जागो दुर्गा!

Posted: July 18, 2018

बहुत हुआ अब! अपने अंदर की दुर्गा को ललकार कर जगाने का वक़्त आ गया है! जागो दुर्गा जागो!

हे माँ दुर्गा, तुम भी तो नारी थीं,

अकेली ही, सब असुरों पे भारी थीं|

 

महिषासुर ने जब, उपहास किया,

तुमने उसका सर्व, नाश किया|

 

आज भी, कुछ बदला नहीं,

वो असुर ही है, इंसान नहीं|

 

यही प्रलय है – यही अंत है,

यहाँ बहरूपी राक्षस, दिखते संत हैं|

 

क्यूँ हो रही इतनी यातना, मासूमों पे,

क्यूँ भारी पड़ रहे हैं असुर, इंसानो पे?

 

कैसे रहें हम जीवित, ऐसी महामारी में,

क्यूँ नहीं तुम आ जातीं हर नारी में?

 

तुम क्यूँ इस बात को नहीं समझ रहीं,

तुम्हारे रूप की यहाँ कोई इज़्ज़त नहीं|

 

हे माँ दुर्गा, जागो अपनी इस निद्रा से,

इंसानियत ख़त्म हो गयी अब दुनिया से|

 

या तो, हमारी भी शक्ति जगा दो,

या फिर, सुरक्षित अपने पास बुला लो|

Award winning short story writer. Author of two eBooks, loves to write poems and shares

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