टेकन फॉर ग्रांटेड सिंड्रोम है तुम्हारे तनाव का कारण

Posted: June 6, 2019

तुम्हें अपनी खुशियों का ख्याल ख़ुद रखना होगा, तुम्हें भी अपनी चॉइस से जीने का अधिकार है। बहुत प्यार लुटा लिया सब पर, अब थोड़ी ख़ुद से मोहब्बत कर लो।

“विनीता अपना ख्याल रखा करो, कुछ स्वास्थ्य की समस्या हुई है क्या तुमको?” सुषमा भाभी ने चिंतित स्वर में पूछा।

“अरे नहीं भाभी, एकदम स्वस्थ हूँ। ऐसा क्यूँ कहा?”

“तुम बाहर ही नहीं दिखती आजकल! ऊपर से कितनी दुबली हो रही हो, तो मुझे लगा शायद कुछ समस्या है।”

“ऐसा कुछ भी नहीं, आप बताइए कैसी हैं आप?” विनीता ने बातों का रुख़ बदल दिया।

ऐसा पहली बार नहीं हुआ था। पिछले कुछ महीनों से जिस से भी वो मिलती, लगभग यही बात सब पूछते। अब विनीता को इस सवाल से खीझ होने लगी थी।

“सुनिए कल डॉक्टर के पास चलना है, सोच रही हूँ एक बार दिखा ही लूँ”, विनीता ने रात को विनय से कहा।

“तुम चली जाओ यार! मै कल बहुत व्यस्त हूँ। मुझे पता है तुम अकेले मैनेज कर लोगी।”

“नहीं जा रही मैं! जब आपके पास समय हो मेरे लिए, बता देना। तभी चलेंगे।” विनीता ने कुढ़ते हुए जवाब दिया। इस छोटी सी तना-तनी के बाद विनय तो सो गया, लेकिन विनीता की नींद कही ग़ायब हो गई।

एक के बाद एक नकारात्मक विचार उसके मन में आ रहे थे और उसकी कुढ़न को बढ़ा रहे थे।

“कौन सा मर रही हूँ मैं, जो कल ही जाऊँगी डॉक्टर के पास। मैं जाऊँगी ही नहीं, जब किसी को मेरी परवाह ही नहीं है। विनय को मेरी पड़ी ही नहीं है, जब देखो तब काम-काम। समझ नहीं आता ये काम है, या मेरी सौत। ऊपर से पड़ोसी जीने नहीं देते, ‘तुम बीमार हो’, ‘तुम बीमार हो’ पूछ-पूछ कर बीमार ही बना देंगे मुझे।” विनीता का गुस्सा बढ़ता जा रहा था। किसी तरह आधी रात बीतने पर उसे नींद आई।

अगले दिन वो अकेले ही डॉक्टर के पास पहुँच गई। सारी बात सुनने के बाद डॉक्टर ने कुछ टेस्ट लिख दिए। दो दिन बाद विनीता टेस्ट की रिपोर्ट लेने पहुँची तो डॉक्टर ने उसे अपने पास बैठा लिया।

“देखो विनीता तुम्हारी सारी रिपोर्टस नॉर्मल हैं। लेकिन पिछले चार महीने में तुम्हारा 10 किलो वज़न घटा है। तुम अंडर वेट हो। शारीरिक रूप से कमज़ोर हो, लेकिन शुक्र मनाओ अभी तक किसी बीमारी ने तुम्हें नहीं जकड़ा है।”

“अब तुम ये बताओ, ऐसा क्या है जो तुम्हारा वज़न घटता जा रहा है?”

विनीता ने अचंभित हो डॉक्टर नैना की ओर देखा, “मुझे पता होता तो तुम्हारे पास आती क्या? डॉक्टर तुम हो, तुम ही बताओ क्या परेशानी है।”

“वही तो बताना चाह रही हूँ। तुमको कोई शारीरिक नहीं, मानसिक समस्या है। तुम्हारी सारी जाँच एकदम क्लियर है। अब सच-सच बताओ कि हुआ क्या है?”

“ये क्या बोल रही हो नैना! मैं एकदम ठीक हूँ। मुझे कोई मानसिक समस्या नहीं।” विनीता ने नज़र चुराते हुए कहा।

“मैं इतनी ज़िन्दा-दिल, खुश-मिज़ाज़ लड़की, जो रोते को भी हँसा दे, और, इतनी समझदार और गंभीर कि नामुमकिन सी लगने वाली समस्या का भी हल सूझा दे, मैं मानसिक रोगी हूँ?” विनीता ये बात स्वीकार करने को तैयार ही नहीं थी।

नैना विनीता के दिल का हाल समझ रही थी। इतना असान नहीं होता यह स्वीकार कर पाना।

“विनीता तू खुल कर बता ऐसा क्या है जो तुझे परेशान कर रहा है, कोई भी ऐसी बात जो तुझे कचोटती हो। मैं पहले तेरी दोस्त हूँ और डॉक्टर बाद में।”

“कितना अच्छा पति मिला है, एक छोटा सा प्यारा सुखी परिवार है। ऐसा क्या है, जो तुझे खाए जा रहा है?”

अभी तक ‘कोई परेशानी नहीं’ बोलने वाली विनीता की आँखो में अचानक नमी आ गई।

“बस यही परेशानी है मेरी, हर कोई मुझे यह अहसास दिलाता है कि कितना अच्छा पति और परिवार मिला है मुझे। कभी कोई विनय को नहीं समझाता कि उसे कितनी गुणी या अच्छी पत्नी मिली है। ये जो सुखी परिवार का टैग तुमने मुझे अभी दिया है ना, उसके लिए बहुत त्याग किया है मैंने। कोई भी परिवार ऐसे ही सुखी नहीं हो जाता। एक औरत को मिटाना पड़ता है ख़ुद को। मेरी कोई पसंद नापसंद नहीं है। ना ही मेरी कोई अपनी दिनचर्या है। बच्चों और पति के हिसाब से खुद को ढालते रहो तो आप अच्छी पत्नी हो वर्ना नहीं। मेरी किसी भी चीज़ की कोई प्राथमिकता नहीं। ना मेरे दोस्तों की ना मेरे रिश्तेदारों की! मैं एक केयर टेकर हूँ विनय की। उनके दोस्त उनका पर्सनल स्पेस उनके रिश्तेदार! बस यही सब चीज़ों का ख्याल रखते रहो। मेरा क्या?”

विनीता एक साँस में सब बोलती चली जा रही थी।

“विनय तो शायद अब ये भी भूल गए हैं कि मैं एक औरत हूँ, एक पत्नी हूँ। मेरी भी कुछ ज़रूरतें हो सकती हैं। कभी भी बाहर जाने के लिए बोलो, तो बहाना बना देते हैं। मेरे किसी भी काम की कोई प्राथमिकता नहीं उनके लिए। देखो तुम्हारे पास आने के लिए भी मना कर दिया, मैं अकेले ही आई हूँ।”

“तुम वर्किंग हो नैना, एक हाउस वाइफ होने का तनाव तुम नहीं समझ पाओगी। अब तो लगता है मेरी एजुकेशन भी किसी काम की नहीं रही। हर समय बस पति और बच्चों के लिए ही जीना पड़ता है। अपनी सौ इच्छाएं मारनी पड़ती है। और इन सब पर भी, मानो मेरे होने न होने से कोई फर्क नहीं पड़ता विनय को। ना जाने कब आख़िरी बार हमने एक दूसरे के साथ समय बिताया था। बस खाना खाने भर का समय साथ बिताने के बाद, वो घर से बाहर निकल जाते हैं। फिर पीछे मैं कुढ़ती रहूँ, उनकी बला से! उनको अपना समय बाहर बिताना होता है।”

विनीता जब अपना मन हल्का कर चुकी, तब नैना ने उसका हाथ थामकर कहा, “विनीता, तुम क्यूँ अपना अस्तित्व विनय में खोज रही हो! तुम विनीता हो, पढ़ी-लिखी सक्षम महिला। तुम क्यूँ चाहती हो विनय ही तुम्हारी ज़रुरत की हर चीज तुम्हें ला कर दे। तुम ख़ुद भी तो जाकर ला सकती हो। इतनी उम्मीद ही क्यूँ लगाती हो कि जब वो टूटे तो तुमको तकलीफ़ हो।”

“विनय की तारीफ़ पाने के लिए नहीं खुद को संतुष्ट करने के लिए कोई भी काम करो। और किसने कहा कि हाउस वाइफ का कोई अस्तित्व नहीं होता। तुम अपने घर की रीढ़ की हड्डी हो जिसपे पूरा परिवार टिका है। तुम्हें तुम्हारी खुशियों का ख्याल खुद रखना होगा तभी विनय को समझ आएगा कि तुम्हें भी खुश रहने का और अपनी चॉइस से जीने का अधिकार है।”

“तुम रोज़ सबकी पसंद का खाना बनाती हो, फिर मन ही मन कुछ समय बाद खीझने लगती हो कि कोई मेरी पसंद नहीं पूछता! तुम खुद अपनी पसंद का खाना बनाओ और सबको बताओ ये मेरी पसंद है। अब से ये भी बनेगा। विनय तुमसे नहीं पूछता तो तुम ख़ुद मज़बूती से उसे बताओ कि तुम्हें इस चीज़ की ज़रुरत है और वो तुम्हें चाहिए। विनय के प्यार और साथ के लिए अपनी जान जलाने से बे‍हतर ख़ुद को सकारात्मक माहौल में रखो। दोस्तों से बाते करो, अच्छा म्यूज़िक सुनो, कुछ लिखने या पढ़ने की कोशिश करो। खुद को सजाओ, संवारों। कोई भी काम जो तुम्हें खुशी दे, वो करो।”

“गुस्से में लाल-पीली, बिखरी हुई, बीमार, कमज़ोर औरत में से पहले वाली खुश, स्मार्ट और जिंदा-दिल विनीता को ढूंढ़ लाओ। तुम खुश-दिल रहोगी तो विनय भी खुद ब खुद खिंचा चला आएगा।”

“तुम्हारे तनाव का कारण ‘टेकेन फॉर ग्रांटेड सिंड्रोम’ है। ये सिंड्रोम आज कल बहुत सी गृहस्थियों को खोखला कर रहा है।”

“दरअसल, विनय को पता भी नहीं होगा कि जिन बातों को वो ऐसे ही इग्नोर कर रहा है, वो तुम्हारे मन और शरीर पर क्या असर डाल रही हैं। समय रहते अपने तनाव से छुटकारा पा लो विनीता, नहीं तो इस तनाव को अवसाद बनते देर नहीं लगेगी। और, अपने पति के साथ सारी बातें शेयर जरूर करना।”

विनीता ने नैना की बात को गंभीरता से लिया, और जुट गई खुद को संवारने में।

सच ही तो कहा नैना ने। आखिर, क्यूँ हम अपनी खुशियों की चाभी अपने पति के हाथ में सौंप देते हैं? पति चाहे तो दाल बने, पति चाहे तो पनीर। पति चाहे तो साड़ी पहनो, नहीं तो सूट। सजो तो पति के लिए, खाओ तो पति के लिए। नौकरी करना, ना करना, सब निर्णय पति पर ही क्यूँ छोड़ देते हैं।

क्यूँ हम औरतें अपना अस्तित्व भूल कर ख़ुद को जीवनसाथी की नज़र से देखने लगते हैं। सौ में से 80 महिलाएँ अपने जीवन में इस तनाव से गुजरती हैं जब उनको लगता है उनका अपना कोई अस्तित्व ही नहीं।

चलिए, ख़ुद को ख़ुद की नज़र से देखा जाए। बहुत प्यार लुटा लिया सब पर, अब थोड़ी सी ख़ुद से मोहब्बत कर ली जाए।

मूलचित्र : Pixabay 

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