बंद होते स्पंदन और मेरा ये संघर्ष

Posted: May 25, 2019

सिगरेट का धुआँ मेरे फेफड़ों में पूरी तरह से भर गया है। क्या सिगरेट पीने वाले हर इंसान के साथ यही होता है? यदि हाँ, तो सिगरेट क्यों पीते हैं?

‘ये तेरी जुल्फों के घने बादल में, मैं अपनी डगर भूल जाता हूँ,
जाना चाहता हूँ दिल्ली, मुंबई पहुंच जाता हूँ।’

पलक की काली घनी जुल्फों को देखकर आज भी मेरी ज़ुबान से यही लाइनें निकल रहीं थीं, पर पलक के कानों तक पहुँच ही नहीं पा रही थीं, क्योंकि इतनी ताकत बची ही नहीं थी कि लफ्ज़ किसी को सुनाई दें।

बुझे चेहरे के साथ जल्दी-जल्दी अपने बालों को क्लेचर से बाँध कर, मेरी तरफ मुस्कुराकर पलक ने कहा, “जल्दी आ जाऊंगी।” ये कहकर, स्कूल के लिए निकल गयी मेरी पलक,और मैं उसे जाते हुए देखता रह गया। फिर थोड़ी  देर बाद मेरे पापा आये, मेरे हाथों पे अपना हाथ रखकर बस मुझे देखते रहे।

मैं अस्पताल में, बिस्तर पर लेटा था, पर वो मुझसे ज़्यादा बीमार लग रहे थे। भला होंगे भी क्यों नहीं, कौन सा बाप अपनी साठ की उम्र में पैतीस साल के बेटे को वेंटिलेटर पे देख पायेगा, वो दर्द, जो एक-एक हड्डी को तोड़ देता है, सहता देख पायेगा।

इस बिस्तर पे पड़े-पड़े हर बात याद आती है। वो जल्दी से सारा खाना और सामान लेकर आ जाती है। मेरे सिर पे हाथ रख कर कहती हैं,” मेरा बेटा”, और लग जाती है मेरी सेवा में। माँ कभी मेरे साथ अस्पताल नहीं आती थीं, पर जब तक घर वापस नहीं आता था, तब तक घर के मंदिर में दिया जलाए बैठी रहती हैं। ये शायद उनके पूजा-पाठ का ही फल है जो कीमोथेरेपी के बहाने मुझे कुछ साँसें उधार मिल जाती हैं।

माँ और पलक के हफ्ते के पांच उपवास शायद मेरी सांस को अब भी बाँध के रखे हैं। उन दोनों को अपनी तकलीफ में घुटता देखता हूँ, तो सोचता हूँ कि काश मैं भी एक दिन के लिए उनके लिए उपवास कर लूँ। शायद मेरे उपवास का फल भी मिल जाये। पर अब, बस ये सब बातें हैं। उपवास, पूजा-पाठ करना तो बहुत दूर की बात है। मेरा अपने पैर पर खड़ा होना और बैठना भी मुहाल है, इसलिए लेटा ही रहता हूँ।

वो नाते-रिश्तेदार, जो हमेशा सिर-चढ़ा, घमंडी कहते थे, आज वो मेरे सबसे बडे़ हिमायती हैं। कैंसर का रोग आप का शरीर बदल देता है, और लोगों का व्यवहार भी। दुश्मन भी सलामती की दुआ माँगने लगता है, तो कुछ अपने भी पराये बन जाते हैंं। मेरी आठ साल की बेटी चुनमुन मुझसे बहुत प्यार करती है। जब मैं अच्छा था तो उसे कंधे पे उठाकर घुमाया करता था। पर अब डर लगता है, यदि मैं चार कँधों पे चला गया तो?

मेरा कैंसर मेरे साथ-साथ मेरे परिवार को भी लग गया है। पलक मेरी पत्नी 24 घंटे में 48 घंटे का काम करती है। स्कूल, कोचिंग, टयूशन, क्योंकि इलाज में दुआओं के साथ-साथ पैसे भी लगते हैं। पापा जो टीवी और अखबार में रमे रहते थे, अब अपनी एफ डी चेक करते रहते हैं कि कौन सी अगले इलाज में टूटेगी। माँ पहले भी पूजा-पाठ करती थीं, पर अब तो जैसे मिशन ‘बेटा बचाओ’ पे थीं। जैसे यमराज से कहना चाहती थीं कि मेरे बेटे को ना ले जा पाओगे। चौबीस घंटे मेरी सेवा करतीं, पर मेरी तरफ देखती नहीं। कौन माँ अपने मरते हुए बेटे से नज़रें मिलाती है। पलक मेरे सामने तो नहीं रोती पर उसकी सूजी आँखे सब बता जाती हैं।

मुझे पान और सिगरेट की वो दुकान हमेशा याद रहती है जहां मैं बैठकर सिगरेट फूँका करता था। उस सिगरेट का धुआँ मेरे फेफड़ों में पूरी तरह से भर गया है। क्या सिगरेट पीने वाले हर इंसान के साथ यही होता है? यदि हाँ, तो सिगरेट क्यों पीते हैं? और यदि नहीं, तो फिर मुझे ही बस क्यों हुआ? कैंसर का दर्द सहन नहीं होता। रातों में नहीं चीख़ने की मेरी हर कोशिश हार जाती है जब तकिये में मुँह दबाकर भी, मैं अपनी चीख नहीं रोक पाता। कभी-कभी तो मेरे मुँह से ख़ून भी आने लगता है।  वो खून देखकर मुझसे ज़्यादा दर्द पलक को होता है।

मेरी माँ जो बचपन में मुझे कहती थीं, ‘बेटा कुछ नहीं होता, अभी रुक जायेगा, सब ठीक हो जायेगा’, अब मुझसे ज्यादा डर जाती हैं। वो मम्मी-पापा जो मेरे लिए सब कुछ कर देते थे, वो इतने दर्द में भी कुछ नहीं कर पाते।

कैंसर क्यों पापा से नहीं डरता?  कितना बेरहम होता है कैंसर। एक बेटे को उसकी माँ की आँखों के सामने इतनी बेदर्दी से सज़ा देता है। कितना निर्दयी है ये कैंसर जो मेरी छोटी सी बेटी का प्लीज़ भी नहीं सुनता है।

काश, मैंने मम्मी की बात मानी होती।पलक की सिगरेट छोड़ने की ज़िद्द के सामने घुटने टेक दिए होते। मैं पिछले 11 महीने से लगातार कीमोथेरेपी का दर्द झेल रहा था। क्योंकि मैं जीना चाहता था, अपनी पाँच साल की बेटी के लिए, जो मुझे कहती थी, “पापा यू आर द बेस्ट।” कुछ साल और जी लेना चाहता था अपनी पलक के साथ, जिसने पिछले आठ साल की शादी में हर बुराई को स्वीकार किया। जीना चाहता था अपने पापा के लिए, कि जब वो बूढ़े हों तो मैं उनकी उंगली बन सकूँ। कुछ साँसे और लेना चाहता था अपनी माँ के लिए, कि उनके बुढ़ापे वाले बचपन में मैं अपने हाथ से खाना खिला सकूँ।

सिर के सारे बाल उड़ चुके थे, आँखों के नीचे काले घेरे बढ़ चुके थे। भूख तो जैसे मर चुकी थी। क्या मेरा ये संघर्ष पूरा होगा? मैं अपने घर जा पाऊँगा या नहीं?  कहीं मेरी ये हिम्मत भी जवाब ना दे जाए।

बंद होते स्पदंन के साथ सुनाई दे रहा था, “आप ले जा सकते हैं इन्हें घर।”

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