क्या एक महिला का काम करना सिर्फ पैसों की ज़रूरत है?

Posted: July 19, 2018

जहाँ एक और हम महिला सशक्तिकरण की बातें करते हैं, वहीं दूसरी ओर पितृसत्तात्मक सोच आज भी हर औरत की सच्चाई है। इसका सिर्फ एक ही जवाब है, हर लड़की को यह सिखाया जाए की आत्म-निर्भता ज़रूरी है। और सिर्फ आत्म-निर्भता ही क्यों आर्थिक आत्मा-निर्भता भी। 

सुनीता एक मध्यम वर्गीय परिवार की लड़की थी। घर वालों ने, उसको लड़की समझ कर, कभी भेदभाव नहीं किया। पढ़ाया-लिखाया और सिलाई भी सिखाई। सिलाई करना सुनीता ने खुद ही सीखा। उसको अपने हाथ से सिले कपड़े पहनना अच्छा लगता था। और, उसको अपना काम भी बहुत भाता था, इसलिए वह सिलाई में बहुत ही जल्दी निपुण हो गयी। वैसे तो वह ग्रेजुएट थी, पर उसने ट्यूशन कर अपने सिलाई के कोर्स का पैसा निकाला। उसकी इच्छा थी कि वह बाद में एक बूटीक खोले और अपने सपनों को रंग दे।

उसके पिता एक सरकारी कर्मचारी थे। वह ज्यादा नहीं कमाते पाते थे।  ऊपर से, घर में २ बच्चे और थे जिनका पालन-पोषण भी उन्हीं की तनख्वाह से होता था।

सुनीता २५ की हो चली थी। छोटे शहरों में आज  भी २४-२५ उम्र शादी के लिए आख़िरी पड़ाव माना जाता है। बिरादरी में उन्होंने बहुत ढूँढा, पर कोई भी लड़का उतना पढ़ा लिखा नहीं मिल रहा था। यह परेशानी भी उनको खाये जा रही थी कि सुनीता का ब्याह कैसे रचाएं।

फिर एक दिन, दूर के एक रिश्तेदार ने उनको एक लड़का बताया जो दिल्ली शहर में था। लड़का पढ़ा लिखा था और एक प्राइवेट कंपनी में इंजीनियर की नौकरी करता था। कमाता भी अच्छा था, तो घरवालों ने सोचा इससे अच्छा रिश्ता फिर ना मिलेगा और २० दिन में ही शादी कर दी। सुनीता इस शादी के लिए तैयार भी नहीं हो पाई थी मगर अपने माँ-बाप की परेशानी कम करने के लिए उसने शादी कर ली। लड़का भी वैसे अच्छा ही था और उसमें कोई बुरी आदत भी नहीं थी।

शादी के बाद सुनीता दिल्ली शिफ्ट हो गई। नया शहर, नया माहौल उसको भाने लगा। पर ६ महीने बाद वह बोर होने लगी। उसका पति सुबह का निकला शाम को देर से घर आता। नए शहर में उसके कोई दोस्त भी नहीं थे और घर में काम भी कुछ खास नहीं था कि वह उसमें अपने आप को व्यस्त कर लेती।

फिर एक दिन उसको याद आया कि वह अपनी सिलाई की मशीन साथ ले कर आयी है जो कि  महीनों से धूल खा रही थी। सोचा, चलो अपने शौक पूरे कर लेती हूँ। उसने कुछ पुराने कपड़े निकाले और उनके अच्छे से कुशन और परदे सिल डाले। वह अपने कुछ कपड़ों को खुद डिज़ाइन करके पहनने लगी। उसको अच्छा लगता था, अपने हाथ से कुछ ऐसा काम करना, जो रोज़-मर्रा के काम से अलग हो।

धीरे-धीरे उसके पड़ोस में लोगों को पता चला कि वह कपड़े अच्छे सिलती है। लोगों ने उसको काम देना शुरू कर दिया। छोटा-मोटा काम वह ऐसे ही बिना पैसों के कर देती थी। उसको बस अपने काम से प्यार था, और, लोगों के काम आना उसको अच्छा लगता था।

एक दिन उसके पति ने उसको रात में कुछ सिलाई का काम करते हुई देख लिया। पूछा, “यह किसके कपड़े सिल रही हो? तुम तो यह सब नहीं पहनती।” सुनीता घर में छोटा-मोटा सिलाई का काम करती है यह तो उसको पता था, पर, उसको यह नहीं पता था कि पड़ोसी भी उसको कुछ काम देने लग गए थे।

सुनीता बोली, “हाँ, यह कुर्ती बगल में आंटी की बेटी की है। उनको मेरा काम बहुत पसंद आया, तो उन्होंने मुझे सिलने को कहा। मुझे सिलाई  अच्छी लगती है, तो मैंने भी ले लिया। वैसे तो मैं पैसे नहीं मांगती, पर वह दे देती हैं ये बोल कर कि ऐसे अच्छा नहीं लगता।”

आख़िर में वह बोली, “सोच रही हूँ, कुछ दिनों में अपना बूटीक खोल लूं, घर से ही। कुछ पैसे भी कमा लिया करूंगी और बोरियत भी खत्म हो जायेगी। इसी बहाने से अपने काम को अच्छा कर पाऊँगी।”

यह सुनकर उसका पति भड़क उठा, बोला, “मेरे कमाये हुए पैसे क्या तुमको कम पड़ते हैं, जो अब तुम लोगों के कपड़े सिलोगी? मेरी क्या इज़्ज़त रह जाएगी? लोग सोचेंगे, सुनीता का पति उसको पैसों के लिए मोहताज रखता होगा, इसलिए वह सिलाई कर रही है।”

यह सुनकर सुनीता सन्न रह गयी। उसने सपने में भी नहीं सोचा था कि उसका पति उसके हुनर को यह मोड़ दे देगा।

वह थोड़ी देर तक चुप रही, फिर बोली, “काम तो आख़िर काम होता है, चाहे जैसा भी हो। जिस काम में आपको खुशी मिलती हो उसको करने में क्या रोक-टोक? मैं जो भी कर रही हूँ, अपनी मेहनत से कर रही हूँ। और, यह मेरा हुनर है! ऐसा आपने कैसे सोचा कि सिर्फ पैसे कमाने के लिए ही एक औरत काम करती है? या, वही महिलाएं काम करती हैं जिनके पति उनको पैसे नहीं देते? काम अपनी ख़ुशी के लिए किया जाता है। कोई भी काम हो उसकी इज़्ज़त करनी चाहिए, ना कि पैसों से तुलना करके उसकी तौहीन।”

सुनीता बोली, “मेरी ज़िन्दगी आपके नाम से जुड़ी है, पर ऐसा नहीं कि मेरे अपने कुछ सपने नहीं। और मुझे अपना काम करने में कोई शर्म नहीं आती। चाहे मैं चंद  पैसे कमाऊं या नहीं, यह काम मुझको ख़ुशी देता है और एक नयी पहचान।”

यह कहकर सुनीता अपने कमरे में चली गयी। रमेश चुप रहा और कुछ देर बाद वहीं सोफे पर सो गया।

और, फिर इस मुद्दे पर कभी बहस नहीं हुई।

शायद, सुनीता गलत भी नहीं थी।

क्या इस आज़ादी के लिए भी आंदोलन करने होंगे?

क्या एक औरत के काम को पैसे के तराज़ू से ही तोला जाता रहेगा?

या, यह कह कर नज़र अंदाज़ कर दिया जाएगा कि तुमको पैसों की क्या ज़रूरत?

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