हमारे समाज को अंधविश्वास से मुक्ति कब मिलेगी?

शनिदेव पर तेल बहाने से ईश्वर खुश होंगे या किसी गरीब के घर में तेल देने से, उसका परिवार भर पेट भोजन खा सके, उससे ईश्वर खुश होंगे?

सोनाली घर का सारा काम खत्म कर कर नहाने के बाद अपनी बालकॉनी में थोड़ी देर अपने गीले बाल सुखाने के लिए खड़ी थी। तभी उसकी सास ने नीचे से चिल्लाते हुए कहा, “अरे ये क्या बहु! आज फिर वीरवार के दिन सर धो लिया? इन शहर की पढ़ी-लिखी लड़कियों से तो कुछ कहना ही बेकार है।” सोनाली की सास नीचे खड़ी-खड़ी बड़बड़ाये जा रही थी।

सोनाली एक पढ़ी-लिखी, साइंस की पोस्ट-ग्रेजुएट लड़की थी। उसका ईश्वर में अटूट विश्वास था, पर ये पंडितों के बनाये अन्धविश्वास में वो बिल्कुल यकीन नहीं करती थी। उसे तो ईश्वर का बनाया हुआ हर दिन ही अनमोल लगता था, फिर ये अन्धविश्वास की बातें कैसे?

वीरवार को सर मत धो, मंगलवार को नाखून मत काटो, शनिवार को पंडित को तेल दो, एकादशी को चावल मत बनाओ, पीपल के पेड़ के नीचे मत खड़े हो, वीरवार को बाल मत कटवाओ आदि, सारी बातें बस पंडितों का बनाया हुआ एक ढकोसला लगती थीं।

उसे तो वो दिन भी याद है, जब वो कॉलेज में थी और मात्र एक छोटी सी अफ़वाह पर सारे लोग गणेश जी को दूध पिलाने के लिए मंदिर को ओर दौड़ पड़े थे। कितना दुःख हुआ था उसे। उस दिन लोग दूध मंदिरों में बहा रहे थे और सड़क पर गरीब बच्चे भूखे बिलबिला रहे थे।

अभी पिछले साल ही की तो बात है, जब करवा-चौथ पर एक अफ़वाह उड़ी कि इस बार का करवा-चौथ पतियों पर भारी है। उसकी सास ने पंडित जी को बुला कर कितना पैसा दिया था।

उसे हमेशा इन पंडितों के फैलाये झूठ पर बहुत गुस्सा आता, पर क्या करती उसकी सास इन पंडितों के मायाजाल में जकड़ी हुई थी। वैसे तो वो घर के बाहर कोई भी पंडित मांगने आता, चाहे अमावस का दान हो, या सूर्यग्रहण का दान, या शनिदेव का दान, या एकादशी का दान, खूब बढ़-चढ़ कर पैसे लुटाती। वहीं दूसरी ओर जब कोई गरीब सब्जी-वाला कुछ बेचने आता, तो उससे एक-दो रुपए के लिए चिक-चिक करती। अगर कोई गरीब कुम्हार दीवाली पर मिट्टी के दीये बेचने आता, तो 10 रु के 10 दीये की जगह उससे लड़-लड़ कर 15 दीये ले लेती या कोई सफाई कर्मचारी सड़क को साफ करता तो उससे लड़ाई कर भला-बुरा कहती।

सोनाली को यही बातें बहुत परेशान करती थीं। आखिर किस किताब में लिखा है कि केवल पंडित को दान देने से ही हम अच्छे बन जाते हैं। क्या एक गरीब आदमी जो मेहनत कर-कर के अपनी रोज़ी रोटी कमा रहा है, उसे जबरन 2 या 5 रुपये कम करवा लेने से ईश्वर खुश होंगे?

क्या ईश्वर के बनाये हुए दिन बुरे हो सकते हैं? जिस दिन ईश्वर हमें ज़िंदगी दे रहा है, वो ही दिन हमारे लिए अनमोल है। फिर यह दिनों में, वीरवार, मंगलवार, शनिवार का भेद क्यों?

शनिदेव पर तेल बहाने से ईश्वर खुश होंगे या किसी गरीब के घर में तेल देने से, उसका परिवार भर पेट भोजन खा सके, उससे भगवान खुश होंगे?

सोनाली यही सब सोच रही थी तभी उसके कानों में सास की आवाज़ आयी, “बहु शाम को बाज़ार  जाकर कुछ सामान ले आना। कल पंडित जी आये थे, बता रहे थे, हमारे घर के ऊपर साढ़े-साती शुरू हो गयी है। कल वो आएंगे तो पूजा करवाऊँगी। उन्हें दान भी देना है ..”

अपनी सास की बातें सुनकर सोनाली सोचने लगी, आखिर हमारे समाज को अन्धविश्वाश से मुक्ति कब मिलेगी!

मूलचित्र : Pixabay

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13 वर्ष की उम्र से लेखन में सक्रिय , समाचार पत्रों में कविताएं कहानियां लेख लिखती हूँ। एक टॉप ब्लागर मोमस्प्रेसो , प्रतिलिपी, शीरोज, स्ट्रीमिरर और पेड ब्लॉगर, कैसियो, बेबी डव, मदर स्पर्श, और न्यूट्रा लाइट जैसे ब्रांड्स के साथ स्पांसर ब्लॉग लिखती हूँ मेरी कहानियां समाज में फैली कुरीतियों को दूर करने के लिए होती है रिश्तों के उतार चढ़ाव मेरे ब्लॉग की मुख्य विशेषता है

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