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मूक राम और रावण के युग में क्यों रहे सीता नारी सम्मान की पहचान?

Posted: अगस्त 17, 2018

वर्तमान में जिस तरह धर्म को आधार बना शोषण और बुराइयों को बढ़ावा दिया जा रहा है, वो निंदनीय है लेकिन उससे ज्यादा दुःख का विषय है कि देश में ऐसे लोगों की संख्या बढ़ती जा रही है जो सिर्फ मूक दर्शक हैं। रोज़ बढ़ते बलात्कार और वहशियों की बढ़ती संख्या ने मुझे एक बात कहने को मजबूर किया है-“सौ मूक रामों से एक रावण भला।”

हजारों मूक राम से तो भला है कि एक रावण दुबारा पैदा हो जाए। शायद वो बदल गया हो अब। शायद वो आज, पहले से बेहतर नारी का सम्मान करना सीख गया हो। राम तब भी मूक थे और आज भी मूक ही हैं। उन्होंने भले ही अपनी पत्नी के सम्मान की रक्षा के लिए रावण से युद्ध किया किंतु बाद में सीता से अग्नि परीक्षा भी मांगी। इतना ही नहीं उसके बाद भी अपने पुरुषोत्तम और राजधर्म के लिए उन्होंने मूक रहना स्वीकार किया।

मेरे देश में औरत को सदा से सीता कहा गया।

“सीता ने अपना पत्नी धर्म निभाने के लिए महलों की सब सुख-सुविधाओं को त्याग दिया।”

हां, सीता ने अपना पत्नी धर्म निभाया क्यूंकि सीता ने खुद अपने जीवनसाथी को चुना था। उसको वह अधिकार दिया गया था। और जहाँ अधिकार होते हैं वहीं कर्तव्यों की पूर्ति भी की जाती है। सीता ने एक राजसी जीवन त्याग अपने पति का साथ दिया जो कि एक आज्ञाकारी पुत्र था, जिसने पिता के वचन की लाज और अपनी सौतेली माँ की इच्छा का मान रखने के लिए राज योग को त्याग दिया।

एक औरत से अपने पति के लिए सब सुख सुविधाएं त्याग देने की उमींद करने वालों, क्या आप एक मातृ-पितृ भक्त या अपने राज-पाठ को छोड़ने वाले राम हो?

“सीता ने कभी भी भाइयों के बीच जहर नहीं घोला।”

आपने ये सुना तो होगा कि समय पर लगी एक सिलाई कपड़े को और फटने से बचा लेती है। जी फटता वही है जो कमजोर होता है। जहाँ पहले से ही खिंचाव या छेद हो गए हो, वहाँ टूटन और अलगाव होना ही है। औरत को हमेशा रिश्तों में तनाव लाने का कारण माना जाता है। लेकिन लोग ये भूल जाते हैं कि अगर कोई औरत ऐसा करने में सफल हुई है तो आपके रिश्ते उस औरत की इच्छा और कारीगरी से कहीं ज़्यादा कमजोर हैं।

राम, भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न चार होते हुए भी एक थे।

“सीता ने अपने सतित्व की रक्षा की।”

ये सही है कि सीता ने अपने सतित्व की रक्षा खुद की क्यूंकि वो एक दृढ संकल्प और आचरण वाली नारी थी। उसे नहीं मंजूर था कि कोई पर-पुरुष उसको हाथ भी लगाए। परंतु इसमें रावण का योगदान कम नहीं है। उसने सीता पर बुरी नज़र डाली, उसको हर लाया, कैद में रखा अपनी पत्नी के सामने रोज़ अपने पौरुष का बखान करता, लेकिन फिर भी बिना सीता की सहमति के उसको छुआ तक नहीं। रावण के ज्ञान, तेज और बल के विषय में तो जानते ही होंगे आप।

एक नारी का सम्मान औरत और पुरुष दोनों की जिम्मेदारी है।

“जब सीता नहीं बच पायी समाज के लांछनों से तो एक साधारण नारी का क्या अस्तित्व।”

क्या राम और सीता ये कह कर गए थे कि अब इसके बाद हर औरत की जिंदगी एक सीता की जिंदगी होगी। सीता के साथ जो हुआ वो राम की कमजोरी थी न कि सीता की गलती। पहली तीन बातें ये कहती हैं कि सीता ने अपने हर कर्तव्य को अपनी पूरी क्षमता से निभाया किंतु जब राम की बारी आई तो वो निसहाय हो गए। उन्होंने सीता से अग्नि परीक्षा ली, उन्होंने सीता को त्याग दिया।

राम एक अच्छे पुत्र, भाई, राजा, योद्धा होंगे लेकिन एक अच्छे पति बनने से चूक गए। एक असफल पुरुष कहलाने के लिए ये काफी है और सीता को सब सहना पड़ा क्यूंकि उसका पति एक कमजोर व्यक्तित्व का पुरुष था। अगर समाज तब भी राम और सीता से बड़ा था तो मंदिर समाज का बनवाओ राम और सीता का नहीं।

सीता ने लांछन नहीं सहे वरन अपने अस्तित्व की रक्षा की। एक पुरुष को उसकी पत्नी से ज़्यादा कौन जानता-समझता है। वो जानती थी कि  राम उसके पक्ष ने आवाज़ नहीं उठाएंगे, तो उसने ऐसे पति को त्याग देना ही उचित समझा।

और रही बात समाज के लांछन की, समाज तब भी अँधा था समाज आज भी अँधा है।

वर्तमान में जिस तरह धर्म को आधार बना शोषण और बुराइयों को बढ़ावा दिया जा रहा है, वो निंदनीय है लेकिन उससे ज्यादा दुःख का विषय है कि देश में राम की संख्या बढ़ती जा रही है। जो सिर्फ मूक दर्शक हैं। जो मरे हुए या किसी कहानी के पात्र के मान सम्मान के लिए तो तलवारें उठा रहे हैं, लेकिन अपने घर में जीवित देहों की रक्षा करने में असफल होना तो दूर, अपना खून तक नहीं गर्म कर पा रहे।

रोज़ बढ़ते बलात्कार और वहशियों की बढ़ती संख्या ने मुझे एक बात कहने को मजबूर किया है-“सौ मूक रामों से एक रावण भला।”

अपने घर की बहू बेटियों की लुटती लाज को देख कर भी शांति से अपना पेट भर सो जाने वालों से, अपनी कैद में भी सम्मान देने वाला रावण भला। जिसने पर-स्त्री को उसकी इच्छा के विरुद्ध हाथ तक नहीं लगाया।

आज के राम दलील देते हैं कि औरत के कपड़े देख के उनका मन मचला। औरत अपने सतित्व को संभाले लेकिन आप अपने पौरुष को काबू में नहीं रख सकते। आप इतने उतावले हो जाते हैं कि हर औरत के सतित्व पर आप अपना हक समझ ये भूल जाते हैं कि आपके घर में भी एक ऐसी ही स्त्री है। अगर आपकी नज़र से औरत को गलत कहें भी तब भी आपका पौरुष कहीं से भी सही नहीं है। क्यूंकि जो पौरुष किसी औरत को उसकी इच्छा के विरुद्ध छू उसका अस्तित्व हनन करता है वो किसी नीच आत्मा से कम नहीं है। वो पुरुष कहलाने के काबिल नहीं है।

अरे! आपकी जमात ने तो छोटी नवजात बच्चियों को भी नहीं बक्शा और वही आपकी जमात आज शांत घर में बैठी टीवी पर आडंबरों का मेला लगा रोज़ अपना मनोरंजन कर रही है। देखिये आप आराम से टीवी देखिये, आप राम बनिए, राम का मंदिर बनवाइये और देखिये अपने सूर्यवंश का अंत होते हुए। कोई नाम लेवा नहीं बचेगा। क्यूंकि अब फिर से सीता ने राम का त्याग करना है। अब फिर से सीता अपने हक़ की लड़ाई लड़ेगी। किंतु आज की सीता वो सीता नहीं है, आज की सीता फिर किसी वंश के कुल दीपक को अपनी कोख नहीं देगी।

दे भी क्यूँ ….पुत्र हुआ तो एक नया राम/रावण पैदा होगा और पुत्री हुई तो फिर से सीता के अस्तित्व का हनन होगा। अब जब राम राम नहीं रहे तो रावण भी कहाँ वो रावण रह गए हैं। लेकिन सीता आज भी जिन्दा है, मजबूर है वो जिन्दा रहने और अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए।

औरत पहले भी अपनी लड़ाई खुद लड़ती आयी थी और आज भी खुद लड़ रही है। ये तो पुरुषों का भ्रम है और औरत की उदारता कि वो पुरुष को खुद को श्रेष्ठ और साथ ही ये सोचने दे रही है कि पुरुष औरत का रक्षक है, पुरुष औरत का अन्नदाता है। पुरुष औरत से अधिक बलशाली और शक्तिशाली है-आप इसी भ्रम में खुश रहें और औरत खुद लड़ लेगी अपनी लड़ाई। वो जीवन देने से लेकर जीवन लेने तक का सफर खुद ही तय करती आई है, आगे भी कर लेगी।

आप बने रहिये राम।

आप बने रहिये रावण।

या देवी सर्वभूतेषु शक्ति रूपेण संस्थिता , नमस्तस्ये नमस्तस्ये नमस्तस्ये नमो नमः।

अब समय की पुकार इस शक्तिरूपा के लिए है।

(जो जिस धर्म को पढ़ता समझता है वो उसी की कमियों की बात करेगा। इसका मतलब ये नहीं कि किसी और धर्म से ताल्लुकात रखने वाले पुरुष महान और पौरुषत्व से भरपूर हैं। नारी का अपमान हर धर्म में हो रहा है। आजकल हो रही वहशीपन की घटनाओं ने तो हर धर्म और समाज के पुरुष को कटघरे में ला खड़ा कर दिया है)

मूल चित्र: Pexels

Myself Pooja aka Nirali. 'Nirali' who is inclusion of all good(s) n bad(s).

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