माँ मेरी, मेरा अभिमान है तू – मेरी रुह का आकर है तू

Posted: January 29, 2019

“नाज़-नज़र और रक्षा-कवच, तेरी तरह बस बन जाती माँ” – एक बेटी द्वारा अपनी माँ को समर्पित, जिसकी समता वह ख़ुद माँ बनने के बाद ही समझ पाई।   

माँ मेरी, मेरा अभिमान है तू,
मेरे स्वाभिमान का आधार है तू;
तेरे अंश का विस्तार हूँ मैं,
मेरी रुह का आकर है तू।

जब दंभ हुआ युवा हूँ मैं,
और सोच लिया पर्याप्त भी हूँ;
क्यों बैठूँ बरगद की छाँव में,
अब स्वयं कैलाश विश्वास हूँ।

तेरी थपकी की ममता से,
अनुरागी ये शोर-दिखावा;
मुझ पर न्योछावर तेरा आंचल,
लगा मुझे वैराग्य-दिखावा।

तेरी सावन की पुरवाई वाणी,
लगी जेठ-मेघ का छलावा;
थक निढाल हुई तेरी अमृत-धारा,
सवाल-ख़्याल सब प्रतीत हुआ बहकावा।

ऐ माँ बता, किया क्या तूने,
बस निशा की निद्रा त्यागी थी;
मुख स्वाद बढ़े, तन स्वस्थ रहे,
यही तो तू जताती थी।

तेरी अनुष्ठान-साधना को मैंने,
मन-ही-मन में तोला था;
अब आ खड़ी तेरे धरातल पर,
जब उसने नन्ही आँखों को खोला था।

नित्य सेवा में भूखी-प्यासी,
फ़िर निशा में निद्रा त्यागी थी;
अपने अंश को पाकर मैं भी,
वात्सल्य-भाव रोक ना पाती थी।
नाज़-नज़र और रक्षा-कवच,
तेरी तरह बस बन जाती माँ।

हिमालय सा आदर्श तेरा,
कैसे समझ ना पाई माँ?
आज जो समझी तेरी समता,
माँ मैं भी कहलाई माँ।

मूल चित्र: Pixabay

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