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भगवान् का होना, एक ज़रुरत या एक खुदगर्ज़ी, एक साज़िश

Posted: March 23, 2019

“भगवान् का होना तो ज़रूरी है, भगवान् न हो तो इंसानियत कैसे बिकवा पाएँगे?” प्रश्न है, ‘क्या भगवान् का जन्म एक खुदगर्ज़ी, एक साज़िश है?’

भगवान् का होना भी ज़रूरी है,
भगवान् न हो तो इंसानियत कैसे बिकवा पाएँगे?

अकेले में देख के अपने मज़े के लिए,
रोज़-रोज़ द्रौपदी का चीर हरण कैसे करवा पाएँगे?

पति का रौब दिखा कर,
रोज़-रोज़ पार्वती से भाँग कैसे घुटवा पाएँगे?

पत्नी की थकान को भूल,
रोज़-रोज़ लक्ष्मी से अपने पैर कैसे दबवाएँगे?

रुख्मणि से शादी कर,
बाहर राधा से कैसे चक्कर चला पाएँगे?

राधा को अपने प्यार में फसा कर,
आखिर में उसे अकेला कैसे छोड़ पाएँगे?

फिर जब पैसों की कमी पड़ेगी,
तो फिर लक्ष्मी के आगे हाथ कैसे फैला पाएँगे?

जब कहीं कुछ निर्णय लेने में समस्या आए,
तो सरस्वती से बुद्धि की भीख कैसे मांग पाएँगे?

रणभूमि जब खुद की जान पर खतरा दिखे,
तो खुद को बचाने के लिए काली और दुर्गा को कैसे ला पाएँगे?

भगवान् का होना तो ज़रूरी है,
भगवान् न हो तो इंसानियत कैसे बिकवा पाएँगे?

 

 

Feminist by heart , Atheist by soul.

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