आते। जब घरेलू मामले घरेलू बनकर अपना गला घोंट दें, तो कानून सिर्फ कानून बनकर रह जाते हैं। 

‘हर हंसते हुए चेहरे के पीछे उसकी मुस्कुराहट हो यह ज़रूरी नहीं। एक घुटन, आंसुओं से भरा दिल भी हो सकता है। जिन्हें शायद आपकी मदद की ज़रूरत हो। हर काला निशान ज़रूरी नहीं कि मच्छर के काटने का हो या किसी से टकराने पर लगी हुई चोट का हो। हो सकता है उसे किसी ने बुरी तरह शारीरिक प्रताड़ित किया हो और उसकी उसी मुस्कान के पीछे उसका मानसिक दर्द हो।’

हो सकता है वह घरेलु हिंसा का शिकार हो…

शुरुआती पंक्तियों का संदर्भ कुछ ऐसा है कि अभी कुछ दिन पहले ही रिश्तेदारी में किसी की मौत की खबर आई। घर से बाहर हूँ और दूर के रिश्तेदार हैं, तो खबर आने में थोड़ा समय लग गया। उम्र का अंदाज़ा लगाया तो पता चला उनकी उम्र कुछ 65 से 70 बरस की होगी। उम्र सुनकर मौत का कारण जानने का नहीं सोचा। फोन रखने लगी तो माँ ने कहा पूछ तो ले कैसे हुई। ऐसा सुनकर थोड़ा अजीब लगा मगर पूछा तो पता चला कि उन्होंने कुएं में कूदकर आत्महत्या कर ली थी। आत्महत्या का सुनकर इतना दुःख नहीं हुआ जितना उसका कारण जानकर हुआ। दिन-रात की नींद उड़ गई।

कारण था – घरेलू हिंसा

सोचकर मन दुःखी हो रहा था। घबराहट हो रही थी कि कितना सहा होगा उस औरत ने जो इस उम्र में ऐसा कदम उठाया। इतने पर भी लगा कि पति शराब पीता होगा इसलिए मार-पीट करता होगा। जैसा कि ज़्यादातर मामलों में सुनने में आता है, या यूँ कहें कि जैसा मैंने देखा है, मगर ऐसा भी नहीं था। किसी इंसान के मानसिक दु:खों को अनसुना कर सकते हैं क्योंकि वह हमें दिखाई नहीं देते मगर किसी इंसान की शारीरिक पीड़ा नहीं देखी जाती। अभी भी पितृसत्तात्मक समाज का प्रभाव इतना है कि किसी औरत पर मर्द का हाथ उठना जायज़ है। हैरत होती है जब होश में भी लोगों का ऐसी हरकतें करते हुए दिल नहीं पसीजता।

शराब पीकर मार-पीट करने वालों को मैंने देखा है। एक बार सब्जी मंडी में, तो एक बार अपने पड़ोस में। सब्जी मंडी वाले केस में भी मैंने अपने आप को यही समझाया था कि यह लोग गरीबी से जूझ रहे हैं। पढ़े-लिखे नहीं हैं इसलिए इनके आसपास का माहौल ऐसा नहीं है कि कोई इनको समझाए कि शराब पीने के लिए औरत से पैसे मांगना, जो उसने पूरे दिन कड़ी मेहनत करके कमाएं हैं, और केवल मांगना ही नहीं बल्कि मना करने पर सरेबाज़ार अपनी पत्नी से मार-पीट करना अपराध है।

औरत कोई आपकी जागीर नहीं है, जो आपके ऐश-ओ-आराम के लिए कमाए। मगर उस औरत के लिए लड़े कौन? ख़ुद उसके के पास इतनी सुविधाएं नहीं कि अपने लिए लड़ सके, और उसके आसपास, सभी तो इसी तरह अपना गुज़र बसर कर रहे हैं।

अपने पड़ोस में जब ऐसा देखा, तो समझ आया कि शायद इस समाज ने ही मर्दों को औरत पर अपना हुकुम चलाने और बात ना मानने पर मार-पीट करने का हक दिया है। साथ ही औरत को भी अपने खुद पर हो रहे अन्याय सहने का हक दिया है।

दिमाग अपना आपा तो तब खो देता है, जब एक औरत ही दूसरी औरत के लिए खड़ी नहीं होती। क्यों एक माँ अपने उस कायर बेटे के दो तमाचे जड़ कर उस दूसरी औरत के साथ होने वाली अनहोनी से नहीं बचा सकती? क्योंकि सहना और अपने पति की हर बात में सहमति तो नारी के चरित्र के दो गहने हैं।

थूकती हूं मैं समाज के बनाए ऐसे गहनों पर और ऐसे लोगों की सोच पर, जो अपनी वीरता का प्रदर्शन खुद की पत्नी के साथ मार-पीट के साथ करते हैं। घरेलू यौन हिंसा का चलन तो है ही नहीं। मतलब इसकी तो हिंसा में गिनती ही नहीं होती क्योंकि पत्नी है यानी अपनी प्रॉपर्टी है। जिसका इस्तेमाल अपनी सहूलियत के हिसाब से किया जाएगा। उसमें उसकी रज़ामंदी तो कहीं ज़रूरी ही नहीं है। जब घरेलू हिंसा नाम का कीड़ा ही औरत को काट रहा है तो घर के बाहर बैठे हिंसक जानवरों से औरत की सुरक्षा पर बात का कोई औचित्य ही मुझे समझ नहीं आता।

यह सब लिखने से पहले घरेलू हिंसा से संबंधित जानकारी जुटाने का प्रयास किया तो घरेलू हिंसा अधिनियम, 2005 की जानकारी मिली जो पीड़ित महिलाओं की घरेलू हिंसा से मदद करता है। क्या यह एक्ट घरेलू हिंसा को रोकने के लिए काफी है? जब घरेलू मामले घरेलू बनकर ही अपना गला घोंट दे तो यह कानून सिर्फ कानून बनकर रह जाते हैं। ज्यादातर मामले तो घर की चारदीवारी से बाहर नहीं आते और जो किसी तरह आ भी जाएं तो वह पुलिस चौकी से आगे नहीं बढ़ पाते। केवल नगण्य की संख्या में ही मामलों की जानकारी हम तक पहुंचती है।

परेशान करने वाले आंकड़े जो राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण 2015-16 (National family health survey) से मिले वह थे कि महिलाओं द्वारा सही गयी शारीरिक यातनाऐं आयु के साथ बढ़ती हैं। 17% 15-19 साल के बीच तो 35% 40-49 साल की महिलाओं के साथ मारपीट का प्रतिशत है। औरत को सशक्त बनाने के लिए बेशक उसका शिक्षित होना ज़रूरी है, अगर वह खुद पर हो रहे अन्यायों के प्रति लड़ सके। किसी दूसरी महिला की सहायता की मैं उम्मीद नहीं करती, मगर इतना काफी होगा अगर हर औरत अपने लिए लड़े क्योंकि घरेलू हिंसा के मामले ऐसे हैं, जिनमें औरत का शिक्षित होना या आर्थिक रूप से मज़बूती कहीं मायने नहीं रखता।

घरेलू हिंसा के मामलों को कम करने के लिए औरत को अपने लिए लड़ाई लड़ने की ज़रूरत है। अगर आदमी उसे अपने पैर की जूती ना समझे और उसके साथ अपने साथी की तरह बर्ताव करे तो ऐसे मामलों में कमी आ सकती है।

अपने रिश्तेदार की आत्महत्या की खबर सुनकर लगा कि मुझे लिखना चाहिए, उन सभी महिलाओं के लिए जो यह सब झेल रही हैं या झेलने के बाद अपनी जान गँवा चुकी हैं।

मेरी माँ अक्सर मुझसे कहा करती हैं कि ‘बुरे के साथ बुरा नहीं बना जाता’ मगर आज इसके साथ ही मुझे यह भी याद आया कि ‘अन्याय करने वाले से ज़्यादा अन्याय सहने वाला गुनाहगार होता है।’

मूलचित्र : Pixabay 

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