सावित्री – क्या सिर्फ़ एक पतिव्रता? या एक स्वतन्त्र महिला?

Posted: August 6, 2018

जहां एक तरफ हम अपनी बेटियों को पढ़ाने की और स्वतंत्र बनाने की बात करते हैं, वहीं दूसरी ओर, उन्हें अपने निर्णय ख़ुद लेने से रोकते हैं। ऐसा ख़्याल मुझे वट-सावित्री की कथा पढ़ते-पढ़ते आया। सावित्री को आज के समय में सिर्फ एक पतिव्रता स्त्री के रूप में जाना जाता है। पर सोचा जाए तो वो आज भी सब के लिए एक प्रेरणा-स्त्रोत बन सकती हैं। 

आज वट-सावित्री की पूजा की जाती है। माना जाता है कि आज ही के दिन सावित्री ने यमराज से अपने पति के प्राण बचाए थे। इसे पढ़ते-पढ़ते मेरे मन में कई बार, बहुत सारे सवाल आए। अगर इस कथा को सच मान लिया जाए, तो क्या ये वास्तविकता में संभव है कि किसी की इच्छा शक्ति से काल को भी हार माननी पड़ी हो? सावित्री के व्यक्तित्व को समझा जाए तो वो स्वाभिमानी, स्वतंत्र विचार वाली और द्रढ़निर्णय लेने में समर्थ महिला होंगी। क्या उन्हें ये पता था कि उन्हें क्या, और किस तरह प्राप्त करना है। यह एक जीवन काल में तो आसान नहीं है। आज की युवा पीढ़ी तो इस सवाल में खोई रहती है कि वो आख़िर चाहते क्या हैं।

सावित्री को अपना जीवन साथी चुनने की आज़ादी थी और भविष्य जानते हुए भी वो अपने निर्णय पर अडिग रहीं। उनके पिता ने उन्हें समझाने की बहुत कोशिश की, किंतु अंत में उन्होंने सावित्री के निर्णय का सम्मान किया। कहीं ना कहीं वो भी अपनी बेटी के मन को पढ़ पाए होंगे।

समझा जाए तो उस सदी में भी लड़कियों को अपना जीवन साथी चुनने की स्वतंत्रता थी। अगर इस एक बात की, आज के समय से तुलना की जाए तो मुझे ऐसा लगता है कि हम बहुत पीछे रह गए। प्रोग्रेसिव सोच की बात करना और सच में उस पर अमल करने मे बहुत अंतर है।

क्या कारण रहा होगा की आज के माता-पिता अपने बच्चों की पसंद को 80% स्थिति मे सही नहीं मानते, और अधिकतर परिवारों में अपना जीवन साथी ख़ुद  चुनना एक अपराध माना जाता है।
आप भी सोचिएगा कि इसमें हम पीछे क्यों रह गये। किस जगह हमारा समाज इतना ग़लत हो गया कि  हम एक अग्रसर सोच को आगे बढ़ाने की बजाय कहीं पीछे ले गये।
आगे बात करते हैं सावित्री की। शादी के बाद उन्हें  पता था कि उनके पास सिर्फ़ एक साल है। उसके बाद जाने क्या सोच के बैठी थीं सावित्री। कुछ ऐसा करना चाहती थीं जो कभी नहीं हुआ था, और शायद उसके बाद भी कभी नहीं हुआ। पर उन्हें विश्वास था, ख़ुद पर और अपने ईश्वर पर।

जिस दिन एक साल पूरा हुआ उस दिन सावित्री भी अपने पति के साथ काम पर निकल गईं। जैसा नारायण जी ने भविष्यवाणी की थी, वैसा हुआ भी। यमराज आए और सावित्री के पति के प्राण ले कर चल दिए। फिर वो हुआ जिसके बारे में यमराज ने भी कभी नहीं सोचा होगा। सावित्री भी यमराज के पीछे-पीछे चल दीं। कितनी गणनात्मक थीं और बहुत ही समझदार भी। सावित्री ने अपनी ज़िद से और अपनी सूझ-बूझ से यमराज से तीन वरदान भी ले लिए।
अब, मैं ये सोचने पर मजबूर हो गई कि जब किसी के सामने ऐसी स्थिति हो, तो कैसे उन्होंने इतनी सूझ-बूझ से, सबसे पहले अपने पति की जान नहीं बल्कि तीन वरदान माँगे।

पहले दो वरदानों में उन्होंने अपने सास-ससुर की आँखें और राज-पाठ, और अपने माता-पिता के लिए पुत्र माँगे। मतलब, उनको अपनी तर्क शक्ति और निपुणता पर इतना अधिक विश्वास था कि तीसरे वरदान में उन्होंने अपने लिए सौ पुत्र माँगे। क्यूंकि सावित्री एक पतिव्रता थीं, यमराज को उनके पति के प्राण वापिस करने पड़े।

इस पंद्रह मिनिट की कथा को पढ़ते-पढ़ते पंद्रह हज़ार प्रश्न मेरे मन में आए। ऐसा क्या सिखाया होगा उस छोटी सावित्री को उनके माता-पिता ने कि बड़ी हो कर वो अपने निर्णय एवं अपने हर तर्क में  इतनी ज़्यादा स्पष्ट थीं। जब इतनी भावुक परिस्थिति सामने हो, तो कैसे कोई इतना धीरज रख सकता है। अपने हर भाव को हर स्थिति को संतुलित रखने की कथा है ये।

सावित्री को हमेशा इसलिए याद किया जाता है क्यूँकि उन्होंने अपना पति धर्म निभाया। पर सावित्री ने तो एक बेटी होने का धर्म उससे भी अच्छे तरीके से निभाया है। इतनी मुश्किल परिस्थिति मे भी उन्होंने अपने माता-पिता के बारे में पहले सोचा।
मैं नहीं जानती कि ये सच है या नहीं, पर सावित्री किसी के लिए भी एक प्रेरणा स्त्रोत बन सकती है।

हम आज के समय में बहुत बात करते हैं कि बेटियों  को पढ़ाओ, स्वतंत्र बनाओ। पर बहुत ज़रूरी है कि हम ये समझ पाएँ कि सही निर्णय लेना आना भी बहुत-बहुत ज़रूरी है। उनको बचपन से ही ये आज़ादी देनी चाहिए कि वे अपने निर्णय ख़ुद लें। ग़लती होगी ज़रूर, पर ये सीखना बहुत ज़रूरी है।

कई सालों से मैं सावित्री के बारे में सुनती और पढ़ती आ रही हूँ पर आज मुझे सच में ये मौका मिला कि  मैं उनके बारे में कुछ समझ सकूँ।
आपकी राय जानने के लिए उत्सुक रहूंगी|

First published at author’s blog

मूल चित्र: Vecteezy

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