उड़ने का साहस-हो अगर संग, तो साथ दो

Posted: March 17, 2019

जिंदगी की कई बारीकियों से तब मैं अंजानी थी-“जिंदगी बदलती है हर पल, पर न सोचा कि तू बदल जायेगा, ऐसे कैसे कोई अपना, सामने से पलट जायेगा?”

जब जुड़ी थी तुमसे, तो माना बचपना था, नादानी थी,
जिंदगी की कई बारीकियों से तब मैं अंजानी थी।
सोचा था लम्बा सफर है, सीख लूंगी सब,
पर मैं भी कितनी दीवानी थी।
जिंदगी बदलती है हर पल,
पर न सोचा कि तू बदल जायेगा,
ऐसे कैसे कोई अपना, सामने से पलट जायेगा?

सोचती थी सब है अपार, हमारी खुशियां, हमारा प्यार,
ऐसे कैसे सिमट गया, तेरा-मेरा घर-संसार?
अब जब दस्तक देता है समय दरवाज़े पर,
देखती सब, और अंधकार हूँ,
अभी भी अवाक् हूं, घबराई, सिमटी बैठी, बदहवास हूँ।
कल तक थे जो राही एक मंज़िल के, आज कैसे गुमराह हो गए,
हम-तुम, जाने ऐसे कैसे, इतने बेपरवाह हो गए।

वो लम्हे, वो साथ, वो हंसी, वो खिलखिलाट,
वो बातें, वो यादें,
कब कैसे कहां विलुप्त हो गए।
अब दम घुटने लगा है, इस असमंजस में,
यूँ बिलखते-रोते, और सिसकने में।
हो अगर संग, तो साथ दो,
नहीं तो खुले आसमानों मे, उड़ने का साहस दो।

My name is Indu. I am a computer engineer by profession and qualification. I am

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Comments

2 Comments


  1. Absolutely loved it! I felt an instant connection reading your poetry and I wish there were more brilliant Hindi poets like you. May lots of people have this privilege of reading your soulful poetry.

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