हिंदी, एक भाषा नहीं, जज़्बात है | मेरा हिंदी से कुछ ऐसा ही नाता है

Posted: July 26, 2018

कुछ रिश्ते निभाए नहीं जाते, बस उनका एहसास रहता है। मेरा हिंदी से कुछ ऐसा ही नाता है। जितना भी लिख लूँ, पर हिंदी की मेरी ज़िन्दगी में अहमियत, मैं लफ्ज़ो में बयान नहीं कर पाऊँगी। 

मानवीय भावनाएं आँखों के बाद, जुबां से सबसे बेहतर इज़हार होती हैं। जब दिल दुखता है, तो उस दर्द को बयान करने में भाषा का सबसे बड़ा योगदान है। आप जिस भाषा में बात करते हैं, कई बार आप स्वयं ही उसका महत्व नहीं समझ पाते। ये भाषा ही आपको दूसरों से जोड़ती है। ये भाषा ही आपको अपने आप से जोड़ती है।

मेरी पैदाइश उत्तर प्रदेश की है, और ज़ाहिर सी बात है कि हिंदी मेरी मातृभाषा रही है। बचपन में हिंदी का मोल नहीं समझा। और समझते भी कैसे? बचपन समझने के लिए नहीं, अनुभव बटोरने के लिए होता है। यही अनुभव आगे जा कर आपको जीवन का सार समझाता है। हिंदी प्रबल थी, और अंग्रेज़ी आँखों से ओझल। कॉन्वेंट स्कूल में पढ़कर भले ही अंग्रेज़ी का बोलबाला रहा, पर हिंदी से दिल का रिश्ता था। उसे कभी भी सीखने की आवश्यकता नहीं पड़ी, वह तो जीवन शैली का एक हिस्सा थी।

कहीं न कहीं बचपन में, हिंदी और अंग्रेज़ी तराज़ू के दो पलड़ो में आ बैठीं जहाँ अंग्रेज़ी का पलड़ा भारी था। हिंदी, “घर की मुर्गी दाल बराबर” हो गयी। विदेशी ने देसी पे धावा बोल दिया। इसका श्रेय, मैं हमारी आधुनिक शिक्षा प्रणाली को दूंगी जो ब्रिटिश प्रतिरूप पर आधारित है। अवश्य, अंग्रेज़ी भाषा का बहुत महत्व है, उससे अवगत हो कर ही हम व्यक्तिगत तौर पर सार्थक हुए, परन्तु क्या हम अपनी ख़ुद की भाषा को पढ़ने और समझने में उतनी शिद्दत दिखाते हैं?

हम मोहब्बत का ज़िक्र आसानी से कर तो देते हैं, पर अक्सर उस मोहब्बत के असल मायने समझ नहीं पाते। मोहब्बत तो वो है, जो दिल को ऐसे छुए कि उसे पिघला दे, और वो किसी भी प्राणी या वस्तु से हो सकती है। मेरे लिए हिंदी मेरी मोहब्बत है। बचपन की यादें बहुत हसीन होती हैं और उसका असर आपके व्यक्तित्य में झलकता है। मेरा बचपन साहित्य से घिरा था। मेरे दादा घर के इकलौते ऐसे सदस्य थे जिन्हें उर्दू बोलना और लिखना आता था। उस भाषा का चयन उनकी पसंद थी। मेरी दादी हमेशा हिंदी साहित्य के किसी उपन्यास के साथ वक़्त गुज़ारती थी और मेरे पापा डैन ब्राउन या सुरेंद्र मोहन के पाठन में बराबर दिलचस्पी लेते थे। ये इन सब का ही असर था की मेरा शब्द-कोष गहराता गया और हिंदी एवं अंग्रेज़ी साहित्य में रूचि बढ़ गयी।

मुझे आज भी याद है, चार्ल्स डिकेन्स की ‘ओलिवर ट्विस्ट’ पढ़ के मुझे लंदन का पहला ज़ायका लगा। ये उन्हीं की रचना थी, जिसके चलते मैं चाह के भी, अपने आप को रोक नहीं पायी और दस बार उस किताब को पढ़ डाला। उसी प्रकार ग्यारहवीं कक्षा में मुंशी प्रेम चंद्र की ‘वरदान’ के माध्यम से बनारस के दर्शन हुए। लेखक की ज़ुबानी वे अक्षर मेरे पर हमेशा गहरा असर करते। सोचती कि कैसे ये हम पे अपना जादू चलाना नहीं भूलते। माखनलाल चतुर्वेदी की ‘पुष्प की अभिलाषा’ पढ़के हृदय भावविभोर हो जाता। कैसे चंद पंक्तियों में कवि  ने अपनी भावनाओं को निचोड़ के रख दिया। ये बहुमूल्य विरासत भले ही उस वक़्त मुझे समझ ना आयी, परन्तु आज वही संवाद मुझे बुलाते हैं और वो पंक्तियाँ मुझे वापस उसी वक़्त में ले जाती हैं।

मैं अपने आप को उन ख़ुशनसीबों में गिनती हूँ, जिन्हें हिंदी और उर्दू, दोनों में गुफ़्त्गू करने का मौका मिला। मेरी शादी के उपरान्त उर्दू ने मेरे घर में दाखिला लिया। हिंदी में जब उर्दू का तड़का लगता है तो वो और भी लज़ीज़ और ख़्वाबीदा हो जाती है। ये इनायत सिर्फ़ कागज़ पर ही नहीं बल्कि असल ज़िन्दगी में भी कमाल करती है। काश, लोग ये बात समझ पाते।

बहरहाल, मेरे जीवन साथी ने बहुत ही ख़ूबसूरती और नज़ाकत से, लिहाज़ और लहज़े को हमारी असल ज़िन्दगी का हिस्सा बना दिया। रस और शोरबे का स्वाद ,खीर और शीर की मिठास, रिवाज़ और रिवायत में अंतर सिर्फ़ लोगों के मिजाज़ और ख़्यालात में है। यकीन मानिये, अगरआप बाहें फैला के किसी को अपनाते हैं तो उसकी रौशनी और सकारात्मकता आपके नज़रिये को तब्दील कर सकती है।

कुछ रिश्ते निभाए नहीं जाते, बस उनका एहसास रहता है। मेरा भी हिंदी से कुछ ऐसा ही नाता है। बारहवीं कक्षा के बाद हिंदी में कुछ लिखना तो न हुआ, इसलिए, आज जब हिंदी में कुछ लिखने की हसरत पूरी करी, तो बेइन्तहाँ ख़ुशी हुई। आज भी, जब स्कूल की हिंदी की किताबें खोलती हूँ, तो वहाँ लिखे हर अक्षर में सुकून मिलता है। जब दूसरे देश में रह कर, पूरा दिन अंग्रेज़ी बोलने के बाद, घर में हिंदी के दो वाक्य सुनने को मिलते हैं, तो दिल पिघल जाता है। ये भाषा ही तो आपका परिचय है। आप का अपने आप से, अपनों से मरासिम है।

कितना भी लिख लूँ, पर हिंदी की मेरी ज़िन्दगी में अहमियत, मैं लफ्ज़ो में बयान नहीं कर पाऊँगी। वो मेरा आशना भी है, और इख़्तियार भी।

जैसा कि मैंने पहले कहा, किसी भी भाषा की पैदाइश घर से होती है। मुझे नाज़ है कि मेरी तीन साल की बेटी, नानी-नाना से, “आप कैसे हैं”, दादा-दादी से, “ख़ैरियत है?”, और स्कूल में, “हाउ आर यू?”, एक ही अंदाज़ और अपनेपन से बोलती है। अंग्रेजी तो वो स्कूल में सीख ही जाएगी, और हम माँ-बाप पूरी कोशिश करेंगे कि वो हिंदी और उर्दू से अपना रिश्ता क़ायम रखे। वो इसकी अहमियत आज भले ही न समझे, लेकिन कल, ये उसके लिए उसके जज़्बात होंगे, एक बा-दस्तूर एहसास।

मूल चित्र: Pexels

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