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श्रद्धा का मोल-आधुनिक परिवेश में श्रद्धा भी बिज़नेस

Posted: June 29, 2019

लगता है आप पहली बार ऐसे दर्शन करने आए हैं। देखिए, पांच मिनट के दो सौ रुपए, दस मिनट के चार सौ, पन्द्रह मिनट के छः सौ पर हेड।

‘कमला जल्दी चलो दर्शन के लिए बहुत लंबी लाइन लगती है। जितनी सुबह जायेंगे उतनी ही जल्दी भगवान के दर्शन कर लेंगे।’

‘जी चलिए, मैंने पूजा का सारा सामान ले लिया है।’

मंदिर पहुंच कमला ने लाइन देखी तो चौंकते हुए बोली, ‘बाप रे इतनी सुबह इतनी लंबी लाइन है।’

‘हाँ! तो तुम्हें क्या लगा कि तुम ही सबसे पहले आई हो?’ हंसते हुए रामदयाल ने कहा।

‘सुनिए! चलिए ना उस लाइन में लग जाते हैं। वहां मुश्किल से दस-बीस  लोग ही हैं और पुजारी जी भी उन लोगों को अच्छे से दर्शन करवा रहे हैं।’

‘हम उस लाइन में नहीं लग सकते।’

इस पर कमला ने पूछा, ‘क्यों?’

‘उस तख्ती पर देखो क्या लिखा है।’

‘वी.आई.पी’, कमला ने पढ़ते हुए कहा।

‘कुछ समझी?’ रामदयाल ने हंसते हुए कहा। ‘पुजारी जी ऐसे ही उन्हें अंदर नहीं ले जा रहे हैं। इसके लिए उन्हें मोटी रकम मिल रही है, जो हम आम इंसान नहीं दे सकते और ना ही उनके जितना चढ़ावा चढ़ा सकते हैं।’

‘भगवान के घर में भी भेद-भाव हो रहा है। भगवान की नजर में तो सब मनुष्य एक समान होते हैं, लेकिन आज पता चला की श्रद्धा का भी मोल होता है।’ कमला ने कहा।

‘ये आम और खास का अंतर तो सदियों से चलता आया है और आगे भी चलता ही रहेगा।’

पंडित जी मोटी रकम देने वाले यजमान को मंदिर के अंदर ले जा रहे थे और अच्छे से दर्शन करा कर व्यक्ति को बाहर भेज रहे थे। कुछ देर बाद तपिश बढ़ने लगी। लोग गर्मी और धूप से परेशान अपनी बारी का इंतजार कर रहे थे।

कुछ देर बाद आगे लाइन में खड़े एक दंपति आपस में बात कर रहे थे, ‘सुनो ना बच्ची को गोद में लिए हुए मेरे पैरों में दर्द हो गया है, तुम भी पंडित जी को कुछ दे दो ना ताकि हम भी जल्दी दर्शन कर सकें।’

‘पैसे पेड़ पर उगते हैं क्या जो लुटाता फिरूं? तुम ही तो यहां दर्शन करने के लिए बेचैन थीं। अब भुगतो।’

किसी का प्यास के मारे गला सूख रहा था, कोई पैर दर्द के मारे परेशान हो रहा था, कोई अपनी लाइन में अपनी जगह पर ही थक कर बैठ गया था। लेकिन तमाम समस्याओं को सहते हुए भी, लोग खुशी-खुशी भगवान के दर्शन के लिए खड़े थे। ये भीड़ भी उन वी.आई.पी लोगों के कारण ही थी क्यूंकि उन्हें लंबी लाइनों में खड़े नहीं रहना था। उनमें से कुछ मध्यमवर्गीय परिवार भी पैसे देकर मंदिर में चले जा रहे थे, जिससे बाकि लोगों की लाइन आगे नहीं बढ़ पा रही थी।

‘सुनिए अब मुझसे भी खड़ा नहीं रहा जा रहा, पैर में भयानक दर्द हो रहा है। तीन घंटे हो गये हमें लाइन में लगे हुए, लेकिन लाइन बहुत ही धीरे-धीरे बढ़ रही है। आप भी पंडित जी से बात करिये ना। कुछ दे दीजिये जिससे वो हमें भी जल्दी दर्शन करा दें’, कमला ने कहा।

‘हाँ, तुम ठीक कह रही हो कमला। काफी समय हो गया है और हमें शाम की ट्रेन से वापस भी लौटना है। ऐसे खड़े रहे तो हमारी ट्रेन भी छूट जाएगी। रूको मैं पंडित जी से बात करता हूं।’

इतना कहकर रामदयाल वहां से चले गये।

‘नमस्कार पंडित जी।’

‘जी कहिए यजमान।’

‘हमें भी जल्दी दर्शन करा दीजिये। पत्नी बीमार है उसे खड़े होने में समस्या है। तीन घंटे हो गए हमें लाइन में खड़े हुए।’

‘अरे क्यों नहीं? बेकार ही आपने इतनी देर तक पत्नी को लाइन में लगाकर रखा, और पहले आ जाते। जाइए, आप पत्नी को ले आइए’, पंडित जी ने कहा।

रामदयाल, कमला जी को लेकर आए, ‘आइए आइए यजमान! आप कैसे दर्शन करना चाहते हैं?’

‘जी मैं समझा नहीं’, रामदयाल ने कहा।

‘जी मेरे कहने का मतलब है कि मंदिर के अंदर आप कितना समय पूजा करना चाहते हैं? उस हिसाब से आपको दक्षिणा देनी होगी।’

रामदयाल और कमला एक दूसरे का मुंह ताकने लगे।

‘लगता है आप पहली बार ऐसे दर्शन करने आए हैं। मैं ही आपको बता देता हूं। देखिए, पांच मिनट के दो सौ रुपए पर हेड, दस मिनट के चार सौ पर हेड, पन्द्रह मिनट के छः सौ पर हेड।’

‘अब आप बताइए इसमें से आप कौन सा पैकेज लेना चाहते हैं?’ पंडितजी ने कहा।

रामदयाल और कमला इस भगवान के दर्शन करने बड़े ही दूर से आए थे तो बिना दर्शन किए जाना भी उचित नहीं था क्योंकि समय और धन दोनों ही खर्च हुए थे। पत्नी की इच्छा और उसकी तबीयत को देखते हुए रामदयाल ने सोचा, जहां इतने पैसे खर्च हुए, वहां चार सौ और सही।

‘पंडित जी, हमें पांच मिनट के लिए ही जाना है’, रामदयाल ने कहा।

‘ठीक है, यहां पैसे दे दीजिये’, और एक दूसरे लड़के को बुलाते हुए कहा, ‘इन्हें दर्शन करवा दो।’

‘जी भईया।’

इतना कहकर वो रामदयाल और कमला को मंदिर के अंदर ले गया और दर्शन करवा कर उन्हें बहार छोड़ दिया।

वहां से दोनों ने ऑटो-रिक्शा किया और वापस होटल आ गए।

‘चलो थोड़ा आराम कर लो, फिर स्टेशन के लिए रवाना होना है।’

दोनों ने खाना खाया और लेट गए। लेटते हुए कमला की आंखों के सामने दर्शनार्थियों, लंबी लाइनों, पंडितों की बातें, सब एक-एक करके सारे दृश्य घूमने लगे।

ना चाहते हुए भी रामदयाल को भी पत्नी की तबीयत को देखते हुए पैसे देकर ही दर्शन करने पड़े।आधुनिक परिवेश में श्रद्धा भी बिज़नेस में बदल गयी है। हर जगह पैसे का बोलबाला है। दुःख होता है ये सब देखकर, लेकिन मजबूरी जो ना करा दे।

मूलचित्र : Pixabay 

This is Pragati B.Ed qualified and digital marketing certificate holder. A wife, A mom

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