अल्हड़ प्यार

Posted: January 11, 2019

‘चाहती हूं नफरत  करुं  उससे ,पर  फिर  भी  यादों  से  उसी   की  ही  दिल  उमड़ा  पड़ा  है’- एक कविता

 

बहुत  उम्मीद  से  था  मैने  फ़ोन  उठाया ,

बहुत  बैरूखी  से  था  उन्होंने   दिल  दुखाया।

ऊपर  से  किया  ये  हसी-सित्तम ,

कह  दिया  सो  जाओ, करते  हैं  बात  कल  हम।

संजीदगी  का  है  ये   कैसा आसूल ?

दिल  दुःखा  कर  किसी  का , करो  भी  ना  कबूल।

 

किसी ने जतलाकर  इतना  अपनापन ,जज़्बात  सारे  जगा दिए ,

की  जो  हमने  शरारत , तो  इलज़ाम  हमीं  पर  लगा   दिए।

हसी है , दिलनशी   है ,चाहना  उसको  खुदखुशी  है ,

अपना  है  या  बचपना  है, साथ  उसका  खूबसूरत  सपना  है।

 

आती  हैं  दिल  जीतने  की  उसको  सारी  अदाएं ,

चाहकर  भी  कोई  कैसे ,नशे  से  उसके  खुद  को   बचाए।

चंचल  है,  मनचला  है , दिल  की  टेढ़ी- मेढ़ी   राहों  में , कभी  उलझा,  कभी  संभला  है ,

चाहती हूं नफरत  करुं   उससे ,पर  फिर  भी  यादों  से  उसी   की  ही  दिल  उमड़ा  पड़ा  है।

 

मूल चित्र : pexels

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